मजहब, धर्म और रिलिजियन

आजकल सनातन धर्म की काफी चर्चा है। डी एम के नेता उदयनिधि के सनातन धर्म के उन्मूलन की मांग के बाद हिन्दू फासीवादी इसकी रक्षा में उठ खड़े हुए। उन्होंने सनातन धर्म को हिन्दू धर्म का पर्यायवाची घोषित करते हुए कहा कि देश के विपक्षी दल हिन्दुओं के जनसंहार की बात कर रहे हैं। स्वयं संघी प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने लोगों से इसका मुकाबला करने का आह्वान किया। 
    
हिन्दू फासीवादियों का इस तरह से बिना किसी शरम लिहाज के सनातन धर्म की रक्षा में उठ खड़ा होना बेहद दिलचस्प था, खासकर ‘धर्म’ के बारे में उनके द्वारा लगातार कही जा रही बातों के मद््देनजर। 
    
हिन्दू फासीवादी हमेशा से कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म कोई पंथ नहीं बल्कि जीवन पद्धति है। बाकी सारे धर्म पंथ हैं जबकि हिन्दू धर्म जीवन पद्धति है। इसीलिए वे धर्म निरपेक्षता के बदले पंथ निरपेक्षता शब्द का इस्तेमाल करते हैं। यहीं से वे यह कहते हैं कि भारत के सारे लोग हिन्दू हैं भले ही वे किसी भी पूजा-पद्धति का पालन करते हों। यहीं से वे यह भी मांग करते हैं कि मुसलमानों और ईसाईयों को भी हिन्दू रीति-रिवाज, परंपरा इत्यादि अपना लेनी चाहिए भले ही वे मस्जिद या चर्च जाते रहें। 
    
अब पता चलता है कि हिन्दू फासीवादी जिस हिन्दू धर्म की बात करते हैं वह वास्तव में सनातन हिन्दू धर्म है। वैसे यह बात नयी नहीं है पर हिन्दू फासीवादियों का इस तरह से खुलकर सामने आना आज के जमाने में थोड़ा अचरज भरा है। शायद हिन्दू फासीवादी आज अपने को इतना ताकतवर महसूस करते हैं कि खुलकर सामने आने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं। 
    
इस पर विवाद हो सकता है कि क्या सनातन धर्म ही हिन्दू धर्म है और क्या सनातन धर्म केवल जीवन पद्धति है या इसमें पूजा-पद्धति भी शामिल है, पर इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि डी एम के नेता ने जिस सनातन धर्म के उन्मूलन की बात की थी वह जीवन पद्धति ही है। उन्होंने सनातन धर्म की वर्ण-जाति तथा छुआछूत की व्यवस्था के उन्मूलन की बात की थी। यदि हिन्दू फासीवादी सनातन धर्म की रक्षा में उठ खड़े हुए तो वे असल में इसी की रक्षा में उठ खड़े हुए क्योंकि डी एम के नेता ने हिन्दुओं की पूजा-पद्धति पर कोई हमला नहीं किया था। 
    
हिन्दू धर्म ग्रन्थों से परिचित विद्वानों का कहना है कि केवल बाद में एक-दो पुराणों में ही सनातन धर्म का जिक्र आता है। यानी हिन्दुओं में यह बहु प्रचलित शब्द नहीं था। हिन्दू न तो अपनी जीवन पद्धति और न ही पूजा पद्धति के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते थे। असल में इसका चलन उन्नीसवीं सदी के अंत में आया जब दयानन्द सरस्वती के हिन्दू धर्म में सुधार के प्रयास (आर्य समाज) के विरोध में पुरातनपंथियों ने स्वयं को सनातनी कहना शुरू किया। इस तरह सनातन धर्म की रक्षा का सवाल मुसलमानों या ईसाईयों के संदर्भ में नहीं बल्कि आर्य समाज के संदर्भ में ही जोर-शोर से उठा था। यह याद रखना होगा कि वर्ण-जाति व्यवस्था की रक्षा इसका एक प्रमुख तत्व था। यह भी याद रखना होगा कि खुद को सनातनी कहने वाले महात्मा गांधी वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे। संघ परिवार आज भी वर्ण-जाति व्यवस्था के खात्मे की बात नहीं करता। वह बस सामाजिक समरसता की बात करता है। 
    
