सरकार ने आंगनबाड़ी योजना 1975 में लागू की थी। आंगनबाड़ी योजना को एकीकृत बाल विकास सेवा कहा गया। सरकार के अनुसार आंगनबाड़ी योजना शुरू करने का मुख्य कारण कुपोषण से लड़ना है। 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण और भूख की समस्या को कम करने के लिए और शिशु मृत्यु दर को कम करने के नाम पर योजना बनाई गई थी। इसके साथ ही छोटे बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए आधार तैयार करना और उन्हें पूर्व-विद्यालयी (3-6 साल के बच्चों को) शिक्षा देने का कार्य करना आदि मुख्य काम निर्धारित किए गए। इसके अलावा टीकाकरण, पोलियो ड्राप पिलाना, जनगणना और अब बीएलओ बनाकर एसआईआर कराने आदि जैसे तमाम कार्य आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से कराए जाते हैं।
आज पूरे देश में लगभग 40 लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाएं काम कर रही हैं। इनको सरकार ने स्कीम वर्कर के तहत नाममात्र के मानदेय पर कार्य पर रखा है।
लेकिन सरकार की मंशा ऐसी लगती नहीं कि वह देश से कुपोषण खत्म करना चाहती है। हां! इस योजना के जरिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों को पूरा करने और दुनिया में अपना नाम चमकाने के लिए सरकार जरूर प्रयासरत थी। क्योंकि गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए एक समय का खाना या नाममात्र की चीजें देकर कुपोषण खत्म नहीं किया जा सकता। इससे अच्छा तो मजदूर-मेहनतकश महिलाओं को रोजगार और बेहतर जीवन जीने लायक वेतन देकर कुपोषण जैसी समस्याओं को खत्म किया जा सकता है।
न तो उस समय की कांग्रेस सरकार ने और न वर्तमान भाजपा सरकार ने ऐसा किया। क्योंकि ऐसा होता तो इस योजना में काम करने वाली महिलाओं से सरकार नाममात्र के मानदेय पर काम नहीं कराती। उस समय जब यह योजना लागू की गई थी तब उन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मात्र 100-150 रुपए मिलते थे। तब से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मिलकर समय-समय पर संघर्ष करती रही हैं कि उनको न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए। उन्हीं संघर्षों के दम पर आज केंद्र सरकार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 4500 तथा मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को 2250 रुपए देती है।
इसके अलावा राज्य सरकारों का अलग हिस्सा होता है। राज्य अपनी मर्जी से कहीं कुछ तो कहीं कुछ राशि इन कार्यकर्ताओं को दे रहे हैं। इस तरह एक देश में एक ही योजना के तहत एक जैसा काम करने के बाद भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मानदेय है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से कई तरह के काम कराने के बावजूद सरकार उन्हें नाममात्र का मानदेय देती है जो एक तरह से बेगारी सरीखा ही है।
उत्तराखंड में लगभग 20,088 आंगनबाड़ी केंद्र हैं जिसमें लगभग 40 हजार से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के पद हैं जिसमें लगभग 15 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, 5100 मिनी कार्यकर्ता और 15 हजार सहायिका कार्यरत हैं। इनमें से 374 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और लगभग 5 हजार सहायिकाओं के पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा आंगनबाड़ी केंद्रों में ही अब कुछ चुनिंदा केन्द्र ऐसे भी खोले गए हैं जो सुबह 9 बजे शाम 5 बजे तक खुलेंगे। इनको खोलने का उद्देश्य बताया जा रहा है जो महिलाएं काम करने जाती हैं उनके बच्चे यहां रहेंगे। यानी एक तरह का डे केयर।
देखने में और सुनने में तो ऐसा लग रहा है जैसे सरकार कामकाजी महिलाओं की कितनी शुभचिंतक है। लेकिन ऐसी सुविधाओं का कितनी महिलाएं फायदा उठा सकती हैं। एक तो वैसे ही चुनिंदा केन्द्र हैं जो सब जगह तो उपलब्ध हो नहीं सकते और दूसरी बात, आज देखा जाए तो कितनी महिलाएं हैं जो 9 से 5 तक का काम करती हैं। अधिकांश महिलाएं फैक्टरी संस्थानों में काम करती हैं जहां उनसे 12-12 घंटे काम करवाया जाता है। जहां उनका अथाह शोषण उत्पीड़न होता है। हाल ही में गुड़गांव, राजस्थान, नोएडा (उत्तर प्रदेश), उत्तराखण्ड में ठेके में काम करने वाली महिलाएं सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रही थीं। अपनी दुख-पीड़ा बता रही थीं तब इसी भाजपा सरकार ने जो महिलाओं की हितैषी बनती है उन महिलाओं पर लाठी-डंडे बरसाए। उनका पुलिस द्वारा दमन किया गया और कुछ महिलाओं को जेलों में बंद कर दिया गया।
उत्तराखण्ड में आज भी 9300 रु. प्रतिमाह आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मानदेय मिलता है। 4500 रुपये केन्द्र सरकार और 4800 रुपये राज्य सरकार देती है। इसके अलावा मिनी कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं को 4500 रुपए प्रति माह मानदेय मिलता है। इसमें 2250 रुपये केंद्र सरकार और 2250 रुपये राज्य सरकार देती है। इसके साथ ही उनकी सक्रियता के आधार पर प्रोत्साहन राशि 500 और 250 रुपए दी जाती है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिका लंबे समय से न्यूनतम वेतन 26 हजार रुपये करने, सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने, रिटायरमेंट पर एकमुश्त राशि और ग्रेच्युटी, पी एफ, पेंशन, ईएसआई आदि मांगों को लेकर आंदोलन कर रही हैं। लेकिन सरकार इनकी मांगों को हल करने के बजाय टालती जा रही है। सरकार आश्वासन देती है और भूल जाती है।
