पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार बंगाल को हिन्दुत्व की नई प्रयोगशाला बनाने पर उतारू है। इसी मकसद से 29 जून को विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक’ पारित कराया गया। इसे संक्षेप में गुण्डा विधेयक नाम भी दिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी इस विधेयक के जरिये पुलिस-प्रशासन के दमन के औजारों को और मजबूत बना रहे हैं। इस विधेयक के जरिये मुख्यमंत्री बंगाल में विभिन्न पूंजीवादी दलों द्वारा की जाने वाली राजनीतिक हिंसा को समाप्त करने का दावा कर रहे हैं। पर वास्तव में यह विधेयक विपक्षी दलों के साथ-साथ आम नागरिकों, संघर्षरत व्यक्तियों, मजदूरों-मेहनतकशों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचलने की साजिश है। यह संघ-भाजपा के लम्पटों को खुली गुण्डागर्दी करने का प्रकारांतर से इंतजाम करता है क्योंकि इनकी गुण्डागर्दी के विरोधी अब नये बिल के तहत अपराधी ठहराये जायेंगे।
इस विधेयक के जरिये सरकार को यह छूट मिल जायेगी कि असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम के नाम पर किसी भी व्यक्ति को वर्ष भर तक बगैर जमानत निवारक हिरासत में रख सकती है। पुलिस अधीक्षक या ऊपर के अधिकारी की संस्तुति पर सरकार किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने का आदेश दे सकती है। बिल कुछ क्षेत्रों में जिला मजिस्टेªटों व पुलिस आयुक्तों को भी नजरबंदी आदेश जारी करने का अधिकार देता है। हां, इन आदेशों की 15 दिन के भीतर राज्य सरकार को पुष्टि करनी होगी। इस तरह यह बिल राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के उस कड़े प्रावधान को बदले रूपों में लागू करने की छूट देता है जिसके तहत पुलिस किसी व्यक्ति को 1 वर्ष तक बगैर जमानत के जेल में सड़ा सकती है।
फर्क बस इतना है कि रासुका लगाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक हित को क्षति पहुंचाने का खतरा दिखाना पड़ता है पर नये बंगाल के बिल में अब किसी भी असामाजिक गतिविधि की आशंका के नाम पर व्यक्ति को वर्ष भर जेल में रखा जा सकता है।
इस बिल में असामाजिक गतिविधि करने वालों को ‘गुंडा’ घोषित करने का प्रावधान है जिसके तहत असामाजिक गतिविधि करने वाले, प्रयास करने वाले, बढ़ावा देने वाले, वित्त पोषण करने वाले, सुगम बनाने वाले व्यक्ति या गिरोह के सदस्य गुंडा करार दिये जा सकते हैं। साथ ही शस्त्र अधिनियम, ड्रग्स; अनैतिक व्यापार व विस्फोटक पदार्थ अधिनियम से जुड़े आरोपी भी गुण्डा करार दिये जा सकते हैं। असामाजिक गतिविधि में भय, असुरक्षा पैदा करने, सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ना, सम्पत्ति पर गैर कानूनी कब्जा, व्यवसायिक गतिविधि में बाधा, सार्वजनिक-निजी सम्पत्ति को नुकसान, अवैध खनन, रेत निष्कर्षण, वन अपराध आदि सब शामिल हैं।
इस बिल में महाराष्ट्र व गुजरात की तरह अधिकारी सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा मानते हुए किसी व्यक्ति को एक या कई जिलों से वर्ष भर के लिए प्रवेश प्रतिबंधित कर सकते हैं। साथ ही यह कानून पुलिस को बगैर वारंट तलाशी, छापे जब्ती व गिरफ्तारी की छूट देता है। यह कानून नजरबंदी या निष्कासन पाये व्यक्ति को शरण, सहायता, आश्रय देने को भी अपराध घोषित करता है।
पुलिस-प्रशासन-सरकार की मनमानी रोकने के लिए महज इतना प्रावधान किया गया है कि निवारक हिरासत में रखे व्यक्ति को 5 दिन के भीतर हिरासत के कारणों की जानकारी देनी होगी। यद्यपि सरकार सार्वजनिक व्यवस्था आदि के नाम पर इस सूचना से मुकर सकती है। साथ ही हर नजरबंदी आदेश की एक सलाहकार बोर्ड 3 सप्ताह में समीक्षा कर तय करेगा कि निरंतर हिरासत उचित है या नहीं।
इसी तरह बंगाल सरकार एक अन्य संशोधन के जरिये दंगे-तोड़़फोड़ प्रदर्शन आदि के दौरान हुई क्षति की वसूली प्रदर्शनकारियों से करने की भी योजना बना रही है। यह प्रावधान उ.प्र. में योगी सरकार पहले ही लागू कर चुकी है।
बंगाल में दमन तंत्र मजबूत कर सरकार अपने विरोध की हर आवाज को कुचलने पर उतारू है। जनवादी अधिकारों को रद्दी की टोकरी में डालना भाजपा सरकारों का प्रिय काम बन चुका है।