प्रधान सेवक की ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’

Published
Fri, 10/16/2026 - 15:50
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प्रधान सेवक को ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ से बहुत लगाव है। उनके हिसाब से ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की विरासत है। जब से हिंदू हृदय सम्राट मोदी प्रधान सेवक बने हैं यानी गुजरात की सत्ता से सीधे अपने अडाणी-अंबानी की कृपा से दिल्ली तख्तनशीं हुए हैं तब से देश को गुजरात की तर्ज पर ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ बनाना, इनका परम उद्देश्य है। बीते 12-13 सालों में इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ के बारे कई बार मोदी चर्चा कर भी चुके हैं। 
    
अब, जब इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ में आम जन को ही बड़े पैमाने पर वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया और विपक्ष से लेकर सी जे पी और जनवादी प्रगतिशील संगठन दिल्ली में सड़कों पर आ गए, तब फिर से मोदी-शाह को ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ की याद आ गई। 
    
प्रधान सेवक ने ब्लूमबर्ग इकोनामिक फोरम में कहा ‘भारत लोकतंत्र की जननी है। भारत में 100 से अधिक भाषाएं, लगभग 80,000 पंजीकृत समाचार पत्र और प्रकाशन, और 1,000 से अधिक सैटेलाइट टेलीविजन चैनल हैं,’’ ‘‘और इतना ही नहीं सोशल मीडिया के दौर में भारत में 50 करोड़ से अधिक यू ट्यूब उपयोगकर्ता और 50 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम  उपयोगकर्ता हैं।’’ यह भी फरमाया कि ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ का उद्देश्य नागरिकों को मजबूत बनाना और सशक्त करना होना चाहिए, और भारत इसी रास्ते पर है। देश में लोग अलग-अलग मुद्दों पर खुलकर बहस करते हैं।’’
    
‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ अपने शबाब पर है। इसे सुरक्षित करने के लिए दिल्ली में हजारों पुलिसकर्मी, सीमा सुरक्षा बल और अर्ध सैनिक बल तैनात किए गए। क्योंकि दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन से ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ को खतरा पैदा हो चुका था। अभी जुलाई की ही बात है कि इसे अपने एक मंत्री को इस्तीफा दिलवाना पड़ा था। इसलिए दिल्ली की, विशेषकर जंतर-मंतर की किलेबंदी कर दी गई। मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए। दिल्ली की ओर आने वाली ट्रेनों को रोक दिया गया। आखिर ‘जन’ से ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ की सुरक्षा बेहद जरूरी है।
    
इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ का दूसरा नायक जो कभी गुजरात में तड़ीपार हुआ करता था अब देश का गृहमंत्री है। उसने इसकी सुरक्षा में जंतर मंतर पर जनता के प्रदर्शन कर सकने के अधिकार को रद्द कर दिया है। इसे प्रदर्शन स्थल से हटा दिया गया है। अब प्रधान सेवक के साथ मिलकर यह कथित लौह पुरुष, ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ के एक  तीसरे नायक मुख्य चुनाव आयुक्त को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।  
    
इनकी ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ अद्भत है। इसे डेमो यानी जनता से खतरा है। जन को सड़कों पर ही न आने दो, इसके लिए इनके पास अनोखे तरीके हैं। प्रदर्शनकारियों के विशेषकर महिलाओं के कपड़े फाड़ना, अश्लील हरकतें करना, ऐसी बसों में बिठाना जिसमें बाहर से कुछ न दिखे और फिर जो चाहे भीतर कर सको। सड़कों पर कीलें गाड़ देना और लोगों को घरों से अपहरण करना या नजरबंद कर देना इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ की खूबसूरती है। यह ब्रिटिश हुक्मरानों के शासन से भी आगे बढ़ी हुई और विकसित है। 
    
इसमें, एक खास दिशा में यानी जो इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ के हिसाब से जो आचरण करेगा, उन्हें सब कुछ करने की छूट है। उनका फूल मालाओं से स्वागत होता है। बृजभूषण शरण सिंह, स्वतंत्र उपाध्याय जैसे अनगिनत नगीने प्रधान सेवक की ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ के प्रशंसकों के पास हैं। 
    
इस ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ की ही ताकत और खूबसूरती है कि मोदी, अपने विरोधियों के मन की बात को कुचल सकते हैं और अपने मन की बात सुनने के लिए सबको लाइन में खड़ा कर सकते हैं। वाह! क्या और कितना सुन्दर लोकतंत्र है इस पर अडाणी, अंबानी जैसे खरबपति लहालोट हैं। ये खुश हैं कि कितने सुन्दर नगीने को तराशकर उन्होंने दिल्ली के तख्त पर बिठाया है जो दिन-रात उनकी चिंता में घुले जा रहा है।
    
कभी मुसोलिनी ने अपनी फासीवादी तानाशाही के निजाम के लिए कहा था यदि इतिहास में कभी लोकतंत्र का कोई शासन रहा है, यानी लोगों का राज्य, तो वह हमारा है, कि यदि कोई देश है जहां सच्चे लोकतंत्र का साकार हुआ है, तो वह देश फासीवादी इटली है। हिटलर भी अपने नग्न फासीवादी आतंक वाले शासन को जर्मनी का सच्चा लोकतंत्र बताता था। हिंदू फासीवादियों के आदर्श नायक यही हिटलर और मुसोलिनी तो हैं। 
    
सच्चे लोकतंत्र का सफर अब भारत तक पहुंचते-पहुंचते ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ में रूपांतरित हो रहा है। मोदी-शाह और अन्य हिंदू फासीवादी भी यही ‘सच्चा लोकतंत्र’ कायम करना चाहते हैं। इसकी एक बड़ी यात्रा ये पूरी कर ही चुके हैं। बस समस्या यही है कि ये हिटलर और मुसोलिनी की तरह का अंत नहीं चाहते। मगर ‘सच्चे लोकतंत्र’ यानी ‘मदर आफ डेमोक्रेसी’ का तो यही अंत होना है। 
 

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