हाल में ही पांच राज्यों- असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी- के विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और इसके नतीजे भी आ चुके हैं। बिहार और इसके बाद ये चुनाव अपने आप में अभूतपूर्व रहे हैं। इन चुनावों में 2024 के लोकसभा चुनावों और इसके बाद उत्तर भारत के कुछ राज्यों तथा महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों में की गयी धांधली को एस आई आर के जरिए खुल कर किया गया। एस आई आर और चुनाव को बिहार के बाद अब बाकी के पांच राज्यों में आयोजित करवाकर कानूनी और गैरकानूनी तरीके से वैधानिकता प्रदान करने का खेल खेला गया। इस स्थिति ने भावी विधान सभाओं के चुनाव और 2029 के आम चुनाव की तस्वीर को भी काफी हद तक साफ कर दिया है।
इन चुनावों ने भारत के पूंजीवादी लोकतंत्र को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से एक हद तक के निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की सामान्य हालात में लौटना फिलहाल बेहद मुश्किल है। ये चुनाव केवल एक पूंजीवादी पार्टी की जगह दूसरी पूंजीवादी पार्टी के सत्ता पर आने के परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया नहीं रह गये हैं बल्कि एक सोची-समझी और सुनियोजित हिंदू फासीवादी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हो गये हैं। यह एकाधिकारी पूंजी के देश के किसी भी हिस्से में निष्कंटक और निर्विघ्न लूट-खसोट तथा दोहन और नियंत्रण का रास्ता है। इसके लिए क्षेत्रीय पूंजीवादी पार्टियों का सफाया भी बेहद जरूरी है। हिंदू फासीवादी इसी चाहत को पूरा कर रहे हैं। इसी रूप में ये चुनाव, चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर तथा अन्य कानूनी व गैर कानूनी तरीके अपनाकर पूंजीवादी विपक्ष को ध्वस्त कर देने का साफ संकेत हैं।
स्पष्ट है कि हिंदू फासीवादियों ने 2024 के आम चुनाव से सबक लेकर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एस आई आर के रूप में अनोखा आविष्कार किया। इसके जरिए विपक्षी पार्टियों के मतदाताओं की बड़े पैमाने पर छंटनी किए जाने और अपने मनपसंद के लोगों को मतदाता सूची में जोड़ने का खेल अब सबके सामने है। इसके साथ ही यह अप्रत्यक्ष एन आर सी है, नागरिकता पर हमला है। इसके जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आग निरंतर सुलगाए रखनी है।
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
परिणामों की बात करें तो पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 207 सीटें हासिल कर लीं और 45.84 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया। तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई, जो 41.14 प्रतिशत वोटों के बावजूद सत्ता से बाहर हो गई। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट से स्वयं ममता बनर्जी को हराकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
असम में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन डी ए) ने 102 सीटें जीतीं, जिनमें भाजपा ने अकेले 82 सीटें हासिल कीं जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष को मात्र 24 सीटों से संतोष करना पड़ा और हिमंता बिस्वा सरमा फिर मुख्यमंत्री बने।
केरल में एक दशक बाद सत्ता का समीकरण पूरी तरह पलट गया। संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने 102 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि पिनराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) 35 सीटों पर गिर गया। भाजपा ने अपनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ 3 सीटें जीतीं। इस तरह अब पहली बार सरकारी वामपंथी प्रांतीय सत्ताओं से बेदखल हो गए। बस अब वे तमिलनाडु में राज्य सरकार के गठन में अपनी भूमिका निभाकर खुद और अपने समर्थकों को दिलासा दे सकते हैं कि वे सत्ता में बने हुए हैं।
