राम मंदिर चंदा चोरी: राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट

Published
Wed, 07/01/2026 - 15:50
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कहते हैं कि रामराज्य में एक धोबी के सवाल पर भी राजा राम ने जवाब दिया था। लेकिन कलियुग के इस नए रामराज्य में करोड़ों भक्त सवाल पूछ रहे हैं और जवाब में उन्हें टीवी डिबेट, प्रेस कान्फ्रेंस और राष्ट्रवाद का पैकेज थमा दिया जा रहा है।
    
मामला बड़ा सीधा है। भक्त ने सोचा था कि उसका चढ़ाया हुआ सौ रुपये का नोट, उसकी बूढ़ी मां की गुल्लक से निकला दस रुपये का सिक्का और उसकी बेटी की बचाई हुई जेब खर्च की रकम रामजी के चरणों तक पहुंचेगी। लेकिन अब खबरें ऐसी आ रही हैं कि भक्त सोच रहा है- ‘‘हे प्रभु! चरणों तक पहुंची या रास्ते में ही किसी ने मोक्ष प्राप्त कर लिया?’’
    
पहले तो नेताओं ने कहा- ‘‘यह राम मंदिर है, यहां सवाल मत पूछो।’’ फिर जब सवाल बढ़ गए तो कहा- ‘‘यह हिंदुओं की आस्था पर हमला है।’’ जब उससे भी बात नहीं बनी तो कहा- ‘‘जांच होने दीजिए।’’
    
यानी पहले सवाल पूछो तो देशद्रोही, फिर सांप्रदायिक और अंत में धैर्यवान नागरिक बन जाओ। गजब का लोकतंत्र है!
    
सबसे मजेदार बात यह है कि जो लोग कल तक हर गली-मोहल्ले में नैतिकता का थोक व्यापार कर रहे थे, जो लोग खुद को हिन्दू धर्म, राम और राम मंदिर का अकेला ठेकेदार घोषित करते थे वे आज अचानक कानून के इतने बड़े ज्ञाता बन गए हैं कि हर वाक्य की शुरुआत ‘‘जांच पूरी होने दीजिए’’ से करते हैं।
    
ये वही लोग हैं जो किसी विपक्षी नेता के घर से अगर एक पुराना ब्रीफकेस भी बरामद हो जाए तो शाम तक उसे अरबों के घोटाले का मास्टरमाइंड घोषित कर देते हैं। यदि किसी विश्वविद्यालय, किसी मजदूर संगठन, किसी अल्पसंख्यक संस्थान या किसी विपक्षी दल पर इतने गंभीर आरोप लगते, तो क्या भाजपा के नेता ‘‘जांच का इंतजार’’ करने की सलाह देते? या फिर वे टीवी स्टूडियो से लेकर संसद तक हंगामा खड़ा कर देते? हो सकता है अब तक दोष के आरोपियों की लिंचिंग तक हो गई होती। उत्तर हम सब जानते हैं।
    
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि आरोपों को जांच पूरी होने से पहले तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। यह सिद्धांत सही है। लेकिन यही सिद्धांत तब कहां था जब बिना जांच पूरी हुए विपक्षी नेताओं को भ्रष्टाचार का प्रतीक बताया जाता था? ब्।। आंदोलन में लोगों को जेल में डाला गया?
    
लेकिन यहां मामला अलग है। यहां अचानक सबको न्यायिक प्रक्रिया याद आ गई है।
    
रामजी भी ऊपर बैठकर सोच रहे होंगे- ‘‘भाइयों, मेरे नाम पर चुनाव लड़ लिए, रथयात्राएं निकाल लीं, संसद में भाषण दे दिए, टीवी पर बहस कर ली, लेकिन अब जब चढ़ावे का हिसाब मांगा जा रहा है तो सबकी आवाज क्यों बैठ गई?’’
    
शायद इसलिए कि रामजी की मूर्ति बोलती नहीं है। अगर बोलती होती तो सबसे पहले वही पूछती- ‘‘भक्तों का पैसा कहां गया?’’
    
लेकिन हमारे नेताओं का सौभाग्य है कि मूर्तियां सवाल नहीं पूछतीं, केवल जनता पूछती है। और जनता को चुप कराने के लिए इनके पास प्रवक्ता हैं, एंकर हैं, आईटी सेल है, ट्रोल सेना है, राष्ट्रवाद है, विदेशी साजिश है, अर्बन नक्सल हैं, टुकड़े-टुकड़े गैंग है- सब कुछ है।

बस एक चीज की कमी है- हिसाब-किताब की।

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