एक मजदूर महिला की मौत

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पाचजंय प्लाईवुड फैक्टरी बरेली की फरीदपुर तहसील के फरीद में स्थित है। फरीदपुर के एक गांव की रहने वाली रेखा देवी उम्र 40 वर्ष इस फैक्टरी में मशीन से छिली ढलाई को बंडल बांध कर ढोने का काम करती है। 14 जुलाई (सोमवार) को रोज की तरह रेखा देवी फैक्टरी में काम करने गयी। काम करते समय रेखा देवी लोउर की टक्कर की शिकार हो गयी। उसी वक्त अन्य मजदूरों ने इसकी सूचना फैक्टरी प्रबंधन दिनेश भंडारी को दी। दिनेश भण्डारी अपनी कार लेकर आये और रेखा देवी को बरेली के निजी अस्पताल में ले जाने लगे। अस्पताल जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गयी। 
    
इस फैक्टरी में श्रमिकों के श्रम विभाग में रजिस्ट्रेशन नहीं कराये गये और न ही किसी का ईएसआई बना है। बिना रजिस्ट्रेशन और रात की पाली में काम कराने का कानून भी नहीं है। फिर भी बरेली के फरीद की फैक्टरियां हों या परसा खेड़ा की, इन फैक्टरियों में कोई श्रम कानून लागू नहीं होते हैं और न ही मजदूरों को सुरक्षा उपकरण दिये जाते हैं। इन फैक्टरियों में न ही कोई यूनियन होती है। इसी का फायदा उठाकर मालिक मौज उड़ाते हैं और अपने गुनाहों से बच निकलते हैं। 
    
तो साथियों हम जहां कहीं भी हों। हमें संगठित होकर रहना चाहिए और मालिक से रजिस्ट्रेशन व ईएसआई, फंड-बोनस और श्रम के घंटों के विषय में बातचीत करके काम पर लगना चाहिए। जिसमें फैक्टरी के अंदर होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जाये और दुर्घटना होने पर सभी मजदूर एकजुट होकर मुआवजे व इलाज के लिए लड़ सकें। तभी हम सुरक्षित रह पायेंगे। अन्यथा रेखा देवी की तरह जाने कितने मजदूर मारे जाते रहेंगे।             -एक पाठक, बरेली

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?