एक मजदूर की अपने मजदूर साथियों से अपील

कारखाने में काम करते हुए, सब कुछ सहन करते, चलते-फिरते मशीनों और लाशों में तब्दील होते हम मजदूर, जिनको अब कुछ भी महसूस नहीं होता है। अपने आस-पास हो रहे गलत का विरोध करने की ताकत भी हम मजदूरों में नही रही है। कोई भी गलत बात अब हम को प्रभावित नहीं करती है।
    
मशीन पर कार्य करते हुए एक मजदूर का हाथ मशीन में आने से उस मजदूर का अंगूठा कट जाता है। और उसको अगले ही दिन कारखाने से निकाल दिया जाता है, और ये बात हम मजदूरों को बिलकुल भी नहीं कचोटती है।
    
जब भी कोई मजदूर इस दमन और शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे भी तानाशाही फरमान सुना काम से निकाल दिया जाता है।
    
और इतना कुछ होने के बाद भी हम मजदूर हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं।
    
ऐसे तो नही थे हम, कि घटनाएं कुचलती जाएं, और हम मूकदर्शक बन अपनी बारी का इंतजार करते रहें।
    
हम करते थे विरोध गलत का, शोषण का। पहले हम मजदूर हर दमन, हर शोषण का जवाब अपनी सामूहिक एकता से देते थे। हम कारखाने में काम करने वाले हर मजदूर के सुख-दुख में उसके साथ खड़े रहते थे। और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत थी।
    
लेकिन दमन और शोषण के खिलाफ लड़ते-लड़ते हम मजदूर शोषकों के षडयंत्र के शिकार क्यों हो गए?
    
हम मजदूर ठेका-परमानेंट, नकली-असली में बंट गए। अपना-अपना स्वार्थ देखने लग गए।
    
हम मजदूरों को चाहिए कि हम स्वार्थ से परे हटकर, अपने जिंदा होने का सबूत देते हुए, अपने भीतर के सारे विभेद खत्म करते हुए फिर से अपनी सामूहिक एकता बनाकर अपने भाईचारे का परिचय दें। वर्ग एकता के द्वारा सब कुछ संभव है
        
-एक मजदूर, बेलसोनिका

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?