अर्थव्यवस्था

सट्टेबाज देश

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देश की हिन्दू फासीवादी सरकार ने भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में भले ही सफलता न पाई हो पर उसने पूरे देश को सट्टेबाज बनाने में जरूर सफलता प्राप्त कर ली है। आज पूंजीपत

भ्रामक आंकड़े

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आंकड़े जितने मासूम और सीधे-सादे दिखायी देते हैं उतने होते नहीं हैं। आंकड़ों का खेल एक ऐसा खेल है जो किसी अच्छे पढ़े-लिखे आदमी को भी दिवाली के घनचक्कर पटाखे की तरह घुमा-घुमा

भारतीय अर्थव्यवस्था बदहाल

पिछले वित्त वर्ष में संगठित रिटेल सेक्टर के कारोबार में 4 प्रतिशत की गिरावट आई

नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में अब जनता की आशाओं पर तुषारापात होने लगा है। पिछले 10 साल से सत्ता पक्ष ने अपनी गढ़ी कहानियों के जरिये लोगों में कुछ बेहतर करने की उम्मीद

अमेरिका में मंदी की आहट : दुनिया भर के शेयर बाजार सहमे

अमेरिका में मंदी

5 जुलाई को दुनिया भर के शेयर बाजार एक के बाद एक भारी गिरावट का शिकार हुए। अमेरिका के शेयर बाजार से शुरू होकर यूरोप, जापान, भारत एक तरह से दुनिया के सारे शेयर बाजार गोता ल

हिंडनबर्ग का जिन्न और मोदी सरकार

हिंडनबर्ग का जिन्न

हिंडनबर्ग संस्था का जिन्न एक बार फिर मोदी सरकार को सताने लगा है। लगभग डेढ़ साल पहले शार्ट सेलिंग कम्पनी हिंडनबर्ग ने भारत के शीर्ष पूंजीपति अडाणी के ऊपर घोटाले का आरोप लगा

श्रम सघन उद्योगों का घटता निर्यात : लाखों मजदूरों का जीवन दांव पर

भारत से वस्तुओं का निर्यात यद्यपि स्थिर बना हुआ है। जबकि श्रम सघन उद्योगों से निर्यात में तेज गिरावट हुई है। ये श्रम सघन उद्योग हैं कपड़ा एवं वस्त्र उद्योग, जेम्स एंड ज्वे

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?