त्यौहार, बाजार व साम्प्रदायिकता

/festival-market-v-sampradayikta

मोदी सरकार के आगमन के बाद देश में साम्प्रदायिक उन्माद में गुणात्मक बढ़ोत्तरी हुई है। यह साम्प्रदायिकता खासकर मुसलमानों को निशाने पर लेकर हुई है। हालांकि दलित, आदिवासी व महिलाएं भी इनके निशाने पर रहे हैं। पर इनके निशाने के केन्द्र में मुसलमान आबादी रही है। इसी मुसलमान विरोधी भावना के कारण भाजपा-आर.आर.एस. फला-फूला और पिछले 10 वर्षों से केन्द्र की सत्ता में काबिज है। अपने हिन्दू राष्ट्र के फर्जी नारों को जनता की बदहाल होती आर्थिक स्थिति को छिपाने व भारत को विश्व गुरू बनाने के इर्द-गिर्द गढ़ा गया। आज स्थिति ठीक यह बन चुकी है कि त्यौहारों के समय मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा करना हिन्दू फासीवादियों का औजार बन गया है। इनके संघी संगठनों का मुख्य काम त्यौहारों के समय मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करना बन गया है। 
    
होली, दिवाली, सावन, नवरात्रि, रामनवमी पता नहीं कितने अन्य हिन्दू त्यौहारों के दौरान संघी संगठन व उनके उकसावे के शिकार लोग सड़कों पर हथियार लेकर मुसलमानों के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आते हैं। केन्द्र की सत्ता में काबिज भाजपा सरकार का पूरा संरक्षण इन हिंसक तत्वों को इस हिंसा के दौरान हासिल होता है।  
    
हम त्यौहारों के इतिहास पर बात करें तो हम पाएंगें कि ज्यादातर त्यौहार खेती-किसानी के इर्द-गिर्द आयोजित होते मिलेंगे। चाहे हम होली को लें, दिवाली को लें या फिर सावन को लें। सावन का महीना तो खासकर जिसमें पूरे भारत में मानसून की बारिश होती है और चावल की खेती की जाती है, बहुत ही महत्वपूर्ण है। सावन का महीना तो हरियाली का प्रतीक है। लेकिन हिन्दू फासीवादियों ने इन त्यौहारों का फासीवादीकरण कर हिन्दू आबादी के एक हिस्से को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा कर दिया है। 
    
पूंजीवाद ने इन त्यौहारों का किस तरह बाजारीकरण कर दिया, हम देख सकते हैं। हर त्यौहार पर पूंजीपति वर्ग बाजार में उससे जुड़े उत्पाद माल के रूप में उतार देता है। त्यौहारों को उसकी ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकाल कर बाजार की तरफ मोड़ देता है। हर त्यौहार पूंजीपति वर्ग के बाजार में बिक्री बढ़ाने के रूप में विकसित कर दिया गया है। होली, दिवाली, सावन और यहां तक कि करवाचौथ तक में बाजार पूंजीपति वर्ग के सामानों से अट जाते हैं। पूंजीवाद का लोक-लुभावन प्रचार त्यौहारों के समय उसके मालों को बेचने का बहुत बड़ा जरिया बन जाता है।
    
पूंजीवाद ने त्यौहारों को उसकी पृष्ठभूमि से निकाल कर बाजार में बिक्री बढ़ाने का रूप दिया लेकिन पूंजीपति वर्ग के मुनाफे की हवस ने मजदूर-मेहनतकश जनता की क्रय शक्ति को कमजोर भी किया। उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप स्थाई नौकरियों पर लगातार हो रहे हमलों ने मजदूर-मेहनतकश जनता को सिर्फ किसी तरह जिन्दा रहने लायक वेतन तक ला दिया। अभी हाल ही में आई रिपोर्ट के अनुसार देश की लगभग 100 करोड़ आबादी लगभग बाजार से बाहर है। इतनी बड़ी आबादी के पास बाजार से खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। यह साफ तौर पर पूंजीपति वर्ग के संकट को दिखा रहा है। पर पूंजीपति वर्ग मुनाफे की भरपाई उसी उदारीकरण की नीतियों में देख रहा है जिसकी वजह से यह संकट पैदा हुआ है। सरकार अब श्रम कानूनों में पूंजी के अनुकूल बदलाव करके तथा सार्वजनिक उद्यमों को कोड़ियों के भाव एकाधिकारी पूंजी के सुपुर्द कर उनका मुनाफा बढ़ा रही है। उदारीकरण-नीजिकरण की पूंजीपरस्त नीतियां तेजी से लागू हों उसके लिए एकाधिकारी पूंजी ने आर.एस.एस. के साथ गठजोड़ कायम किया जिसके फलस्वरूप केन्द्र में भाजपा सरकार को सत्तानशीन किया गया। 
    
