सरकार-टाटा और बोइंग

/government-taata-and-boing

बोइंग विमान हादसा

अहमदाबाद में एयर इण्डिया के लंदन जा रहे एक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से 270 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है। मरने वालों में विमान में सवार लोगों के साथ जिस मेडिकल कालेज के हास्टल पर विमान गिरा, वहां के डाक्टर-छात्र व उनके परिजन-बच्चे भी शामिल हैं। अमेरिकी कंपनी बोइंग द्वारा निर्मित इस यात्री विमान को टाटा के मालिकाने वाली एयर इण्डिया द्वारा संचालित किया जा रहा था। 
    
इस दुर्घटना पर घटनास्थल पर पहुंचे गृहमंत्री अमित शाह ने मृतकों के परिजनों को ढांढस बंधाते हुए कहा कि ‘‘यह एक दुर्घटना थी और कोई भी दुर्घटनाओं को रोक नहीं सकता।’’ देश के गृहमंत्री का यह बयान दिखाता है कि उनकी सरकार इस तरह की दुर्घटनाओं की जांच कर उन्हें रोकने का कोई काम नहीं करेगी क्योंकि उनकी नजर में तो दुर्घटनाओं को कोई नहीं रोक सकता। 
    
गृहमंत्री के इस असंवेदनशील बयान पर सवाल उठने लाजिमी थे। सरकार से लोगों को उम्मीद होती है कि वो ऐसी दुर्घटनाओं के वक्त लोगों को विश्वास दिलाये कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनायें नहीं होंगी। पर मोदी सरकार लोगों को बता रही है कि दुर्घटनाओं को कोई नहीं रोक सकता। 
    
सरकार के इस रुख के बाद अगर एयर इण्डिया कंपनी के मालिक समूह टाटा की ओर रुख किया जाये तो पाया जाता है कि एयर इण्डिया को सरकार से खरीदने के लिए इस समूह ने पूरा जोर लगाया। एयर इण्डिया के पायलटों-कर्मचारियों के भारी विरोध के बावजूद सरकार ने इसे टाटा समूह को बेच दिया। अब इस विमान हादसे के बाद एयर इण्डिया द्वारा विमान उड़ान से पूर्व उसकी पर्याप्त देखरेख न करने, बोइंग के विमान में सुरक्षा व इंजन संदर्भी खामी होने के आरोप कुछ लोगों ने लगाये हैं। लोगों ने ये भी बताया है कि तकनीकी खराबी के चलते कुछ माह पूर्व इसी विमान की लंदन उडान रद्द भी की गयी थी। इन आरोपों के किसी जवाब की टाटा समूह ने जरूरत नहीं समझी। उसने बोइंग के विमानों को सुरक्षित बताते हुए मृतकों के लिए मुआवजे का एलान कर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। 
    
अंततः अमेरिकी विमान निर्माता कंपनी बोइंग की बात करें। बोइंग व एयरबस इन 2 कंपनियों का दुनिया के यात्री विमान उत्पादन पर एकाधिकार है। बोइंग के कुछ विमान जब दुर्घटनाग्रस्त हुए तो अमेरिका में उसकी जांच शुरू हुई। बोइंग के एक इंजीनियर व मजदूर ने भी बोइंग विमानों में सुरक्षा सम्बन्धी खामियां उजागर की थीं। अब जब नयी दुर्घटना हो चुकी है और बोइंग के शेयर 5 प्रतिशत गिर चुके हैं तब किसी जिम्मेदार उत्पादक इकाई की तरह व्यवहार करने के बजाय बोइंग ने अपनी नाक बचाने वाला बयान दिया। अपने खिलाफ चल रही जांच पर बोलने के बजाय उसने इस विमान के सुरक्षित होने का दावा कर दिया। उसने भारत सरकार से जांच में सहयोग का वायदा किया। बोइंग कम्पनी ने सारा व्यवहार एक पूंजीवादी कंपनी की तरह किया जिसे लोगों की जान से ज्यादा चिन्ता अपने मुनाफे व गिरते शेयरों के भाव की थी। 
    
कुल मिलाकर भारत सरकार, टाटा समूह और बोइंग कंपनी तीनों के व्यवहार ने दिखा दिया कि मृतकों से इन्हें जरा भी सहानुभूति नहीं है। इन्हें सिर्फ अपनी छवि और मुनाफे की चिंता है। सरकार को एयर इण्डिया के निजीकरण का कोई अफसोस नहीं है। टाटा को 12 वर्ष पुराने विमान को उड़ाने का कोई गम नहीं है। और बोइंग को गिरते शेयर भाव के अलावा किसी बात की चिंता नहीं है। 
    
ऐसी सरकार, ऐसे गृहमंत्री और ऐसी टाटा-बोइंग सरीखी कंपनियां जब तक रहेंगी तब तक सचमुच दुर्घटनाओं को कोई नहीं रोक सकता। 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि