लोकलुभावनवाद : मुंह में राम बगल में छुरी

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लोकलुभावनवाद (पापुलिज्म) ने इस वक्त भारत की राजनीति में ही नहीं बल्कि विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया हुआ है। और देखने में आ रहा है कि इसका प्रभाव और विस्तार इतना व्यापक हो गया है कि शायद ही कोई पूंजीवादी राजनैतिक दल हो जो अपने ही ढंग से इसका शिकार न हो। संसदीय वामपंथी पार्टियां भी इससे अछूती नहीं हैं। लोकलुभावनवाद को पूंजीवादी जनतंत्र में सत्ता को हासिल करने अथवा इसे अपने हाथ में बनाये रखने के लिए इस समय एक बहुत ही जरूरी चीज, साधन (उपादान) माना जाता है। भारत में आप पार्टी का जन्म, विकास और विस्तार लोकलुभावनवाद के जरिये ही हुआ है। यद्यपि यह पार्टी कभी यह नहीं कहेगी कि उसकी विचारधारा में लोकलुभावनवाद की भूमिका केन्द्रीय है। 
    
लोकलुभावनवाद आम जनता या उसके बहुसंख्यक हिस्से के बीच में सच्चे-झूठे मुद्दे उठाता है और उसके इर्द-गिर्द मिथक गढ़ता है। झूठी अवधारणा व समझ बनाता है और हल के तौर पर आम जनता के नाम पर सत्ता पर कब्जा चाहता है। लोकलुभावनवाद की खासियत यह है कि इसके द्वारा दिया जाने वाला संदेश सीधा, सरल, स्पष्ट और कुछ मामलों में इतना भावपूर्ण होता है कि आम जनता को यह लगने लगता है कि यह तो उसकी अपनी ही बात है। 
    
लोकलुभावनवादी अक्सर समाज को दो ऐसे विरोधी समूह में बांटते हैं जिसमें एक ओर ‘‘शुद्ध’’ (प्योर), ‘‘पवित्र’’, ‘‘ईमानदार’’ लोग हैं और दूसरी ओर सत्ता में काबिज भ्रष्ट, अभिजात लोग हैं। ‘‘भ्रष्ट-अभिजातों’’ ने ‘‘शुद्ध’’ लोगों का जीना दूभर कर दिया है। और लोकलुभावनवादी नेता बताते हैं कि वे ‘‘शुद्ध’’ लोगों की खातिर ‘भ्रष्ट-अभिजातों’ से सत्ता को मुक्त कर उनके हाथों में सौंपना चाहते हैं। वे खुद सत्ता के अभिजात गलियारों से बाहर के आदमी हैं इसलिए अभिजात उन्हें हर तरह से तंग करते हैं और ‘जनकल्याण’ के काम नहीं करने देते हैं। यह बात आसानी से तब समझ में आने लगती है जब आप सं.रा.अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प, तुर्किये में एर्दोगान और भारत में मोदी अथवा अरविन्द केजरीवाल का नाम लेते हैं। और आजकल जो राजनीति राहुल गांधी एण्ड कम्पनी करती है वह भी लोकलुभावनवाद के दायरे में ही आती है।    
    
ऐसा नहीं है कि लोकलुभावनवादी राजनीति सिर्फ दक्षिणपंथी ही करते हैं बल्कि वे सभी लोग भी करते हैं जिन्हें पूंजीवादी जनतंत्र में वामपंथी या मध्य मार्गी (सेण्टर) कहा जाता है। लातिन अमेरिका के देशों में वामंपथी ह्यूगो शावेज से लेकर लूला की राजनीति के केन्द्र में लोकलुभावनवाद ही था। यूनाइटेड किंगडम में लेबर पार्टी के हालिया उभार में जर्मी कॉर्बिन की लोकलुभावनवादी राजनीति ही थी। जर्मी कॉर्बिन ने लेबर पार्टी को सत्ता में लाने के लिए रेल से लेकर अन्य सार्वजनिक आवश्यकताओं की चीजों के पुन राष्ट्रीयकरण; कटौती कार्यक्रमों का विरोध; शिक्षा-स्वास्थ्य आदि में सरकारी मदद को बढ़ाना; अंतर्राष्ट्रीय मामलों में ब्रिटिश सेना के दखल को खत्म करना आदि मुद्दों को लोकप्रिय ढंग से उठाया। ‘घर-घर अभियान’ (डोर-टू-डोर कैम्पैन) व्यक्तिगत संबंधों आदि का उस दौर में सहारा लिया जब राजनीति का मुख्य जरिया मीडिया और उससे भी बढ़कर सोशल मीडिया बना हुआ है। जर्मी कॉर्बिन की राजनीति भी लोकलुभावनवादी थी परन्तु यह ट्रम्प या मोदी की राजनीति से एकदम भिन्न रही है। 
    
