साम्प्रदायिकता विरोधी साहित्यकार फिराक गोरखपुरी की जयंती 28 अगस्त पर

फिराक गोरखपुरी : सांप्रदायिकता विरोधी साहित्यकार

“मौत का भी इलाज हो शायद

ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं”

इस दार्शनिक पंक्ति के रचयिता रघुपति सहाय को फ़िराक़ गोरखपुरी के नाम से जाना गया। उनका जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उन्हें उनकी उर्दू शायरी के लिए याद किया जाता है, हालांकि प्रोफेसर वह अंग्रेजी के थे। फ़िराक़ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी कविता पढ़ाया करते थे। 

फ़िराक़ गोरखपुरी सिर्फ आला दर्जे के शायर ही नहीं थे, बल्कि सुलझे हुए दानिश्वर, फ़िलॉसपर भी थे। मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाषा और सियासत के तमाम ज्वंलत सवालों पर वे अपनी खुलकर राय रखते थे। हक़गोई और बेबाकी, ज़िहानत और ज़बानदानी उनकी घुट्टी में थी। सच को सच कहने का हौसला उनमें था। वे साम्प्रदायिकता और मज़हबी कट्टरता के घोर विरोधी रहे।

अपने ऐसे ही एक विचारोत्तेजक मज़मून ‘हमारा सबसे बड़ा दुश्मन’ में वे लिखते हैं,‘‘साम्प्रदायिकता का भाव खुद अपने सम्प्रदाय के लिए खु़दकुशी के बराबर होता है। देखने में फ़िरक़ापरस्त आदमी दूसरे धर्मवालों को छुरा भोंकता है, लेकिन दरअसल वह आदमी अपने ही फ़िरके़ का खू़न करता है। चाहे दूसरे फ़िरके़ वालों से बदला लेने के लिए वह ऐसा काम करे।’’

साम्प्रदायिक लोग समाज के लिए किस क़दर ख़तरनाक हैं, अपने इसी लेख में वे लिखते हैं,‘‘साम्प्रदायिक हिन्दू, हिन्दू जाति के लिए ख़तरनाक है, मुसलमान के लिए उतना ख़तरनाक नहीं है। फ़िरक़ापरस्त मुसलमान, फ़िरके़ के लिए ज़्यादा नुकसान पहुंचाने वाला है, हिन्दू के लिए उतना नहीं। और यही हाल साम्प्रदायिक सिख, साम्प्रदायिक पारसी, साम्प्रदायिक एंग्लो इंडियन, साम्प्रदायिक ईसाई का है। ये सब अपनी जाति के दुश्मन हैं। साम्प्रदायिकता के आधार पर अपने सहधर्मियों की सेवा ही नहीं की जा सकती, पर साम्प्रदायिकता से बच कर ही अपने सम्प्रदाय की, अपने सहधर्मियों की तरक़्क़ी हो सकती है। या यों कहो कि दूसरे सम्प्रदायवालों, दूसरे धर्मवालों की उन्नति, खु़शहाली मुमकिन है।’’

फ़िराक़ गोरखपुरी अपने इस लेख में साम्प्रदायिकता की समस्या को चिन्हित भर नहीं करते, बल्कि देशवासियों को आग़ाह भी करते हैं, ‘‘हिन्दू संस्कृति को हिन्दू राज्य मिटाकर रख देगा, मुस्लिम संस्कृति को इस्लामी राज्य मिटाकर रख देगा और साम्प्रदायिक राज्य अपने ही सहधर्मियों को ले डूबेगा।’’

फिर मुल्कवासियों का असली दुश्मन कौन है और उसे किससे लड़ना चाहिए? इस बात का सुराग भी वे अपने लेख में देते हैं, ‘‘हमारे अनुचित रीति-रिवाज, हमारे समाज का ग़लत ढांचा, ग़लत क़ानून, कारोबार के ग़लत तरीके़, व्यापार के नाम पर बेदर्दी से नफ़ा कमाने का लालच और खु़द हमारे जीवन की ग़लतियां, रिश्वत, चोर बाज़ारी, निरक्षरता, भूख़ और बेकारी असली दुश्मन हैं।’’

फ़िराक़ गोरखपुरी का यह लेख सत्तर साल पहले साल 1950 में लिखा गया था, लेकिन आज भी यह उतना ही प्रासंगिक है, जितना लिखते वक़्त था। 

साभार : जाहिद खान के लेख का अंश

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।