हे राम ! (भाग-2)

हे राम! तू है अगर कहीं
आ, उतर आ, जमीन पर
पापियों को दे सजा
न्याय कर, इंसाफ कर।
क्या कसूर था किया
क्या, बता था उनका दोष
उजाड़ दी हैं बस्तियां
कर दिया है जमींदोज़
अपराध तू भी कर रहा
जुल्मियों को माफ कर।
पापियों को दे सजा
न्याय कर, इंसाफ कर।।

प्राण प्रतिष्ठा हो गयी
मंदिर तेरा बन गया
वो बंदे तेरे जाये कहां
घरबार जिनका छिन गया 
कैसा रामराज है ये
कैसी जय जयकार है,
बुलडोजर का शासन है
जनता में हा हा कार है,
चुपचाप सब कुछ देखता
तू कैसा पालनहार है।
कैसे कहूं दयालु है तू
खता मेरी माफ कर।
पापियों को दे सजा
न्याय कर, इंसाफ कर।।

दंगा, नफरत, गुंडागर्दी
सब कुछ तेरे नाम पर
इंतेहा है हो गयी
जुल्म की आवाम पर
कैसे जानूं क्यों मैं मानूं
तू सर्व शक्तिमान है
मंदिरों में बच्चियां लुटतीं
कैसा तू भगवान है
मुजलिमों की चीख सुन
कुछ तो चमत्कार कर।
पापियों को दे सजा
न्याय कर, इंसाफ कर।।     -भारत सिंह

आलेख

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