अब स्थिति यह बन चुकी है कि त्यौहार हिन्दू फासीवादियों के लिए साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बन चुके हैं। यह साम्प्रदायिकता नीचे से पैदा नहीं हो रही है कि कोई सिरफिरा या सिरफिरों का समूह सड़कों पर आकर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा कर रहा है। बल्कि यह ऊपर से यानी सत्ता के केन्द्र से चीजों को संचालित किया जा रहा है। जब देश का प्रधानमंत्री चुनावी सभा में मुसलमानों को निशाना बनाकर अपने भाषण दे रहा है तो निश्चित ही वह उन लम्पट संघी संगठनों को उकसा रहा है जो मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करते हैं।
    
त्यौहारों के माध्यम से इन संगठनों द्वारा जनता के एक हिस्से को गोलबंद कर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसात्मक कार्यवाही करना,  मजदूरों-मेहनतकशों की वास्तविक समस्याओं से उनका ध्यान हटाना तथा श्रम की लूट को बरकरार रख उनके सामने काल्पनिक दुश्मन खड़ा करना एकाधिकारी पूंजी व आर.एस.एस. के गठजोड़ का आज एक प्रमुख कारनामा बन चुका है। 
    
त्यौहार ही नहीं कोरोना महामारी के दौरान भी देखा गया कि कोरोना के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहरा कर पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाया गया। गांवों के स्तर पर मुसलमानों पर कोरोना के समय हमले किये गए। और यहां तक कि भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भी मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाया गया। 
    
एक तरफ तो आर.एस.एस. द्वारा त्यौहारों को साम्प्रदायिक रंग में रंगकर मुसलमानों के खिलाफ लगातार हमले जारी हैं वहीं दूसरी तरफ जनता के जनवादी अधिकारों को खत्म करने की प्रक्रिया भी जारी है। यह दोनों प्रक्रियायें समानांतर चल रही हैं। आर.एस.एस. की इसी साम्प्रदायिक वैचारिक राजनीति का असर ट्रेड यूनियन नेताओं से लेकर नागरिकों पर भी दिख रहा है। यह जहरीली राजनीति मजदूरों-मेहनतकशों के अच्छे-खासे हिस्से को अपनी विचारधारा का ग्रास बना कर उनकी जनवादी चेतना से लेकर वर्ग संघर्ष की चेतना को कुंद कर रही है। यह नागरिकों की नागरिक चेतना को भी कुंद कर रही है। आज मजदूरों-मेहनतकशों का बड़ा हिस्सा अपनी वास्तविक समस्याओं का हल आर.एस.एस. द्वारा निर्मित काल्पनिक दुश्मन के खिलाफ हिंसा में देख रहा है। लेकिन यह स्थिति उसे परेशान भी कर रही है कि उसकी समस्याएं हल होने की बजाय और ज्यादा तीखी हो रही हैं। मजदूरों की एक बड़ी आबादी आज न्यूनतम वेतन पर अपना जीवन बसर कर रही है, वह परेशान हो रही है और तर्क करने पर मजबूर हो रही है कि उसकी लगातार बदहाल होती इस स्थिति का सही समाधान फासीवादियों के पास नहीं है। अब यह जिम्मेदारी हमारी बन जाती है कि हम जनता को सही जमीन पर खड़ा कर हिन्दू फासीवादियों की बुरी करतूतों का भण्डाफोड़ कर जनता को वर्ग संघर्ष की ओर लेकर जाएं जिससे उनकी समस्याओं के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ने की राह खुलेगी।    
 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।