इतिहास में सनातन धर्म की चाहे जो स्थिति रही हो तथा हिन्दू धर्म से इसका चाहे जो भी नाता रहा हो पर यदि यह जीवन पद्धति था तो वर्ण-जाति व्यवस्था इसका अनिवार्य हिस्सा था। यहां तक कि पूजा पद्धति पर भी इसका असर पड़ता था क्योंकि विभिन्न वर्णों के लिए पूजा-पाठ के अनुष्ठान अलग-अलग होते थे। यह जग जाहिर है कि मंदिरों में शूद्रों और अछूतों को प्रवेश की इजाजत नहीं थी। 
    
ऐतिहासिक तौर पर यह सही है कि आदि काल में हिन्दू धर्म में धर्म का मतलब पूजा-पाठ से नहीं था। यहां जीवन जिन चार क्षेत्रों में विभाजित था- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- उसमें पूजा-पाठ और परलोक मोक्ष के हिस्से आते थे। धर्म के हिस्से आता था पारिवारिक और सामाजिक जीवन। अर्थव्यवस्था और राजनीति (राजनीतिक अर्थशास्त्र) अर्थ के दायरे में थे तथा काम के दायरे में था लैंगिग जीवन, मनोरंजन और खान-पान। 
    
भारत के अतीत में धर्म शब्द और भी व्यापक अर्थों में प्रचलित था जिसे बौद्ध धर्म के ‘धम्म’ शब्द में देखा जा सकता है। बौद्ध धर्म एक नास्तिक धर्म था तथा इसमें परलोक कहीं नहीं था। इसीलिए यहां मोक्ष का मतलब भी बिल्कुल अलग था जिसके लिए एक बिल्कुल अलग शब्द ‘निर्वाण’ इस्तेमाल होता था। बौद्ध धर्म में ‘धम्म’ जीवन की आम नैतिकताओं का द्योतक था। 
    
पर हिन्दू धर्म में धर्म का मतलब था पारिवारिक और सामाजिक जीवन के नियम और उसकी नैतिकताएं। और यह सारा कुछ आधारित था वर्ण व्यवस्था पर। इसीलिए अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग नियम और नैतिकताएं थीं। मसलन, विवाह का कोई तरीका क्षत्रियों के लिए जायज था, पर ब्राह्मणों के लिए नहीं। इसीलिए दंड व्यवस्था भी अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग थी। 
    
इस तरह यह सही है कि अतीत में हिन्दुओं के लिए धर्म का मतलब जीवन पद्धति था। पर यह भी उतना ही सही है कि इस जीवन पद्धति का आधार थी वर्ण व्यवस्था। बाद में यह वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था और छुआछूत तक विस्तारित हो गई। बाद का मतलब मध्य काल नहीं बल्कि प्राचीन काल ही है क्योंकि छुआछूत के कुछ चिन्ह गौतम बुद्ध के जमाने तक प्रकट हो चुके थे। गौतम बुद्ध के आगे-पीछे जिन धर्म सूत्रों की रचना हुई थी वे सारे वर्ण व्यवस्था को अपना आधार बनाते थे। 
    
इस तरह हिन्दू फासीवादी इस आड़ के पीछे छिप नहीं सकते कि ‘हिन्दू धर्म पंथ नहीं बल्कि जीवन पद्धति है’। तब उन्हें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इस जीवन पद्धति का आधार वर्ण व्यवस्था है। वैसे संघी इसे मानते हैं पर आज के समय में इसे खुलेआम कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। 
    
ऊपर कही गयी बातों के मद्देनजर यह सहज ही सवाल बन जाता है कि हिन्दू धर्म ‘धर्म’ के अर्थ में कब से कहलाने लगा? कब से यह जीवन पद्धति के बदले पूजा पद्धति के लिए इस्तेमाल होने लगा?
    