उत्तराखण्ड में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं और मिनी कार्यकर्ताओं की इन मांगों को लेकर बीएमएस और सीटू जैसी सेंट्रल ट्रेड यूनियन इनके बीच काम कर रही हैं। लेकिन इनके अलावा भी कुछ स्वतंत्र संगठन बनाकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाएं संघर्ष कर रही हैं।
बीएमएस (भारतीय मजदूर संघ) जो कि भाजपा का संगठन है। यह देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन का दावा करता है। यह आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच भी काम कर रहा है। केन्द्र-राज्य दोनों जगह भाजपा सरकारें हैं। यह संगठन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की लड़ाई लड़ने की बात करता है पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को संघर्ष में उतारने के बजाय वर्ग सहयोग की राजनीति पर चल मंत्रियों को ज्ञापन आदि देने का काम करता है। यह आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अपनी ही सरकार के खिलाफ संघर्ष करने की ओर नहीं ले जा सकता।
सीटू (भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र) के लोग आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच आल इंडिया फेडरेशन आॅफ आंगनबाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर्स यूनियन बना कर कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तराखंड संयुक्त ट्रेड यूनियन संघर्ष समिति के नाम से एक संगठन मौजूद है। यह एक संयुक्त मंच है इसमें सीटू, एटक, इंटक और अन्य वामपंथी संगठन शामिल रहते हैं। ये भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को संगठित करने का काम कर रहे हैं।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ती/सेविका/मिनी कर्मचारी संगठन, उत्तराखंड नाम से काम कर रहा है। यह आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच एक हद तक जुझारू संघर्ष कर रहा है। ये संगठन पिछले लगभग एक महीने से हड़ताल पर है और अलग-अलग शहरों में धरना चल रहा है। हाल ही में इनकी वार्ता भी हुई लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ है। आंदोलन अभी जारी है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाएं मिलकर जुझारू संघर्ष करती हैं। एक-एक महीना कार्य बहिष्कार करती हैं, धरना चलता है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबा आंदोलन चलता है। जैसे ही आंदोलन संघर्ष के उच्च स्तर पर पहुंचता है वैसे ही ट्रेड यूनियनों के नेता वार्ता कर आश्वासन पर आंदोलन खत्म कर देते हैं। कुछ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब सब संगठनों की एक जैसी ही मांगें हैं तो सबको एक साथ एकजुट होकर संघर्ष करना चाहिए। ऐसे तो हम बंट जाते हैं, हमारी ताकत कमजोर हो जाती है। एक ग्रुप हड़ताल करता है और दूसरे ग्रुप की कार्यकर्ता काम करती हैं। इससे सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
ऐसे सुधारवादी भाषणों में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले और व्यवहार में सरकार के पक्ष में खड़े होने वाले संगठनों और नेताओं से दुखी-परेशान होकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या तो स्वतंत्र संगठन बना रही हैं या फिर निष्क्रिय होकर केवल अपना काम कर रही हैं।
असल में सरकार यही चाहती है कि आंदोलन लंबा खिंचता रहे और जैसे ही आंदोलन उग्र होता दिखता है तो वार्ता करके, आश्वासन देकर आंदोलन को ठंडा कर दो। या तो आंगनबाड़ी के लोग ऐसे ही संगठनों के पीछे लगे रहेंगे या फिर पस्त होकर घर बैठ जाएंगे।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को तीसरा रास्ता चुनने की जरूरत है। जहां वे अपनी क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन बनाएं और संघर्ष करें।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिकाएं अपने जीवन में केवल नौकरी की समस्या से ही परेशान नहीं हैं बल्कि महंगाई, बेरोजगारी, महिला हिंसा, नशाखोरी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से भी जूझ रही हैं। समाज में केवल आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ही परेशान नहीं हैं। उन्हीं की तरह भोजनमाताएं, आशा वर्कर, उपनल, संविदा कर्मचारियों के साथ देश की मजदूर मेहनतकश आबादी भी परेशान है। ये सब मजदूर-मेहनतकश आबादी का हिस्सा हैं।
ये सब देश के ही नागरिक हैं मगर संविधान में हासिल अधिकारों से मेहनतकशों को वंचित किया जा रहा है। धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर मजदूरों-मेहनतकशों को बांटा जा रहा है। सभी के साथ एक बंधुवा मजदूर की तरह ही व्यवहार किया जा रहा है।
इन सभी स्कीम कार्यकर्ताओं को समझना होगा कि यह समाज बड़े-बड़े धन्नासेठों (एकाधिकारी पूंजीपतियों) का समाज है। इस समाज में इन्हीं की मौज है जो कुछ मेहनत नहीं करते हैं और मेहनतकशों की कमाई को लूटते हैं। मजदूर मेहनतकश आबादी से बेगारी करवाते हैं और मजदूर मेहनतकशों का जीवन बदहाल करते जाते हैं। और सरकार इन धन्नासेठों की लूट बढ़ाने का काम करती है। सरकार उन्हीं के लिए काम करती है। मजदूरों-मेहनतकशों को इन धन्नासेठों (पूंजीपतियों) के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है। उनके खिलाफ संघर्ष करने की जरूरत है। इस लूट पर टिके समाज को खत्म करने की जरूरत है। मजदूरों-मेहनतकशों का समाज बनाने की जरूरत है।