अपने देश के हिन्दू फासीवादियों को संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बहुत पसंद है। इसीलिए शायद उपरोक्त शीर्षक उनको पसंद आये।
हिटलर के नाजी जर्मनी में किताबों को जलाना नाजियों का प्रिय शगल था। वे अपने विचारों से भिन्न मत रखने वाली किताबों का ढेर लगा कर उनमें आग लगा देते थे। इन किताबों में विश्व साहित्य की श्रेष्ठतम किताबें भी होती थीं। यह नाजियों द्वारा कला-संस्कृति पर बोले गये आम हमले का हिस्सा था।
भारत के हिन्दू फासीवादियों ने नाजियों से काफी कुछ सीखा है। हिटलर और मुसोलिनी उनके मुख्य प्रेरणा स्रोत रहे हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि वे आज नहीं तो कल किताबें जलाने के उद्यम में लगते। आखिर वे एक लम्बे समय से कला-संस्कृति पर हमला करते रहे हैं। उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में देश-दुनिया के श्रेष्ठतम साहित्य व कला की कोई जगह नहीं है।
पिछले दिनों इस क्षेत्र में इनके कारनामों की एक नयी रिपोर्ट आयी है। पता चला है कि इन्होंने जम्मू-कश्मीर में पुस्तकालयों में किताबों के निरीक्षण का अभियान चला रखा है। उद्देश्य है देश विरोधी किताबों की छंटाई करना। अभी तक कश्मीर में बारह लाख तथा जम्मू में नौ लाख से ज्यादा किताबों का निरीक्षण किया जा चुका है। इनमें चार हजार से ज्यादा किताबों को खतरनाक पाया गया है। छः प्रतिशत जम्मू में तथा चैरानबे प्रतिशत कश्मीर में। लेखकों में अरूंधती राय तथा हिलाल अहमद भी शामिल हैं।
सरकारी पुस्तकालयों में जब किताबों की खरीद की जाती है तो किताबों के चयन की एक प्रक्रिया होती है। यूं ही कोई टहलते हुए किताब नहीं खरीद लाता। ऐसे में यह नहीं सोचा जा सकता कि पहले जो किताबें खरीदी गयी होंगी उन पर ध्यान नहीं दिया गया होगा। कम से कम भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित किताबें तो जरूर ही नहीं खरीदी गयी होंगी।
ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि तब फिर किताबों का नये सिरे से निरीक्षण क्यों हो रहा है? इसके दो संभावित उत्तर हो सकते हैं।
एक तो यह कि सारे बमबम के बावजूद मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर के हालात को लेकर अत्यन्त भयभीत है। वह जरा सा भी विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकती। उसे पुस्तकालयों में धूल फांकती किताबों से भी डर लगता है कि कोई उन्हें पढ़ न ले।
दूसरा यह कि इस तरह का काम आबादी में भय बैठाने के लिए किया जा रहा है। सरकार इस तरह के दमनात्मक कदमों से लोगों को यह संदेश देती रहती है कि वह दमन के प्रति सजग है। कोई भी सर उठाने की जुर्रत न करे।
दोनों ही स्थितियों में भय प्रमुख चीज है। एक में सरकार स्वयं भयभीत है, दूसरे में यह लोगों को भयभीत करना चाहती है। वैसे जनता से भयभीत सरकार ही जनता में भय पैदा करने के लिए दमन का सहारा लेती है।
जैसा कि पहले कहा गया है, नाजियों के शिष्य हिन्दू फासीवादी साहित्य-कला से वैसे ही नफरत करते हैं। उन्हें किताबों से डर लगता है, खासकर उन किताबों से जो लोगों के दिमागों को रोशन करती हैं। ऐसे में रोशन दिमागों को बचाने के लिए जरूरी है कि इस पुस्तक दहन अभियान का विरोध किया जाये।