संघी शासन में अफवाहें और रात भर जागते लोग

उ.प्र.-उत्तराखण्ड के कई जिलों में गांवों-शहरों में लोग रात-रात भर जाग रहे हैं। वे इस खौफ में जाग रहे हैं कि कोई ‘द्रोण चोर’ उनके यहां डकैती न डाल दे। लोग हाथों में डण्डे लिए रात में पहरा दे रहे हैं। रात में हर आने-जाने वाले की जांच कर रहे हैं। कई निर्दोष लोगों की बर्बर पिटाई लोग चोर समझ कर चुके हैं। पुलिस-प्रशासन ने यद्यपि द्रोण चोरी की बातों को अफवाह बताया है और एक भी ऐसी चोरी की सूचना न मिलने की बात की है। प्रशासन अफवाहों पर ध्यान न देने की बात कर रहा है पर अफवाहें एक के बाद एक जिले से होते हुए लगातार फैलती जा रही हैं। लोगों का मत है कि चोर पहले द्रोण से घरों की रेकी कर रहे हैं फिर चोरी-डकैती डाल रहे हैं।

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर में बाजपुर क्षेत्र में पहरा देते हुए एक मजदूर तेज कार की चपेट में आ जान गंवा चुका है। उ.प्र. के अमरोहा में ग्रामीणों ने फैक्टरी से काम से लौट रहे 6 निर्दोष मजदूरों को चोर समझ पीट दिया। बरेली के फरीदपुर में रात में स्टेशन से लौट रहे 4 लोगों को भीड़ चोर समझ कर पीट चुकी है। ऐसी छोटी-छोटी अनेकोनेक घटनायें घट चुकी हैं पर दहशत का माहौल घट नहीं रहा है।

अब खबर आ रही है कि सर्वेक्षण विभाग पश्चिमी उ.प्र. की नदियों का द्रोण से सर्वेक्षण करा रहा था व इन्हीं द्रोणों को रात में देख यह दशहत पैदा होनी शुरू हुई। अब रात में सर्वेक्षण कार्य रोक दिया गया है। प्रशासन ने सभी द्रोण मालिकों की जांच व बगैर अनुमति द्रोण न इस्तेमाल करने की बातें की हैं।

अफवाहें क्यों 21वीं सदी के विज्ञान के युग में इस कदर फैल रही हैं? इन अफवाहों के फैलने का संघ-भाजपा के शासन से क्या लेना-देना है? क्यों लोग अफवाहों के वशीभूत हो रात-रात भर जाग रहे हैं और बगैर जांचे-परखे किसी भी निर्दोष को पीट दे रहे हैं? संघी संगठनों की इसमें क्या भूमिका है?

दरअसल आज हर हाथ में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया पर मनगढंत सूचनाओं की भरमार ने अफवाहों के प्रसार को बेहद सरल बना दिया है। इस मामले में विज्ञान के आविष्कार दरअसल लोगों के बीच अवैज्ञानिकता-अतार्किकता-अफवाह फैलाने के ही माध्यम बना लिये जा रहे हैं। सरकारों ने जन-जन तक मालों के रूप में फोन तो पहुंचा दिये हैं पर वैज्ञानिक सोच पहुंचाने का कोई काम नहीं किया है। संघ-भाजपा तो इस मामले में और बुरी स्थिति पैदा कर रही है। उसकी सरकारें हर तरह की कूपमण्डूकता-पाखण्ड-अंधविश्वास को बढ़ावा दे लोगों को तर्क, विज्ञान से दूर ले जा रही है। संघ-भाजपा के संघी एजेण्डों के आगे बढ़़ने के लिए यह जरूरी है कि लोग सामान्य तर्क-समझ से दूर हो अंधविश्वासी भीड़ में बदल जायें। तभी लव जिहाद, लैण्ड जिहाद, गौरक्षा आदि आदि मसलों पर इस अंधविश्वासी भीड़ को हिंसक बना दूसरों की जान लेने के लिए ढकेला जा सकता है। तभी मोदी शासन के प्रति लोगों में अंधश्रद्धा पैदा की जा सकती है।