इसका उत्तर यह है कि यह मुख्यतः यूरोपीयों के भारत में आने के बाद हुआ, खासकर अंग्रेजी राज से। इसके पहले हिन्दू और मुसलमान शब्द आज के प्रचलित अर्थ में यदा-कदा ही इस्तेमाल होते थे। हिन्दू स्वयं को शैव, वैष्णव, शाक्त, इत्यादि कहते थे। इससे भी ज्यादा वे जाति के नाम से पहचाने जाते थे। चूंकि तब समूचा जीवन स्थानीय था और वह जाति के हिसाब से तय होता था, इसीलिए जाति ही पहचान का मुख्य जरिया थी। मुसलमानों को हिन्दू तुर्क, यवन या म्लेच्छ के नाम से पुकारते थे। यवन शब्द भारत में यूनानियों के समय से सारे विदेशियों के लिए इस्तेमाल होता था। म्लेच्छ वर्ण-व्यवस्था से बाहर वालों के लिए इस्तेमाल होता था। मुसलमान भी स्वयं को या तो बाहर के अपने मूल से (तुर्क, इत्यादि) अथवा यहां की जाति से पहचानते थे। 
    
इस तरह आज के प्रचलित अर्थ में हिन्दू धर्म शब्द आधुनिक काल की चीज है। मध्य काल या प्राचीन काल में यह शब्द प्रचलन में नहीं था। तब हिन्दू का मतलब सिन्धु नदी के पूरब में रहने वाले लोग थे और धर्म का मतलब था पारिवारिक व सामाजिक जीवन के नियम और नैतिकताएं। 
    
पर केवल हिन्दू धर्म के साथ ऐसा नहीं हुआ। यही मुसलमानों और ईसाईयों के साथ भी हुआ। उनके मामले में भी मजहब और रिलिजियन का शुरू में वह मतलब नहीं था जो बाद में हो गया। 
    
जैसा कि पहले कहा गया है, भारत में आने वाले मुसलमान स्वयं को मुसलमान या इस्लाम के अनुयाई के रूप में नहीं देखते थे। वे स्वयं को तुर्क या अफगान के रूप में देखते थे। सातवीं सदी में पैदा होने के बाद जब इस्लाम एक सदी के भीतर स्पेन से लेकर भारत तक फैला तो इसने बहुत भांति-भांति के लोगों को, भांति-भांति की भाषा-संस्कृति वालों को समेटा। इनमें से जिन लोगों ने भी इस्लाम को अपनाया वे उसके बाद भी अपनी पहले वाली पहचान से जुड़े रहे। 
    
जहां तक धर्म का सवाल है, इस्लाम शुरू से ही जीवन पद्धति भी था और पूजा पद्धति भी। कुरान में दोनों के लिए ही नियम-प्रावधान हैं। इस्लाम का मतलब था अल्लाह की इच्छा के सामने समर्पण तथा मुसलमान (अल-मुसलिमुन) का मतलब था अल्लाह के सामने समर्पण करने वाले। दोनों एक ही शब्द मूल से निकले थे। बाद में इस्लाम धर्म यानी पूजा पद्धति के लिए दीन शब्द का इस्तेमाल होने लगा- दीन-ईमान वाला दीन या अकबर के दीन-ए-इलाही वाला दीन। 
    
तब फिर मजहब शब्द क्या है जिसका आज इस्लाम धर्म के संदर्भ में इस्तेमाल होता है? मजहब शब्द इस्लाम पैदा होने के करीब दो सदी बाद चलन में आया। इसका मतलब था इस्लाम की परंपराओं की व्याख्या करने वाली धारा। पूजा पद्धति के तौर पर इस्लाम में बस सरल सी पांच चीजें थीं- 1. अल्लाह और उसके पैगम्बर मुहम्मद में विश्वास, 2. पांच वक्त की नमाज, 3. रमजान में रोजा, 4. जकात व 5. हज यानी जीवन में कम से कम एक बार काबा की यात्रा। लेकिन पूरा जीवन तो अन्य चीजों से ही चलता है। इसके लिए मुहम्मद साहब की बातों और व्यवहार का संकलन किया गया (हदीथ यानी परंपरा)। इनके आधार पर नियम-कानून तय किये गये (शरीया)। लेकिन तब फिर इन सबकी व्याख्या का सवाल उठ खड़ा हुआ। इनकी व्याख्या के लिए सुन्नियों में मुख्यतः चार धाराएं पैदा हुईं- हनफई, मलिकि, शफीई तथा हनबली। इन धाराओं को ही मजहब कहा गया। भारत में हनफई मजहब प्रचलित है। 
    
