थ्योरेस्टीन वेब्लेन एक अमरीकी समाजशास्त्री थे। 1899 में उन्होंने अमेरिकी समाज के ऊपर एक किताब प्रकाशित की: द थ्योरी आव लीशर क्लास (फुरसती वर्ग के बारे में सिद्धान्त)। इस किताब में अमरीकी उच्च वर्ग के बारे में बात की गयी थी जो बिना कुछ करे-धरे मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग द्वारा पैदा की जा रही दौलत के बल पर ऐश कर रहा था।
इस किताब में वेब्लेन ने एक मजेदार थीसिस प्रस्तावित की। उन्होंने यह देखा था कि हाल के सालों में अमेरिकी उच्च वर्ग में महिलाएं भी पुरुषों की तरह नशा करने लगी थीं। पहले ऐसा नहीं था। वेब्लेन का कहना था कि पहले उच्च वर्गीय महिलाओं का नशे से दूर रहना वंचना या मजबूरी को सद्गुण बना लेना था। कुछ-कुछ ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ मुहावरे की तरह। जब वर्गीय समाजों में पुरुषों ने महिलाओं को ऐश के सामानों से वंचित किया तो समय के साथ महिलाओं ने इसे सद्गुण बना लिया। यानी ऐश के उन सामानों का उपभोग न करना सद्गुण था। और चूंकि नशे के सामान आम तौर पर महंगे तथा इसीलिए ऐश की चीज थे, इसलिए महिलाओं ने नशा न करने को अपना सद्गुण बना लिया। नशा न कर वे कम से कम इस मामले में खुद को सद्गुणी मानने लगीं। भारत में कुछ जातियों में महिलाओं द्वारा मांस-मछली न खाने को भी इसी तरह उनके सद्गुण की तरह देखा जाता था।
वेब्लेन के लिए महिलाओं का यह सद्गुण स्पष्टतः ही स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी से पैदा हुआ था और इसलिए स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी का परिचायक था। यह पितृसत्तात्मक समाज का द्योतक था। ठीक इसीलिए अब महिलाओं द्वारा नशे का सेवन असल में उनकी पुरुषों के साथ बराबरी का सूचक था। नशाखोरी अब यदि दुर्गुण था तो वह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए था। महिलाओं ने अपना पुराना ‘सद्गुण’ छोड़ दिया था। इसीलिए वेब्लेन ने यह सामान्य थीसिस प्रस्तावित की कि नये यानी पूंजीवादी समाज में महिलाओं द्वारा पुरुषों की तरह नशाखोरी महिलाओं की मुक्ति का सूचक था। वे अपना पुराना ‘सद्गुण’ छोड़कर जो ‘दुर्गुण’ ग्रहण कर रही थीं वह उनकी बराबरी व आजादी को दिखा रहा था।
वेब्लेन की यह बात सामाजिक भद्रता और खासकर गालियों के बारे में भी सच है। सामंती समाजों में महिलाओं से बातचीत में खासी भद्रता की मांग की जाती थी। उनके मुंह से गाली निकलना तो मानो जुर्म ही होता था। यह इसके बावजूद कि ढेरों गालियां महिलाओं के संदर्भ में ही बनी थीं। बातचीत में भद्रता और गालियों से दूरी को स्वयं महिलाओं ने भी अपना सद्गुण मान लिया था। उन्होंने पुरुष प्रधान समाज द्वारा अपने ऊपर थोपी गयी नैतिकता को अपना सद्गुण बना लिया था। वैसे यह रेखांकित करना होगा कि नशाखोरी या गालियों के संबंध में उपरोक्त बातें मध्यम या उच्च वर्गीय महिलाओं पर ही ज्यादा लागू होती थीं। निम्न वर्गों में महिलाओं में पर्याप्त नशाखोरी व गाली-गलौच प्रचलित थे। लेकिन तब यह भी ध्यान रखना होगा कि निम्न वर्गों में स्त्री-पुरुष बराबरी भी ज्यादा थी। भारत में शूद्र व अन्त्यज जातियों (आज की पिछड़ी व दलित जातियों) की महिलाओं में पुनर्विवाह व विधवा विवाह प्रचलित थे जबकि सवर्ण जातियों में ये प्रतिबंधित थे।
