उड़ीसा के रायगड़ा जिले की अदालत और हाईकोर्ट ने बीते एक वर्ष के भीतर 8 ऐसे जमानती आदेश जारी किये जिससे उनके जातिवादी पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन अदालतों ने दलितों-आदिवासियों को जमानत देते हुए उनसे पुलिस स्टेशनों, अस्पतालों, मंदिरों आदि की सफाई का निर्देश दिया था। हालांकि 4 मई को सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की खबर प्रकाश में आने पर स्वतः संज्ञान लेकर उक्त सफाई कराने की शर्तों को रद्द कर दिया व निचली अदालतों को फटकार लगायी।
सबसे प्रचारित मामले में एक व्यक्ति को 2 माह तक रोज सुबह 6 बजे से 9 बजे तक पुलिस स्टेशन की सफाई करने की शर्त पर जमानत दी गयी। इन मामलों में चोरी, हत्या आरोपी से लेकर आंदोलनकारियों सब तरीके के अभियुक्तों को इस तरह की घृणित शर्त पर जमानतें दी गयीं।
उड़ीसा की तिजिमाली पहाड़ियों में वेदांता की बाक्साइट खनन परियोजना का दलित-आदिवासी विरोध करते रहे हैं। वे विस्थापन-पर्यावरण संरक्षण, वन अधिकार अधिनियम व पेसा के उल्लंघन के आधार पर इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं। इस संघर्ष में गिरफ्तार दलितों-आदिवासियों को भी जमानत के एवज में सफाई की शर्त दरअसल जातिवादी दृष्टिकोण के साथ राज्य द्वारा संघर्ष को कमजोर करने का भी हथकण्डा है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 भी सजा के बतौर सामुदायिक सेवा को मान्यता देती है। पर यह सजा के बतौर दोषसिद्ध के बाद इस तरह की सजा की छूट देती है। पर उड़ीसा में जमानत देते हुए ही इस तरह की शर्त दरअसल निचली जातियों को और नीचा दिखाने, सबक सिखाने के जातिवादी दम्भ के अलावा कुछ नहीं है।
ऐसी शर्त दिखाती है कि न्यायपालिका सवर्ण आत्मा से लबरेज हो जमानत हेतु प्रस्तुत नीचे की जाति के अभियुक्तों को पहले से ही अपराधी किस्म का मानती रही है। इसीलिए जमानत का अहसान करते हुए वह इन्हें सबक सिखाना चाहती रही है। इसीलिए उन्हें उन थानों की ही सफाई का आदेश दे देती है जहां की पुलिस इन्हें गिरफ्तार करके लाती रही है और जहां ज्यादातर मामलों में इनको पुलिसिया उत्पीड़न से भी गुजरना पड़ता रहा है। ऐसे में अदालत जमानत के साथ-साथ इनके रोज अपमान का इंतजाम कर अपनी सवर्ण आत्मा को तुष्ट करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की इन शर्तों को घृणित, अपमानजनक, औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतिबिम्ब, मानवाधिकारों का उल्लंघन व न्याय के सिद्धांतों से असंगत बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया व देश भर की अदालतों को भविष्य में इस प्रकार की शर्तें लगाने से रोकने के स्पष्ट निर्देश दिये।
भारतीय अदालतों में न्यायधीशों के पद पर सवर्ण पृष्ठभूमि के जजों की भरमार व निचली जातियों की बेहद कम भागीदारी समूची न्यायपालिका की सवर्ण आत्मा कायम रखती है। इस सवर्ण आत्मा के चलते ही भंवरी देवी के बलात्कारियों को अदालत इस आधार पर बरी कर देती है कि सवर्ण भला दलित महिला को कैसे छू सकते हैं। इसी सवर्ण आत्मा के चलते अनगिनत जातिगत उत्पीड़न नारी उत्पीड़न के मसलों में सबूतों के अभाव में सवर्ण आरोपी बरी हो जाते रहे हैं।
खुद सुप्रीम कोर्ट भी इस मानसिकता से बरी नहीं दिखती। अभी हाल में ही एस सी/एस टी एक्त के एक मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने जो निर्देश दिया वह इसकी मिसाल है। सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया कि एस सी-एस टी एक्ट के लागू होने के लिए जरूरी है कि जाति सूचक गालियां ऐसी सार्वजनिक जगह पर दी गयी हों जहां आम लोग आते जाते हों। यानी घर के भीतर या अन्य किसी निजी जगह पर जातिसूचक गालियां या अपमान आगे से एस सी-एस टी एक्त लागू करने का जरिया नहीं बनेगा। इस आधार पर सर्वोच्च अदालत ने घर के भीतर जातिसूचक गाली दिये जाने के चलते एस सी-एस टी केस को खारिज कर दिया। यह निर्णय अपने आप में एस सी-एस टी एक्त को न केवल कमजोर करता है बल्कि जातिगत उत्पीड़न की संवेदनशीलता को कम करके देखता है।