शत्रु एक है -सुकान्त भट्टाचार्य

आज यह देश विपन्न है; निरन्न है जीवन आज,
मौत का निरन्तर साथ है, रोज-रोज दुश्मनों के हमले
रक्त की अल्पना आंकते हैं, कानों में गूंजता है आर्तनाद;
फिर भी मज़बूत हूं मैं, मैं एक भूखा मजदूर ।
हमारे सामने आज एक शत्रु है : एक लाल पथ है,
शत्रु की चोट और भूख से उद्दीप्त शपथ है ।
कठिन प्रतिज्ञा से स्तब्ध हमारे जोशीले कारखाने में
हर गूंगी मशीन प्रतिरोध का संकल्प बताती है ।
मेरे हाथ के स्पर्श से हर रोज यंत्र का गर्जन
याद दिलाता है प्रण की, धो डालता है अवसाद,
विक्षुब्ध यन्त्र के सीने में हर रोज युद्ध की जो घोषणा है
वह लड़ाई मेरी लड़ाई है, उसी की राह में रुक कर गिनने हैं दिन।
निकट के क्षितिज में आता है दौड़ता हुआ दिन, जयोन्मत्त पंखों पर-
हमारी निगाह में लाल प्रतिबिम्ब है मुक्ति की पताका का
अंधी रफ्तार से हरकतजदा मेरा हाथ लगातार यंत्र का प्रसव
प्रचुर-प्रचुर उत्पादन, अन्तिम वज्र की सृष्टि का उत्सव ।।
मूल बंगला से अनुवाद : नीलाभ         (साभार : कविता कोश)
 

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