जुलाई-अगस्त 2024 के जनउभार के परिणामस्वरूप बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार उखाड़ फेंकी गयी। इसके बाद से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में काफी तब्दीली आई है। मोहम्मद युनूस के कार्यकाल में रिश्ते ठंडे बने रहे। भारत सरकार की तरफ से उस वक्त यह कहा गया कि वह लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुयी सरकार के आने के बाद रिश्तों को ठीक करने की दिशा में प्रयास करेगी। अब बांग्लादेश में चुनाव के बाद तारिक उर रहमान के सत्ता में आने के छह माह बीत जाने के बाद रिश्ते ठीक होना तो दूर, भारत सरकार की तरफ से तारिक उर रहमान को भारत आने का न्यौता उनके द्वारा ठुकरा दिये जाने के बाद इन रिश्तों की कड़वाहट जगजाहिर हो गयी है।
भारत और बांग्लादेश दोनों पिछड़े पूंजीवादी देश हैं। दोनों ही देशों के भीतर मजदूर मेहनतकश जनता गरीबी और बदहाली का शिकार है। जिन समस्याओं की वजह से दो वर्ष पहले बांग्लादेश के नौजवान सड़कों पर उतरे थे, उन्हीं समस्याओं के खिलाफ आज भारत की युवा पीढ़ी का आक्रोश सुलगता हुआ दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के शासक साम-दाम-दण्ड-भेद का इस्तेमाल कर जनता के कोष से अपने देश के पूंजीपति वर्ग की हिफाजत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में दोनों देशों के बीच की कूटनीतिक टकराहट इन देशों के शासकों के लिए अशुभ संकेत ही देती है, यह इसलिए भी कि वैश्विक और क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव अनिश्चितता को गहरा देते हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच के रिश्तों की जटिलता भारत के लिए इस मायने में बढ़ जाती है कि इन रिश्तों में खराबी भारत के ऊपर चीन और पाकिस्तान के दबाव को बढ़ा देगी। चीन और भारत बांग्लादेश के सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार हैं। बांग्लादेश चीन की बेल्ट रोड परियोजना का भागीदार है। चीन के साथ बांग्लादेश के रिश्तों पर सरकारों की अदला-बदली से कोई खास असर नहीं पड़ा है। वैसे तो बांग्लादेश का कहना है कि उसके लिए चीन और भारत दोनों से रिश्ते महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह स्थिति बदल भी सकती है। पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के रिश्ते पिछले दो साल में बेहतर हुए हैं। दोनों ही देशों की प्रतिरक्षा प्रणाली में चीनी तकनीक के योगदान की वजह से और चीन के साथ दोनों देशों की निकटता की वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश आगे और ज्यादा करीब आएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुए प्रतिरक्षा समझौते में बांग्लादेश की तरफ से दिलचस्पी दिखाई जा रही है। अगर भारत सरकार की विदेश नीति इस सब में किसी भी तरह के कारक के बतौर भूमिका निभा रही है तो इस विदेश नीति की विफलता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है।
शेख हसीना के खिलाफ बांग्लादेश में जनाक्रोश उपजने के बाद भारत ने उन्हें अपने यहां शरण दी। उस समय ही यह स्पष्ट था कि यह चीज भारत और बांग्लादेश के बीच के सम्बन्धों के लिए मनमुटाव की वजह बनेगी। इसके बाद जले पर नमक छिड़कने का काम तब हुआ जब शेख हसीना ने भारत की जमीन से अभी 5 अगस्त को बयान जारी किया कि वह बांग्लादेश में लोकतंत्र की पुनर्बहाली के लिए बांग्लादेश जाएगीं। यद्यपि भारत सरकार ने फटाफट अपने को इस बयान से अलग किया, लेकिन यह कोई भी मानने को तैयार नहीं है कि भारत सरकार की अनुमति के बगैर शेख हसीना ऐसा कर सकती थीं। इसके बाद तारिक उर रहमान का अगस्त के तीसरे सप्ताह में भारत दौरा रद्द हो गया। सितम्बर माह में ब्रिक्स की बैठक में बिम्सटेक के अध्यक्ष के बतौर बांग्लादेश को दिये गए निमंत्रण पर भी बांग्लादेश की तरफ से संशय पैदा किया जा चुका है।
प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक नेता होने की छवि की पहले ही पोल खुल चुकी है। जिस डोनाल्ड ट्रंप से अपनी दोस्ती की शेखी बघारते वे नहीं थकते थे, वह आज बार-बार उन्हें लज्जित कर रहा है। आपरेशन सिंदूर रुकवाने को लेकर दिये गये ट्रंप के बयान से शुरू होकर भारतीय लोगों को बेड़ि़यों में जकड़कर देश से निकालने से होते हुए अत्यधिक तटकर लगाने तक यह पहुंचा है। जहां तक भारत पर अमेरिकी तटकर लगने का भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ने वाले असर की बात करें तो यहां एक तथ्य महत्वपूर्ण हो जाता है। बांग्लादेश से निर्यातित मालों का सबसे बड़़ा बाजार अमेरिका है। इन मालों में वस्त्र एवं तैयार परिधान प्रमुख हैं। तटकरों के बढ़ने से भारत में वस्त्र उद्योग पर बुरा असर पड़ रहा है। अमेरिका ने बांग्लादेश पर तटकरों में इस तरह की वृद्धि नहीं की है। भारत बांग्लादेश को वस्त्र उद्योग में उपभोग होने वाली सामग्रियों का निर्यात करता है। क्या ऐसे में बांग्लादेश भारत से अमेरिकी निर्यात के लिए बीच की कड़ी हो सकता है, यह एक दूर की कौड़ी है। फिलहाल तो ज्यादा फौरी सवाल यह है कि मोदी सरकार की भारत को विश्वगुरू बनाने की नीति से भारत को फायदा हो रहा है या नुकसान।