अखण्ड भारत और मणिपुर हिंसा

नई संसद में मोदी सरकार ने अखण्ड भारत का नक्शा लगवाया है। इस नक्शे के जरिये हिन्दू फासीवादियों ने मानो इस बात का खुलेआम एलान कर दिया है कि उनके फासीवादी हिन्दू राष्ट्र में पाक-अफगानिस्तान से लेकर बांग्लादेश सभी शामिल होंगे। इस नक्शे के जरिये भारत सरकार खुलेआम पड़ोसी राष्ट्रों की सम्प्रभुता पर हमला भी बोल रही है। एक पड़ोसी शासक ने तो इस नक्शे पर आपत्ति भी दर्ज करायी। 
    

हिन्दू फासीवादी चाहते हैं कि भारत का विस्तार अफगानिस्तान तक हो जाये पर ऐसा वे इन देशों की सत्ताओं के साथ किसी सहमति के बजाय जोर-जबर्दस्ती से चाहते हैं। इन्हें पड़ोसी देशों में रहने वाली विभिन्न धर्मों को मानने वाली जनता से कोई मतलब नहीं है। इन्हें तो अपने हिन्दुत्व का डंडा बाकी सारे धर्मों के अनुयाइयों पर चलवाना है। यानी इनका अखण्ड भारत एक ऐसा हिन्दू राष्ट्र होगा जिसमें हिन्दुत्ववादी शासक बाकी सभी धर्मों के लोगों को कुचलेंगे। यह ताकत व बल पर जबर्दस्ती कायम किया जायेगा जिसमें पड़ोसी मुल्कों को दबा-कुचलकर शामिल करवाया जायेगा। 
    

हिन्दू फासीवादियों की इस चाहत का ही कमाल है कि आज भारतीय शासकों के रिश्ते सारे पड़ोसियों से खासे खट्टे हो चुके हैं। ऐसे में पाकिस्तान से तो इनका झगड़ा पहले ही से था। अब श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि भी भारत की जगह चीनी साम्राज्यवाद से रिश्ते मजबूत करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुल मिलाकर अखण्ड भारत का सपना देखने वाले भारतीय शासकों का द.एशिया में प्रभाव घट रहा है। 
    

इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। अखण्ड भारत का सपना देखने वालों से भारत में शामिल मणिपुर में छिड़ी जातीय हिंसा पूरी कोशिश के बावजूद नहीं रुक रही है। हिंसा भड़कने के 40 दिन बाद मणिपुर गये अमित शाह का दौरा भी विफल हो चुका है। उनकी बनाई शांति समिति में ढेरों लोग शामिल होने से इंकार कर चुके हैं। कुछेक ने तो यह तक कहा कि सरकार ने उनसे पूछे बगैर उनका नाम शांति समिति में डाल दिया। कुछेक मुख्यमंत्री के समिति में होने के चलते उसका बहिष्कार कर रहे हैं। अमित शाह के जाने के 1 दिन बाद हुई हिंसा में 9 लोग मारे गये हैं। 
    

दरअसल मणिपुर में मैतेई लोगों व कुकी/नागा जनजातियों के बीच छिड़ी इस हिंसा में भड़काने का काम स्वयं भाजपा सरकार ने किया था। उसने मैतेई लोगों को एस टी श्रेणी में डालने की बातें कर कुकी जनजाति को भड़काने का काम किया। गौरतलब है कि मणिपुर के पहाड़ी-जंगली इलाकों में केवल एसटी लोग ही जमीन खरीद सकते हैं। जहां मैतेई लोग खुद को हिन्दू मानते हैं वहीं कुकी जनजाति में बड़ी संख्या ईसाई धर्म मानने वालों की है। ऐसे में भाजपा सरकार ने यहां भी साम्प्रदायिक वैमनस्य का खेल खेलकर दोनों पक्षों को भिड़वाकर अपना आधार मैतेई लोगों में बनाया है। इसी वैमनस्य के दम पर भाजपा चुनाव जीतने की स्थिति में पहुंची। 
    

दरअसल मणिपुर उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों की तरह भारत की एक ऐसी उत्पीड़ित राष्ट्रीयता रही है जिसे वहां की जनता की राय के उलट जबरन भारतीय संघ में शामिल किया गया। इस पर कब्जा बनाये रखने के लिए भारी सैन्य बल व अफस्पा लागू किया गया। यहां मौजूद जनजातीय लोग अभी राष्ट्रीयता के स्तर पर विकसित भी नहीं हुए थे कि उन्हें भारतीय संघ में मिला लिया गया। ऐसे में यहां जहां भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष शुरू हुआ वहीं जनजातियों में परस्पर संघर्ष भी मौजूद रहा। भारतीय शासकों ने इन परस्पर संघर्षों का इस्तेमाल राष्ट्रीयता के संघर्षों को कमजोर करने में किया और भारतीय शासक काफी हद तक इसमें सफल भी रहे। 
    

जनजातियों के बीच साम्प्रदायिक संघर्ष जिन्हें भारतीय शासकों ने पाला-पोसा था अब भस्मासुर स्तर तक बढ़ चुका है। भाजपा ने इस संघर्ष को धार्मिक रंग दे और आग लगाने का काम किया है। परिणाम यह हुआ कि आज मणिपुर में मैतेई व कुकी आबादी एक-दूसरे की इस कदर दुश्मन बन चुकी है कि वह कहीं भी एक साथ रहने को तैयार नहीं है। दोनों पक्ष एक दूसरे पर दुश्मनों की तरह हमला बोल हत्यायें कर रहे हैं। मैतेई लोग मणिपुर पुलिस पर भरोसा करते हैं तो कुकी लोग असम रायफल्स व अन्य सैन्य बलों पर। 
    

अखण्ड भारत का सपना देखने वाले हिन्दू फासीवादियों से छोटा सा राज्य मणिपुर तक नहीं संभल रहा है। गृहमंत्री अमित शाह का 4 दिवसीय दौरा, 100 करोड़ का राहत पैकेज, शांति समिति सब कुछ हिंसा रोकने में असफल साबित हो रहे हैं। हिन्दू फासीवादियों की खुद की लगाई आग में निर्दोष मणिपुरी जनता एक-दूसरे के हाथों मारी जा रही है। 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।