भावनायें आहत होने की नौटंकी
जब से मोदी सरकार देश की सत्ता में आयी है तब से देश में धार्मिक आधार पर लोगों की भावनायें तेजी से आहत होने लगी हैं। किसी कार्टून, किसी कविता, किसी आरोप, किसी लेख, किसी धर्मग्रंथ पर प्रश्न आदि आदि मा
जब से मोदी सरकार देश की सत्ता में आयी है तब से देश में धार्मिक आधार पर लोगों की भावनायें तेजी से आहत होने लगी हैं। किसी कार्टून, किसी कविता, किसी आरोप, किसी लेख, किसी धर्मग्रंथ पर प्रश्न आदि आदि मा
फरवरी माह में दिल दहलाने वाली दो घटनायें सामने आयी हैं। एक घटना उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात की थी जिसमें अतिक्रमण को हटाने के नाम पर मां-बेटी को जिंदा जला दिया गया। दूसरी घटना हरियाणा की थी जिसमें
(बीते दिनों कानुपर देहात में योगी सरकार का बुलडोजर एक बार फिर गरजा। इस बार कब्जा हटाने के नाम पर निर्दोष मां-बेटी को लील गया। योगी का बुलडोजर न्याय ऐसा ही है।- सम्पादक)
सिर्फ़
पिछले समय में हिन्दू फासीवादियों की ओर से समान नागरिक संहिता की बातें एक बार फिर बहुत जोर-शोर से होने लगी हैं। कई भाजपा शासित प्रदेशों में इस संबंध में विधेयक लाने की बात हो रही है। गुजरात के हाल क
हिंदू फासीवादी ताकतों ने अपने मुस्लिम विरोध के अभियान को नई ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया है। हाल में ही इस विरोध के औजार के बतौर उन्होंने मुस्लिम हीरों की फिल्मों के बहिष्कार का नया तरीका ईजाद किया है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।