फिलिस्तीन और यूरोपीय साम्राज्यवादियों के नापाक इरादे

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बीते दिनों फिलिस्तीन के मसले पर फ्रांसीसी व ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के सुर बदले से नजर आने लगे हैं। पहले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रां ने घोषणा की कि फ्रांस सितम्बर में फिलिस्तीनियों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे देगा। इसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टार्मर ने घोषणा कर दी कि ब्रिटेन फिलिस्तीन को मान्यता देने पर विचार कर रहा है व उनका निर्णय कुछ शर्तों पर निर्भर करेगा। स्पेन, आयरलैण्ड, नार्वे बीते वर्ष ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। 
    
एक ऐसे वक्त में जब फिलिस्तीन में इजरायल भयंकर तबाही व कब्जा थोपे हुए है। जब 60,000 से अधिक फिलिस्तीनी लोग बेवजह इजरायल द्वारा मारे जा चुके हैं। जब हर रोज भूख से फिलिस्तीनी बच्चे दम तोड़ रहे हों तब यूरोपीय साम्राज्यवादी इस मान्यता से क्या हासिल करना चाहते हैं? 
    
दरअसल फिलिस्तीनी लोगों के खून बहाने में इजरायली-अमेरिकी शासकों के साथ यूरोपीय साम्राज्यवादी भी तरह-तरह से भागीदार रहे हैं। हथियारों की आपूर्ति से लेकर अन्य तरह से ये इजरायल के साथ खड़े रहे हैं। अब जब इजरायल फिलिस्तीन में अपने नरसंहार को क्रूरता की हदों के पार लोगों को भूख से मारने की ओर ले जा रहा है तो दुनिया भर की जनता के साथ यूरोपीय देशों की जनता में भी फिलिस्तीन के प्रति समर्थन व इजरायल के प्रति नफरत बढ़ रही है। यूरोपीय साम्राज्यवादी भी अपनी जनता की इस मामले में बढ़ती नफरत का सामना कर रहे हैं। कई जगहों पर मजदूरों ने इजरायल को हथियार व अन्य सामग्री की आपूर्ति फिलिस्तीन के समर्थन में रोक दी। 
    
ऐसे में फ्रांस-ब्रिटेन के साम्राज्यवादी फिलिस्तीन को मान्यता के वायदे से अपनी जनता के अपने प्रति आक्रोश पर ठण्डा पानी डालना चाहते हैं। वे दिखा रहे हैं कि इजरायल पर वे दबाव डाल रहे हैं कि वह नरसंहार रोके व फिलिस्तीन को मान्यता इसी दबाव को बढ़ाने वाला कदम है। 
    
दूसरा इस कदम से यूरोपीय साम्राज्यवादी किसी हद तक वास्तव में इजरायली शासकों के नृशंस कृत्यों पर कुछ लगाम चाहते हैं। वे इजरायली शासकों पर एक दबाव कायम करना चाहते हैं। साथ ही अपनी इन घोषणाओं से वे अरब जगत में खुद को फिलिस्तीनी मुक्ति के समर्थक के रूप में पेश कर अपने लिए अधिक स्वीकार्यता व तेल-गैस के मामले में अधिक धंधा चाहते हैं। 
    
इजरायली नरसंहार की क्रूरता से दुनिया भर की जनता में इजरायली-अमेरिकी शासकों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। इस गुस्से का असर-दबाव तमाम देशों के शासकों के बदले सुरों में भी दिख रहा है। रूसी-चीनी साम्राज्यवादी भी तमाम देशों के शासकों को इजरायल के विरोध में स्वर कड़े करने की ओर धकेल रहे हैं। ऐसे ही स्वर बोगोटो सम्मेलन में सुनाई दिये। 
    
15-16 जुलाई को कोलंबिया के बोगोटा में द हेग समूह द्वारा फिलिस्तीन पर आपातकालीन मंत्री स्तरीय सम्मेलन बुलाया गया। इसमें अल्जीरिया, बांग्लादेश, बोत्सवाना, ब्राजील, चिली, चीन, जिबूती, मिश्र, स्लोवेनिया, स्पेन, होंडुरास, इंडोनेशिया, इराक, आयरलैण्ड, लेबनान, लीबिया, मलेशिया, मैक्सिको, नामीबिया, निकारागुआ, तुर्की, उरुग्वे व वेनेजुएला के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। हालांकि 12 देशों ने ही अंतिम घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये। यह सम्मेलन भी शासकों द्वारा फिलिस्तीन पर घड़ियाली आंसू बहाने से ज्यादा कुछ न कर सका। 
    
फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष के साथ आज दुनिया में केवल मेहनतकश जनता ही खड़ी है। पश्चिमी साम्राज्यवादी ही नहीं रूसी-चीनी साम्राज्यवादी भी फिलिस्तीन के पक्ष में नहीं खड़े हैं अधिक से अधिक उनके लिए फिलिस्तीन का मुद्दा अमेरिकी साम्राज्यवाद के बरक्स अपना पक्ष मजबूत करने का जरिया है। यही हाल इन देशों के पूंजीवादी शासकों का है जो कुछ दिखावटी बातों से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। ऐसे में मेहनतकश जनता के संघर्षों में तेजी, उसके द्वारा अपने देशों में समाजवादी क्रांति के साथ ही फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष को बल मिल सकता है। शासकों के घड़ियाली आंसुओं से कोई उम्मीद करना गलत होगा। 

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