पूंजीपतियों/सट्टेबाजों के मुनाफे की भेंट चढ़े 11 खेलप्रेमी

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इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में आरसीबी फाइनल मैच जीती। बेंगलुरु के एक स्टेडियम में जीत के जश्न का आयोजन किया गया। आयोजन की शुरूआत से पहले ही दोपहर के समय लाखों की भीड़ स्टेडियम के आस-पास इकट्ठा हो गई। यहां मची भगदड़ में 11 खेल प्रेमी जिसमें कुछ बच्चे भी थे, मारे गए। इनमें सबसे कम उम्र की दिवांशी थी, जिसकी उम्र महज 13 साल थी। वहीं, सबसे अधिक उम्र के मनोज थे जिनकी उम्र 33 साल थी। इस भगदड़ में 50 से अधिक लोग घायल हुए। 
    
ऐसी किसी अनहोनी की आशंका पहले से ही जताई जा सकती थी। पूंजीपतियों और सट्टेबाजों ने अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए आईपीएल को उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है जिसमें जीतने वाली टीम को देखने के लिए लाखों की भीड़ के इकट्ठे होने का अनुमान कोई भी लगा सकता है। अपने मुनाफे और सट्टेबाजी को और बुलंदी में पहुंचाने के लिए जीत के बाद, जीत का जश्न मनाने के लिए भव्य आयोजन करना जरूरी था जिसमें लोगों की बलि चढ़ाने से भी कोई गुरेज नहीं किया गया। आयोजकों ने टीम की जीत के जश्न में शामिल होने के लिए प्रशंसकों को खुला निमंत्रण दिया।
    
भीड़ के लगातार स्टेडियम के आस-पास इकट्ठे होने की खबरें सोशल मीडिया में लगातार आ रही थीं। उसके बाद भगदड़ मचने और उसमें लोगों के मरने व घायल होने की खबरें भी सोशल मीडिया में आने लगीं और कई सोशल मीडिया यूजर ने कार्यक्रम को बंद करने की अपील भी की। इसके बावजूद भी बेशर्म आयोजकों, RCB टीम और विराट कोहली समेत अन्य खिलाड़ियों में इतनी भी नैतिकता नहीं थी कि समारोह को बंद करने के लिए कहें। बेशर्मी व असंवेदनशीलता की हद तोड़ते हुए उन्होंने समारोह चलने दिया।
    
अब जब सब जगह आयोजकों की थू थू हो रही है तो सभी बड़े वर्तमान व भूतपूर्व खिलाड़ी यहां तक कि क्रिकेट के ‘‘भगवान’’ तक इस घटना पर शोक व्यक्त कर रहे हैं। वह भीड़ को नियंत्रित न करने और भगदड़ के होने पर तो बात कर रहे हैं पर इस क्रिकेट को सट्टा बाजार बना दिए जाने पर चुप्पी साधे बैठे हैं। वह किस मुंह से कहें क्योंकि इसमें वह भी भागीदार हैं। 
    
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त किया, पर इस भगदड़ में लोग मारे ना जाते तो अगले दिन वह इस टीम के साथ फोटो खिंचवा रहे होते।
    
अब इस दुर्घटना से अपना पल्ला झाड़ने के लिए आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो चुका है। बीसीसीआई इसके लिए आरसीबी को दोषी ठहरा रही है जबकि आरसीबी, इवेंट कंपनी को। मुख्यमंत्री ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया है। मुख्यमंत्री ने कई पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए हैं। कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इस दुर्घटना को स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू की।
    
इस दुर्घटना के संबंध में जितनी भी बातें हो रही हैं; वह भीड़ के ज्यादा आ जाने व उसे नियंत्रित न कर पाने के संबंध में हो रही हैं। परन्तु यह सवाल नहीं उठाया जा रहा है कि एक निजी क्रिकेट टीम के टूर्नामेंट जीत जाने पर इस तरीके के जश्न की क्या जरूरत है या इस तरह का आयोजन क्यों किया गया?    
    
