इस एनकाउंटर पर ताली पीटना अपनी आजादी कुर्बान करना है
बीते दिनों पूंजीवादी मीडिया में माफिया अतीक अहमद छाया रहा। एक मायने में अतीक अहमद ने फिल्मी हीरो-हीरोईन से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक को मात दे दी। अतीक अहमद को गुजरात से उ.प्र.
बीते दिनों पूंजीवादी मीडिया में माफिया अतीक अहमद छाया रहा। एक मायने में अतीक अहमद ने फिल्मी हीरो-हीरोईन से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक को मात दे दी। अतीक अहमद को गुजरात से उ.प्र.
फासीवादी सोच के कई रंग-रूप हैं। एक से सारे लोग बखूबी वाकिफ हैं यानी हिन्दू फासीवाद से। लेकिन इसके दूसरे रूपों से वाकिफ होना भी जरूरी है, खासकर आज के संकटपूर्ण समय में। ‘पढ़े-लिखे लोगों का जनतंत्र’ इ
अंग्रेजी में एक कहावत है- ‘आइरनी डाइड ए थाउजैण्ड डेथ’। हिन्दी में शाब्दिक अनुवाद होगा- बिडंबना हजार बार मर गई यानी बात बिडंबना की सारी हदों को पार कर गई। स्वयं बिडंबना शब्द विचित्र या व्यंग्यपूर्ण
एक लम्बे इंतज़ार के बाद 1 अप्रैल को मेरठ के मलयाना नरसंहार का फैसला आ गया और इस फैसले में 39 दोषियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। इस नरसंहार में 93 लोगों को दोषी बनाया गया था। इसमें से
हमारे देश में हिन्दू फासीवादी आंदोलन को खाद-पानी मुहैय्या कराने में पूंजीवादी मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। लगातार हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा चलाना, सरकार विरोधियों को देश विरोधियों के रूप में
रामनवमी के अवसर पर निकलने वाले जुलूसों ने इस वर्ष बंगाल और बिहार में जमकर तांडव किया। हिन्दू फासीवादियों ने इन दोनों ही राज्यों में मुस्लिमों और उनकी सम्पत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया। इन दोनों ह
भाजपा-संघ के शासन काल में नित्य नये कारनामे हो रहे हैं। मोदी के साथ योगी भी संघ के एजेंडों को आगे बढ़ाने में लगे हैं। नवरात्र (22 से 30 मार्च) में 9 दिन योगी सरकार द्वारा मंदिरों और मठों में रामायण
हिटलर और उसकी नाजी पार्टी के जमाने से ही फासीवादियों ने अपने प्रचार की एक शैली विकसित की है और समाज में अपना आधार बनाने में तथा उसे बनाये रखने में उसे औजार की तरह इस्तेमाल किया है। भारत के हिन्दू फ
बीते दिनों उत्तराखण्ड के विभिन्न शहरों में भाजपा से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने सम्मेलन आयोजित किये। खुद को देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन कहने वाला यह साम्प्रदायिक छात्र संग
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।