यह काफी कौतुकपूर्ण है कि मुसलमानों के जीवन को नियंत्रित करने वाले नियमों-कानूनों की व्याख्या की धारा का द्योतक शब्द अंत में स्वयं पूरे धर्म के लिए इस्तेमाल होने लगा। पर ऐसा ही हुआ। आज स्वयं मुसलमानों में भी बहुत कम लोगों को पता होगा कि धर्म शब्द मूलतः किसके लिए इस्तेमाल हुआ था। 
    
यही बात रिलिजियन शब्द पर भी लागू होती है। हिन्दू फासीवादी अक्सर यह कहते हैं कि उनका धर्म शब्द रिलिजियन से बिल्कुल अलग है, कि धर्म का मतलब है धारण करने योग्य। पर ये हिन्दू फासीवादी यह भूल जाते हैं कि रिलिजियन शब्द का भी मूलतः वह मतलब नहीं था जो आज है। यह शब्द यूनानी भाषा के रिलिजियो से निकला था जिसका मतलब था उच्च स्तर की चेतना, सही का बोध, नैतिकता का आग्रह, इत्यादि। कुल मिलाकर यह सामाजिक जीवन में नैतिकता से सम्बद्ध था। जब बाद में यह ईसाई धर्म के लोगों में इस्तेमाल होने लगा तो यह मूलतः व्यवस्था या व्यवस्था के नियमों का सूचक था। 
    
इस तरह देखें तो अपने मूल में धर्म, मजहब और रिलिजियन तीनों ही सामाजिक जीवन की नैतिकताओं से संबंधित थे। और चूंकि उस जमाने में जीवन पद्धति और पूजा पद्धति के बीच चीन की दीवार नहीं होती थी, इसलिए इन नैतिकताओं में देवी-देवताओं और ईश्वर-अल्लाह का भी दखल होता था। इसी वजह से आज भी पुरातनपंथी लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कोई नास्तिक व्यक्ति भी नैतिक हो सकता है। 
    
आज के प्रचलित अर्थ में मजहब, धर्म और रिलिजियन शब्द का इस्तेमाल आधुनिक काल की चीज है जब धार्मिक जीवन को बाकी जीवन से अलग कर दिया गया। अंत में धर्म व्यक्ति का निजी मामला बन गया और सामाजिक जीवन अन्य नियमों-कानूनों से संचालित होने लगा। यहीं से धर्म और नैतिकता भी अलग-अलग हो गये। यह होना ही था क्योंकि नैतिकता का संबंध सामाजिक जीवन से है जबकि धर्म का संबंध व्यक्ति के परलोक से निजी रिश्ते से है। 
    
चूंकि आधुनिक जीवन की शुरूआत यूरोप से हुई इसलिए धर्म और सामाजिक जीवन में विलगाव पहले यहीं हुआ। फिर यहीं से यह सारी दुनिया में फैला, अक्सर साम्राज्यवाद के जरिये यानी यूरोपीय देशों द्वारा बाकियों को गुलाम बनाये जाने के जरिये। इसीलिए कुछ लोग आज के प्रचलित अर्थ में धर्म, मजहब या रिलिजियन को पश्चिम की पैदाइश मानते हैं और खारिज करते हैं। हिन्दू फासीवादी भी ऐसे ही हैं। पर यह असल में आधुनिक जीवन की पैदाइश है। यह अलग बात है कि यह पश्चिम में पैदा हुई और साम्राज्यवाद के जरिये सारी दुनिया में फैली। 
    
उपरोक्त से स्पष्ट है कि मजहब, धर्म और रिलिजिया के बारे में भी हिन्दू फासीवादी अपने चरित्र के अनुरूप झूठ, अर्ध सत्य और मनगढ़न्त इतिहास का सहारा लेते हैं। वे इसके जरिये वह गर्दो-गुबार खड़ा करते हैं जिससे वे अपनी पुरातनपंथी सोच को आगे बढ़ा सकें।  

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