पूंजीवादी समाजों में समय के साथ नशाखोरी की तरह बातचीत में अभद्रता व गालियों के मामले में भी महिलाओं में चलन बढ़़ा है। इन मामलों में महिलाओं ने अपना ‘सद्गुण’ छोड़ दुर्गुण अपना लिया है। उन्होंने मान लिया है कि अभद्र भाषा और गालियां यदि पुरुषों के लिए दुर्गुण नहीं हैं तो उनके लिए दुर्गुण क्यों होंगी? और यदि वे दुर्गुण हैं तो वे इस मामले में भी पुरुषों की बराबरी करेंगी। यह अलग बात है कि वे उन्हीं गालियों का इस्तेमाल करती हैं जो ज्यादातर महिलाओं को लक्षित होती हैं। लेकिन चूंकि भाषा व भाषा में गालियों का आविष्कार उन्होंने तो किया नहीं तो वे स्वयं को निर्दोष मान सकती हैं।
सामंती या पुरुष प्रधान मानसिकता के पुरुषों को आज की महिलाओं का यह व्यवहार बेहद परेशान करता है। उन्हें ‘कल्चरल शाक’ या सांस्कृतिक धक्का लगता है। वे महिलाओं के ‘सद्गुण’ के आदी होते हैं। उन्हें महिलाओं द्वारा ‘दुर्गुण’ अपनाना अंदर तक परेशान कर जाता है। वे बेचैन हो उठते हैं या ज्यादा सही कहें तो बिलबिला उठते हैं। इनमें से लंपट तो इन ‘दुर्गुणों’ की शिकार महिलाओं को सबक सिखाने पर उतर आते हैं। मां-बहन की गालियां और बलात्कार की धमकियां इसमें उनके कुछ हथियार होते हैं।
पर सांस्कृतिक धक्के से बिलबिलाने वाले ये लोग चाहे सभ्य हों चाहे लंपट, मूल रूप में वे एक ही जगह से प्रस्थान कर रहे होते हैं। वे सामंती समाज में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले हीन स्थिति तथा उन पर थोपी गयी पाबंदियों के हामी होते हैं। उनकी महिलाओं के बारे में नैतिकता में महिलाओं की हीन स्थिति अंतर्निहित होती है। उनके सांस्कृतिक धक्के का असली कारण महिलाओं की इस हीन स्थिति का टूटना होता है। चूंकि यह अभिव्यक्ति भौंड़ी होती है, इसलिए वे नैतिक प्रवचन से या नाक-भौंह सिकोड़ कर अपने को सही ठहरा लेते हैं। लेकिन इससे सच्चाई बदल नहीं जाती। सच्चाई यही है कि महिलाओं द्वारा नशाखोरी से या गालियों के प्रयोग से उनकी पुरुष प्रधान मानसिकता को भारी आघात पहुंचा होता है। उनकी बिलबिलाहट का राज यही है।
वैसे कोई पूछ सकता है कि महिलाओं द्वारा पुरुषों की बराबरी क्या इसी तरह भौंड़े ढंग से ही हो सकती है? क्या पुरुषों से बराबरी के लिए महिलाओं द्वारा पुरुषों के दुर्गुणों को अपनाना जरूरी है? इसका उत्तर है, नहीं। यह बराबरी दूसरे तरीकों से भी हासिल हो सकती है और इसकी यानी बराबरी की अभिव्यक्तियां भी भिन्न तरह की हो सकती हैं। पर पूंजीवादी में ऐसा ही हो सकता है। स्त्री-पुरुष बराबरी के भिन्न रास्ते की मांग असल में समाज विकास के लिए पूंजीवाद से भिन्न रास्ते की मांग है। यह भिन्न रास्ता इंकलाब और समाजवाद के अलावा कुछ और नहीं हो सकता।
जब तक समाज इस भिन्न रास्ते पर नहीं बढ़ने लगता तब तक लड़कियों-स्त्रियों के आगे बढ़ते कदमों से पैदा हो रही उस बेचैनी और तिलमिलाहट का आनंद लिया जा सकता है जो छप्पन इंच वाले छोटे बंदरों में पैदा हो रही है।