तमिलनाडु की बात करें तो वहां के पांच दशक पुराने द्रविड़ियन राजनीति के दम पर सत्ता में बारी-बारी से रहने वाली पार्टियों को पहली बार चुनौती देते हुए अभिनेता विजय की तमिलगा वेट्री कड़गम (टी.वी.के) चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। द्रमुक 59 और अन्नाद्रमुक 47 सीटों पर सिमट गए। टी वी के को बहुमत के लिए 11 सीटों की जरूरत थी। फिर विजय ने कांग्रेस (5) तथा वाम दलों (4) के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया। छोटे से केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में एन. रंगास्वामी की पार्टी एआईएनआरसी ने 12 और भाजपा ने 4 सीटें जीतकर एनडीए को 18 सीटों का बहुमत दिलाया, जिससे रंगास्वामी पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने।
केवल परिणामों की बात करें और इससे पहले के परिदृश्य को निगाह से हटा दें तो कुछ असामान्य नहीं लगेगा। यदि चुनाव आयोग, एस आई आर, सुप्रीम कोर्ट के रुख, केंद्र सरकार का युद्धरत चुनावी अभियान तथा हिन्दू राष्ट्रवादियों के तमाम मंत्रियों की चुनाव में विशेषकर पश्चिम बंगाल में भागीदारी और आर एस एस के घृणित अभियान पर नजर डाली जाय तो तस्वीर साफ हो जाएगी जो कि हिंदू फासीवादियों द्वारा चुनावी तंत्र को मनमाने और निरंकुश तरीके से इस्तेमाल करने की है।
बात पश्चिम बंगाल की। क्योंकि यह लंबे समय से हिंदू फासीवादियों के निशाने पर था। पश्चिम बंगाल इस पूरी साजिश का केंद्र और प्रयोगशाला बना। यहां हर सम्भव कानूनी, गैर कानूनी तरीके चुनाव को अपने पक्ष में ढालने के लिए इस्तेमाल किए गए। यहां एस.आई.आर. अन्य राज्यों से अलग था। इसमें गैर कानूनी तरीके इस्तेमाल किए गए। यह गैर कानूनी तरीका था - ई आर ओ, ए ई आर ओ को दरकिनार करके केंद्र सरकार की ओर से सैकड़ों माइक्रो आब्जर्वर तैनात करके विपक्षी पार्टियों के मतदाताओं का मतदाता सूची से सफाया।
पहली ड्राफ्ट मतदाता सूची में 58 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए। इन्हें मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट बताया गया। इसके बाद गैर कानूनी ढंग से सैकड़ों सूक्ष्म पर्यवेक्षक तैनात किए गए। ऐसा ई आर ओ आदि को अक्षम बताकर किया गया। इस तरह का प्रावधान एस आई आर की प्रक्रिया में नहीं था। फिर चुनाव आयोग ने ‘लाजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) नामक एक ऐसे शब्द का आविष्कार किया और 1.36 करोड़ मतदाताओं को इस नई संदिग्ध नागरिकों की श्रेणी में डाल दिया गया। इनमें से एक हिस्से को बाद में इस सूची से हटाकर मतदाता सूची में डाल दिया गया जबकि 60 लाख मामलों को ‘अभिनिर्धारण (न्याय निर्णयन)’ यानी एडजुडिकेशन के लिए भेजा गया। यह अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया थी जिसमें मतदाताओं को अपनी नागरिकता और पहचान साबित करने के लिए दस्तावेजों के साथ उपस्थित होना था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करके ट्रिब्यूनल गठित करने और 700 जजों को बिठाकर इस प्रक्रिया को निपटाने का आदेश दिया। चुनाव आते-आते 33 लाख मतदाता सूची में आ गए मगर 27 लाख फिर भी मतदाता बनने से वंचित हो गए। इस मामले में जब टी एम सी और अन्य सुप्रीम कोर्ट गए तब कोर्ट ने अभूतपूर्व फैसला दिया। इन 27 लाख नागरिकों के मतदान के अधिकार को सर्वप्रथम मुद्दा बनाकर हल करने के बजाय कोर्ट ने चुनाव हो जाने दिया और तर्क दिया कि मतदान से वंचित लोग अगली बार चुनाव में वोट कर सकते हैं। इस तरह मत देने के संवैधानिक अधिकार को खुलेआम कुचलकर चुनाव संपन्न कराने की छूट सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग या मोदी सरकार को दी।
सबसे खतरनाक यह है कि जिस एस आई आर के संवैधानिक या असंवैधानिक होने पर कोर्ट ने अभी तक कोई फैसला नहीं दिया है उस आधार पर चुनाव धड़ल्ले से निपटते जा रहे हैं और सरकारें गठित हो रही हैं।