लोकलुभावनवाद का ‘हम’ और ‘वो’ का बंटवारा एक ऐसा बंटवारा है जो समाज में शासक व शासित, शोषक व शोषित या दूसरे शब्दों में पूंजीपति और मजदूर-मेहनतकश के वास्तविक बंटवारे पर एक लोकलुभावनवादी झूठा आवरण डाल देता है। हमारे देश में इस काम को मोदी एक ढंग से, राहुल गांधी दूसरे ढंग से और अरविन्द केजरीवाल तीसरे ढंग से करते हैं। अपने को सत्ता के गलियारों से बाहर का आदमी दिखाने के लिए मोदी फकीर का चोला या कि वह ‘लुटियन्स क्लब’ के सदस्य नहीं रहे हैं बल्कि एक बाहरी आम आदमी का आख्यान (नरेटिव) गढ़ते हैं। राहुल गांधी बताते हैं कि सत्ता तो जहर है या फिर रात-दिन जाति जनगणना की बात करते हुए यह मुद्दा उठाते हैं कि नौकरशाह अथवा बड़ी कम्पनियों में या मंत्रिमण्डल में कितने पिछड़े, कितने दलित, कितने आदिवासी हैं। तो अरविन्द केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाकर ‘मफलरमैन’ की छवि गढ़ते हैं और ‘मुफ्त पानी’, ‘मुफ्त बिजली’, ‘मुफ्त यात्रा’ (महिलाओं को) आदि के जरिये लोकलुभावनवादी राजनीति करते हैं। इस राजनीति को करने वालों की एक लम्बी फेहरिस्त सामने आ जाती है जब आप भारत में दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हैं। और भारतीय राजनीति में लोकलुभावनवाद का एक इतिहास सामने आ जाता है जो पिछली सदी के छठे दशक तक जाता है। दक्षिण में लोकप्रिय फिल्मी कलाकारों ने लोकलुभावनवाद को खूब हवा दी। 
    
दुनिया के इतिहास में लोकलुभावनवाद उन्नीसवीं सदी के अंत से उभरने लगता है। और बीसवीं सदी के मध्य से तो एक तरह से इसका बोलबाला कई-कई देशों में दिखायी देने लगता है। और आज तो हालत यह है कि जहां भी समय-समय पर चुनाव होते हैं वहां इस राजनीति को करने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। कई-कई पार्टियों व व्यक्तियों का उत्थान लोकलुभावनवाद के जरिये हुआ है। सिरिजा, पोडोमास, आदि पार्टियों का जन्म और उत्थान हो या फिर बर्लुस्कोनी (इटली), जीन-मेरी ली पेन (फ्रांस), जेलेन्स्की (यूक्रेन) आदि नेता हों, इन्होंने लोकलुभावनवाद का ही सहारा लिया। ऐसे ही ‘99 प्रतिशत बनाम 1 प्रतिशत’ का लोकप्रिय बंटवारा ‘आक्यूपाई वाल स्ट्रीट’ आंदोलन में भी देखा जा सकता है। 
    
लोकलुभावनवाद का ‘हम’ और ‘वो’ का बंटवारा दक्षिणपंथी, फासीवादी, वामपंथी आदि शब्दावली का सहारा लेता रहा है। पहचान की राजनीति के जरिये भी इस बंटवारे को लोकप्रिय बनाया गया है। पर जो कुछ भी किया गया हो एक मकसद चाहे या अनचाहे रूप में हासिल किया जाता है कि ‘हम’ और ‘वो’ के नकली बंटवारे के जरिये समाज के असली बंटवारे को ढंका-छुपाया जाता है। और यह कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से मजदूर वर्ग एकजुट न हो। मजदूरों के साथ अन्य मेहनतकश न आयें। साफ है कि लोकलुभावनवाद भले ही अपने-अपने ढंग से ‘‘लोक’’ की चर्चा, व्याख्या, चिंता करता हो परन्तु वह किसी भी तरह से यह नहीं चाहता है कि मजदूर-मेहनतकश एकजुट हों। इस रूप में सबसे नरम-लचर लोकलुभावनवादी, यथास्थितिवादी हैं (मसलन राहुल मार्का) और सबसे उग्र व खतरनाक फासीवादी (मसलन मोदी मार्का) हैं। पहले वाले लोकलुभावनवाद में समाजवाद, जनवाद (डेमोक्रेसी) आदि का छौंका हो सकता है तो दूसरे में तो अंधराष्ट्रवाद, सैन्यवाद, साम्राज्यवाद बिना कुछ कहे भी हरदम साथ में रहते हैं। असल में आज के फासीवाद में ये साथ-साथ चलते हैं। फासीवादी मंसूबों के लिए लोकलुभावनवाद एक तरल-सरल माध्यम का काम करता है। ‘मुफ्त की राजनीति’ एक ऐसा छलावा है जिसके जरिये फासीवादी सबसे बड़े अमीर पूंजीवादी घरानों के नंगे हितों को खुले-छिपे ढंग से पूरा करते हैं। भारत में ‘5 किलो मुफ्त राशन’, अम्बानी-अडाणी-टाटा के हितों को साधने के लिए एक पर्दे का काम करता है। ‘आयुष्मान योजना’ एक ओर कारपोरेटनुमा अस्पतालों के मालिकों के खजाने सरकारी खजाने से भरती है तो दूसरी ओर देश में स्थापित सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को तहस-नहस कर देती है।

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।