इस अंधश्रद्धा वाली भीड़ में समाज को तब्दील करने में भाजपा शासन वाले राज्य पुरजोर तरीके से लगे हुए हैं। संघी संगठन जमीनी स्तर पर इस अंधश्रद्धा का नेतृत्व कर रहे हैं। पाठ्यपुस्तकों-विद्यालयों-शोध संस्थानों सब जगह से विज्ञान-तर्क की छुट्टी कर कूपमण्डूकता का बोलबाला कायम किया जा रहा है। ऐसे में समाज आज अफवाहों के प्रति पहले से ज्यादा ग्रहणशील बन चुका है।

और एक ऐसे समय में जब बेकारी आसमान छू रही हो, हर गांव-मोहल्लों में बेकार नौजवानों की ठीक-ठाक संख्या मौजूद हो, जब लोगों की कमाई-सम्पत्ति लगातार घट रही हो तब चोरी की अफवाह भी लोगों को भयभीत करने के लिए काफी होती है। लोग अपनी नाम मात्र की सम्पत्ति के छिनने से भयभीत हो जाते हैं और महिलायें-बेकार नौजवान-बच्चे सभी पहरेदारी करने, रात-रात जागने को विवश हो जाते हैं और उनका यही भय निर्दोषों को पीटने तक ले जाता है।

अक्सर ही संघी संगठनों के छुटभैय्ये खुद घोर अतार्किक व अंधश्रद्धा के शिकार होते हैं। ऐसे में बात चाहे संघी एजेण्डे पर भीड़ को हिंसा की ओर धकेलने की हो या फिर द्रोण चोर से पहरेदारी की, ये हर जगह बढ़ चढ़कर भूमिका निभाते पाये जाते हैं। इनकी अफवाह मशीनरी पर अंधश्रद्धा इतनी तगड़ी होती है कि ये शासन-प्रशासन की बात तक नहीं सुनते। ये खुद अफवाह फैलाने के बड़े जरिये बन जाते हैं। हालांकि अन्य कूपमण्डूक लोग भी इस काम में उनकी मदद करते हैं।

शासन-प्रशासन या सरकार इस तांडव को रोकने का काम क्यों नहीं करती जबकि वह यह आसानी से कर सकती है। अधिकारी-नेता हर मोहल्ले-गांव घूमकर लोगों को जागरूक कर अफवाहों से दूर रख सकते हैं। मीडिया भी इन अफवाहों के पर्दाफाश में भूमिका निभा लोगां को वैज्ञानिक सोच पर खड़ा कर सकता है। पर यह सब नहीं किया जाता क्योंकि यह सब करना संघी एजेण्डे के हित में नहीं है। अगर लोग एक जगह पर तार्किक बनेंगे तो संघी एजेण्डों पर भी तर्क की ओर बढ़ जायेंगे। इसीलिए भाजपाई शासन इन अफवाहों से लोगां को दूर करने का कोई प्रयास नहीं करता। बल्कि मीडिया तो इन्हें बढ़ावा ही दे रहा होता है। इसी बहाने शासन-सरकार बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान भटका पहरेदारी सरीखे काम में उन्हें लगा खुद को लोगों के आक्रोश से सुरक्षित बनाये रखते हैं।

अगर समाज में लव जिहाद-लैण्ड जिहाद पर भीड़ द्वारा अल्पसंख्यकों की हत्यायें बढ़ेंगी, शासन के प्रति अंधश्रद्धा बढ़ेगी तो इसी भीड़ द्वारा कभी बच्चा चोर, कभी द्रोण चोर समझ निर्दोष लोगों की हत्यायें-पिटाई की घटनायें भी बढ़ेंगी। कूपमण्डूकता अध्ांश्रद्धा-अतार्किकता अपना असर चौतरफा दिखायेगी। संघ-भाजपा के हिन्दू राष्ट्र में इस सबसे बचा नहीं जा सकता।

इसीलिए अगर इस सबको रोकना है तो फासीवादी सरकार-शासन के प्रति लोगों को सचेत करना होगा और तर्क-विज्ञान पर खड़ा कर इस शासन-सत्ता के खिलाफ लामबंद करना होगा। तब जो भीड़ इनके इशारों पर निर्दोषों की जान लेने पर उतारू है वह इनके आकाओं के महलों-कार्यालयों की ओर गुस्से से बढ़ जायेगी।

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