पं. बंगाल चुनाव में इस दौरान एक तरफ जब इन 27 लाख लोगों समेत कुल 90 लाख मतदाता सूची से हटा दिए गए। तब चुनाव संपन्न हुए। इन हटाए गए मतदाताओं में अधिकांश टी एम सी के मतदाता थे। इस बीच चुनाव घोषणा के बाद 6 लाख नए मतदाता भी चुनाव आयोग ने जोड़ लिए।
एक तरफ यह खेल किया गया तो दूसरी तरफ ढाई लाख (2.50 लाख) अर्ध सैनिक बल गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में यहां तैनात रहा। इसके साथ ही केंद्र सरकार के मनपसंद अधिकारियों को यहां तैनात किया गया। बूथ से लेकर हर स्तर के अधिकारियों के स्तर तक संघ परिवार का शिकंजा इस दौरान कसा हुआ था। टी एम सी के नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ताओं की निर्बाध सक्रियता को हर स्तर पर रोकने की कोशिश की गई। राज्य सरकार को बिल्कुल निष्क्रिय स्थिति में धकेल दिया गया। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जो कि हिंदू फासीवादियों की रग-रग में बसा हुआ है वह तो जारी ही था।
इसके अलावा भी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता का गला पूरी तरह घोंट दिया गया। हटाए गए मतदाताओं की सूची न तो सार्वजनिक की गई और न ही उन्हें सुनवाई का उचित नोटिस भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ‘लाजिकल डिस्क्रिपेंसी’ की सूची को पंचायत भवनों और ब्लाक कार्यालयों में प्रदर्शित करने का आदेश दिया गया, लेकिन आयोग ने इसमें भी विलंब किया। यही बिहार में देखने को मिला था।
अब, जब इस तरह के सारे हथकंडे अपनाकर जिसमें सुप्रीम कोर्ट भी हिंदू राष्ट्रवादियों और इनके चुनाव आयोग के साथ है जब पश्चिम बंगाल की प्रांतीय सत्ता को अपने कब्जे में संघी सरकार ले चुकी है तब यह सत्ता का अपहरण और ज्यादा साफ है। चुनाव जीतने के कुछ ही घंटों बाद, भाजपा के नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एस.आई.आर. प्रक्रिया के प्रभारी विशेष रोल आब्जर्वर डा. सुब्रत गुप्ता को अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया। मनोज अग्रवाल जो उस समय पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी थे उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा नया मुख्य सचिव नियुक्त किया जा चुका है। भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के रिटर्निंग आफिसर सूरजीत रे, जहां से स्वयं ममता बनर्जी चुनाव हारी थीं, को मुख्यमंत्री कार्यालय में वरिष्ठ उप सचिव के पद पर तैनात कर दिया गया।
असम में एस आई आर को सीधे लागू न करने के पीछे एक अलग चाल थी। चुनाव आयोग ने यह तर्क दिया कि राज्य में एनआरसी प्रक्रिया लंबित है और कानूनी स्थिति भिन्न है, इसलिए वहां केवल विशेष पुनरीक्षण (एसआर) कराया गया। परंतु असलियत यह थी कि असम में एनआरसी ने भाजपा को मनमाफिक नतीजे नहीं दिए थे क्योंकि बाहर किए गए 19 लाख लोगों में 70 प्रतिशत हिंदू थे। यहां एस आर में साढ़े 10 लाख वोटर मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम तथा संदिग्ध के रूप में हटाए गए। 5 लाख नए मतदाता जोड़े गए। कुल लगभग ढाई लाख वोटर अंत में दावे-आपत्ति के बाद हटाए गए।
असम में एस आर के साथ ही परिसीमन का खेल खेला गया। परिसीमन ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा नहीं बल्कि चुनाव आयोग द्वारा किया गया। इसका आधार वर्ष 2011 नहीं बल्कि 2001 तय किया गया। यहां भी मनमानी पूर्ण और निरंकुशता खुलेआम थी। इस तरह मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घटाकर 22 कर दी गई, जबकि स्वदेशी और हिंदू बहुल क्षेत्रों में अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटें बढ़ा दी गईं। यह अब 103 सीटें हो गई। जबकि पहले 90 थी। इसका नतीजा 2026 के चुनावों में साफ दिखा, जहां कांग्रेस को मिली 19 में से 18 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते, और पार्टी एक ‘मुस्लिम पार्टी’ के रूप में सामने आई जैसा हिंदू राष्ट्रवादी चाहते हैं। यहां साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण खुलेआम मियां या मुसलमानों को ‘‘पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो’’ के रूप में आगे बढ़ा। अब यह धार्मिक आधार पर निर्वाचन क्षेत्र की स्थिति के रूप में सामने आया है। यह माॅडल अब हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए पं. बंगाल में भी ज्यादा मुफीद है।
