लद्दाख : न्यायपूर्ण संघर्ष को कुचलती मोदी सरकार

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बीते दिनों लद्दाख की जनता एक बार फिर से अपनी न्यायपूर्ण मांगों को लेकर सड़कों पर उतरी। पर जनता की हर न्यायपूर्ण मांग के लिए कानों में तेल डाले बैठी गूंगी हो चुकी मोदी सरकार को जनता का यह संघर्ष रास नहीं आया। सरकार जब साम्प्रदायिक वैमनस्य पैदा कर संघर्ष की दिशा मोड़ने में कामयाब नहीं हुई तो उसने दमन की राह अपनाई। नतीजा यह हुआ कि संघर्षरत लोग भड़क कर हिंसक हो उठे। उन्होंने लद्दाख में भाजपा मुख्यालय में आग लगा दी और कई जगहों पर तोड़-फोड़ कर दी। दमन पर उतारू पुलिस की गोली से 4 लोग मारे गये व ढेरों घायल हो गये। सरकार ने संघर्षरत सोनम वांगचुक को रासुका के तहत गिरफ्तार कर राजस्थान की जोधपुर जेल में भेज दिया। और सरकार सोनम वांगचुक के पाकिस्तान-बांग्लादेश से सम्बन्धों, उनके एनजीओ को विदेशों में फंडिंग आदि अनर्गल बातें करते हुए लद्दाख की जनता के संघर्ष को बदनाम करने में जुट गयी। 
    
कुछ वर्ष पूर्व 2019 तक लद्दाख जम्मू एवं कश्मीर राज्य का हिस्सा था। जब मोदी सरकार ने कश्मीर में धारा-370 के खात्मे का एलान किया तो उसने लद्दाख को जम्मू व कश्मीर से अलग कर केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया। देश की सीमा पर स्थित यह प्रदेश बौद्ध बहुल लेह और मुस्लिम बहुल कारगिल से मिलकर बना है। केन्द्र शासित प्रदेश बनाये जाने से यहां के लोगों का अपनी सरकार खुद चुनने का अधिकार छिन गया। तभी से लद्दाख के लोग अपने को राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग के साथ इसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही बाहरी प्रवासियों के चलते स्थानीय लोगों की बेदखली को रोकने व रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। पर केन्द्र सरकार सीमावर्ती प्रांत होने का बहाना बना इन मांगों पर ध्यान देने का तैयार नहीं है। 
    
लद्दाख की जनता की इन न्यायपूर्ण जनवादी मांगों पर मोदी सरकार की बेरुखी ही जनता को भाजपा कार्यालय फूंकने तक ले गयी। विधानसभा के साथ राज्य की मांग जनता की जनवादी मांग है। छठी अनुसूची संविधान में पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए निर्मित की गयी थी। इसके तहत असम में बोडो काउंसिल को अपने इलाके में कुछ कर अधिकार व कुछ निर्णय लेने के अधिकार हासिल हैं। साथ ही बाहरी अतिक्रमण से कुछ सुरक्षा हासिल है। लद्दाख में इसके लागू होने से लेह व कारगिल क्षेत्र की काउंसिलों को कुछ स्वायत्तता व सुरक्षा हासिल हो सकती है। 
    
उपरोक्त न्यायपूर्ण मांगों को लेकर लद्दाख में बीते लगभग एक माह से जनता संघर्षरत थी। आमरण अनशन के जरिये लोग अपनी मांगों को उठा रहे थे। जनता की इन मांगों पर ध्यान देने के बजाय प्रशासन ने अनशनकारियों की जबरन गिरफ्तारी का रास्ता चुना। इस दमन से लद्दाख के लोगों का  धैर्य चुक गया और उनमें से कुछ तत्व हिंसक हो उठे जिसने अपनी बारी में पुलिस-प्रशासन को गोली चलाने व और दमन का बहाना दे दिया। अब केन्द्र सरकार व स्थानीय प्रशासन पूंजीवादी मीडिया की मदद से संघर्ष को लांक्षित करने-बदनाम करने की तिकड़में करने में जुट गया है। 
    
दरअसल मोदी सरकार को लेह के बौद्धों व कारगिल के मुस्लिमों का साझा संघर्ष रास नहीं आ रहा है। इस एकजुट संघर्ष से भाजपा-संघ का आधार खिसक रहा है। ऐसे में सरकार लद्दाख की जनता-उसके न्यायपूर्ण संघर्ष को ही लांक्षित कर बाकी देश में अपने दमन को जायज ठहराने में जुटी है। कश्मीर सरीखा सलूक ही लद्दाख के साथ कर संघ-भाजपा बाकी देश में अंधराष्ट्रवाद की भावना भड़काने की ओर जा रहे हैं। 
    
अपनी बारी में सरकार का यह रवैय्या लद्दाख के लोगों की भारतीय संघ से दूरी को बढ़ा रहा है। 

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