भाजपा सरकारों के बढ़ते मजदूर विरोधी कदम

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भाजपा-संघ का शासन धीरे-धीरे ही सही खुद को अधिकाधिक पूंजीपरस्ती की ओर ले जा रहा है और इसके जरिये अपने मजदूर विरोधी चेहरे को उजागर कर रहा है। एक-एक कर भाजपा सरकारें फैक्टरियों में श्रम कानूनों को पूंजी के पक्ष में बदलने में जुटी हुई हैं। मजदूर वर्ग ने मई दिवस के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद 8 घंटे काम का अधिकार हासिल किया था। अब भाजपा सरकारें वक्त के साथ काम के घण्टे और कम करने के बजाय उल्टी गंगा बहाते हुए इसे 12 घण्टे तक बढ़ाने पर उतारू हैं। 
    
फैक्टरी अधिनियम चूंकि सप्ताह में 48 घण्टे काम से ज्यादा की इजाजत नहीं देता है। और इस केन्द्रीय अधिनियम के खिलाफ राज्य सरकारें नहीं जा सकतीं। इसीलिए चोर दरवाजे के रूप में वे प्रतिदिन 10 से 12 घंटे काम कराने व ओवरटाइम की सीमा प्रति तिमाही 75 घण्टे से बढ़ा 150 घण्टे तक करने के प्रयास कर रही हैं। इसी के साथ महिलाओं से रात की पाली में काम लेने की छूट पूंजीपतियों को दे रही हैं। 
    
तेलंगाना, गोवा के बाद गुजरात ने 12 घण्टे तक कार्य कराने का अध्यादेश जारी कर दिया है। इसके साथ ही ओवरटाइम के घण्टे बढ़ा दिये गये हैं। गौरतलब है कि कोरोना महामारी के वक्त 2020 में गुजरात सरकार काम के घंटे 12 करने व ओवरटाइम के भुगतान को आधा करने का फरमान सुना चुकी थी जिसे तब सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर विरोधी कह रद्द कर दिया था। इस मामले में गोवा ने काम के घण्टे 9 से बढ़ाकर 10 किये हैं। इसमें अवकाश का समय भी शामिल है। 
    
काम के घण्टों को कम कराने का संघर्ष मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक संघर्ष रहा है। मजदूर वर्ग के पुरखों ने पूंजी से संघर्ष कर 8 घण्टे का कार्य दिवस हासिल किया था। यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रम सम्मेलनों में मजदूरों के अधिकार के बतौर उद्घोषित हुआ था। सप्ताह में 48 घण्टे काम इस हद तक स्थापित हो चुका था कि मोदी सरकार 4 श्रम संहिताओं में इसे बदलने की हिम्मत नहीं कर सकी। हां दूसरे रास्ते से वह 12 घण्टे काम व हफ्ते में 4 दिन काम का रास्ता जरूर तैयार करती रही है। अब भाजपा शासित राज्य सरकारें ओवरटाइम का सहारा ले कर काम के घण्टे 10 से 12 करने में तुली हैं। 
    
एक बार फिर से 8 घण्टे के कार्य दिवस का नारा मजदूरों के लिए छीने जाते अधिकारों को बचाने का नारा बन चुका है। शासक वर्ग बढ़ती महंगाई में बेहद कम मजदूरी रख मजदूरों को 12-12 घण्टे काम करने के लिए मजबूर कर रहा है। और अब 12 घण्टे कार्य को ही मोदी सरकार की भाषा में ‘न्यू नार्मल’ बनाने पर उतारू है। 
    
भाजपा सरकारों के बेपर्द होते पूंजीपरस्त चेहरे से मजदूरों के उसके खिलाफ एकजुट संघर्ष की संभावनायें बढ़ रही हैं।  

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