जैसा कि ऐसी दुर्घटनाओं में होता है कि अपनी नाकामियों को छुपाने और मामले को शांत करने के लिए मरने वालों को मुआवजा देने की घोषणा कर दी जाती है। उसी तरह कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने पहले 10 लाख और बाद में 25 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की है।
    
पर इस तरह की घोषणा करने वालों को एक पिता ने करारा तमाचा मारा है। इस दुर्घटना में मारे गए 21 वर्षीय भूमिक के पिता बीटी लक्ष्मण का एक वीडियो सोशल मीडिया में आया है जिसमें वह अपने बेटे की कब्र में लेटे हुए हैं और बुरी तरह टूटे हुए दिख रहे हैं। वे कह रहे हैं, ‘‘जो मेरे बेटे के साथ हुआ, वैसा किसी और के साथ न हो। अब मैं कहीं नहीं जाना चाहता, मैं यहीं उसके पास रहना चाहता हूं।“ उन्हें दो लोग उठाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे खुद को रोक नहीं पा रहे हैं और कह उठते हैं, ‘‘किसी भी पिता को ऐसा दिन कभी न देखना पड़े, जैसा मैं देख रहा हूं।’’ उनका दर्द और टूटे दिल की आवाज हर किसी को भावुक कर रही है।
    
जब श्री लक्ष्मण से पूछा गया कि क्या वे 25 लाख रुपए की मुआवजा राशि से संतुष्ट हैं, तो उन्होंने आंसू रोकते हुए कहा ‘‘मुझे मुआवजा नहीं चाहिए, अगर कोई मेरे बेटे को वापस ला सके तो मुझे खुशी होगी।’’
    
पूरी दुनिया में सट्टेबाजी के नए से नए कीर्तिमान स्थापित किये जा रहे हैं। इस सट्टेबाजी में खेल और खिलाड़ी भी शामिल हैं। खेल व्यक्ति के मनोरंजन व स्वास्थ्य बढ़ाने का एक साधन है पर पूंजीपतियों ने इसे अपने मुनाफे को और ज्यादा बढ़ाने के लिए सट्टेबाजी में बदल दिया है। दुनिया भर में जितने बड़े खेल आयोजन होते हैं वह पूंजीपतियों के मुनाफे और सट्टेबाजी का साधन बन गए हैं।
    
वैसे तो भारत में क्रिकेट पहले ही खेल नहीं रह गया था क्योंकि यह खेल पूंजीपतियों की सट्टेबाजी और प्रतियोगिता की भेंट चढ़ चुका था। पर इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) ने इसे सट्टेबाजी की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है। 
    
आईपीएल की शुरुआत 2008 में हुई थी। शुरू से यह एक व्यवसायिक प्रतियोगिता थी और पूंजीपतियों और आयोजकों के मुनाफे को बढ़ाने का साधन थी। इसे लोकप्रिय बनाने के लिए बड़े-बड़े भव्य आयोजन किए गए और तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में भी खूब प्रचार-प्रसार किया गया। यहां तक कि सरकारों ने भी इसे खूब बढ़ावा दिया। खेल के दौरान दर्शकों को लुभाने के लिए स्टेडियम में चियर गर्ल जैसे साधन अपनाए गये। इसमें भाग लेने वाली टीमों व खिलाड़ियों को खरीदा-बेचा जाने लगा। बाद में इससे और ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए सरकार द्वारा सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता दे दी गई। अब खिलाड़ी सट्टेबाजी के आनलाइन गेम्स का प्रचार-प्रसार करने लग गए। इन टीमों व खिलाड़ियों को इससे कोई मतलब नहीं था कि इस सट्टेबाजी में फंस कर कितने घर बर्बाद होंगे। लोग सट्टेबाजी के जाल में फंसते चले गए और कई नौजवान अवसाद व बाद में आत्महत्या करने को मजबूर हुए। 
    
वैसे इस आईपीएल की शुरुआत करने वाले कर्ताधर्ता ललित मोदी बाद में बैंकों व लोगों का पैसा लेकर विदेश भाग गए और 56 इंच के प्रधानमंत्री मोदी की सरकार उन्हें अब तक वापस नहीं ला पाई।
    
पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए ही इस सट्टेबाजी के खेल को अत्यधिक ऊंचाइयों पर पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इस दुर्घटना में मारे गए लोगों के घरों के चिराग बुझ गए पर इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछ दिन बाद इस दुर्घटना को भुला दिया जाएगा और अगले सीजन आईपीएल का फिर से भव्य आयोजन कर इसे और अधिक बुलंदियों में पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
    
ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले आईपीएल को तुरंत बंद किया जाए और सभी खेलों में सभी तरह की सट्टेबाजी पर रोक लगाई जाए।
 

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