केरल में एस.आई.आर. के तहत 24 लाख से अधिक नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए, और 36 लाख को ‘नो-मैपिंग’ तथा ‘लाजिकल डिस्क्रिपेंसी’ की श्रेणियों में संदिग्ध घोषित कर दिया गया। मंजेश्वरम विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के एक जिला सचिव ने 90 आवेदन दायर कर मुस्लिम नागरिकों का नाम इस आधार पर हटाने की मांग की कि वे भारतीय नागरिक नहीं हैं। जांच में सारे आरोप झूठे पाए गए और कलेक्टर ने उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया, लेकिन इस एक घटना ने पूरे अभियान की सांप्रदायिक प्रकृति को रेखांकित कर दिया। अंततः अंतिम सूची में 8.57 लाख नाम हटाए गए, लेकिन सुनवाई में केवल 1.44 प्रतिशत मतदाता ही अयोग्य पाए गए- यह इस बात का प्रमाण था कि शुरुआत में लाखों वोटर्स को मतदाता सूची से बाहर कर देना लगभग पूरी तरह निराधार था। हर राज्य में ऐसा करने के पीछे हिंदू राष्ट्रवादियों का खेल साफ समझा जा सकता है।
तमिलनाडु में 74 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से पहले ड्राफ्ट में हटा दिया गया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के कोलातूर निर्वाचन क्षेत्र से 1.03 लाख मतदाता (कुल का 35 प्रतिशत) हटा दिए गए। उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के चेपाक-तिरुवल्लीकेनी क्षेत्र से 89,000 नाम गायब कर दिए गए। चेन्नई जिले में तो स्थिति और भयावह थी, जहां कुल 14.36 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए। मदुरै जिले के पल्लक्कपट्टी गाँव में 123 जीवित लोगों को मतदाता सूची में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया, जिनमें पुलिस कांस्टेबल और कालेज के छात्र शामिल थे। तिरुनेलवेली के मंजोलाई एस्टेट में चार पीढ़ियों से रह रहे 650 परिवारों का सामूहिक रूप से मताधिकार छीन लिया गया। द्रमुक ने सर्वोच्च न्यायालय में कपिल सिब्बल के माध्यम से खुलासा किया कि हटाए गए 88 प्रतिशत मतदाताओं को कोई सुनवाई नोटिस तक जारी नहीं किया गया था।
कुल मिलाकर असम और पं. बंगाल में हिंदू फासीवादियों ने हर तरह का दांव चुनाव जीतने के लिए चला। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण इनकी दूरगामी राजनीति की रणनीति का आधार है। इसके साथ ही चुनाव आयोग और अन्य संस्थाओं पर प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष नियंत्रण से ये केंद्र और राज्य की सत्ता पर अपना नियंत्रण कायम किए हुए हैं और इसे बढ़ा रहे है। तस्वीर का एक पहलू यह है तो दूसरा पहलू यह है कि टी एम सी समेत अन्य पूंजीवादी पार्टियां भी भ्रष्ट हैं घोर जनविरोधी हैं और जन आंदोेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेेलनों का दमन करती रही है। टी एम सी ने भी ऊपर से नीचे तक फासिस्ट संगठन सा नेटवर्क बनाया था। ऐसे में जनता के समक्ष विकल्पहीनता की स्थिति बनी हुई है। अपनी बारी में ये हिंदू फासीवादियों के आधार को न चाहते भी बढ़ाने में सहायक होती हैं। जो अपनी बारी में हर नैतिकता, नियम कानून को ध्वस्त करने में माहिर हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले दो दशक से हिंदू फासीवादियों का उभार, केरल में बढ़ता मत प्रतिशत और सीटें इसी पहलू का संकेत हैं। खुद 2014 में मोदी-शाह की जोड़ी का केंद्र की सत्ता में आना एकाधिकारी पूंजी की चाहत के साथ ही कांग्रेस की जनविरोधी, दमनकारी और भ्रष्ट कारगुजारियों का भी नतीजा थी। वर्तमान चुनावों में कहीं नई पार्टी तो कहीं विपक्षी गठबंधन तो कहीं हिंदू राष्ट्रवादियों की जीत को इन्हीं तथ्यों में समझा जा सकता है।