युवाओं के आक्रोश से दहला पाटलिपुत्र स्टेशन
भारत में पढ़े-लिखे युवाओं में बेकारी की समस्या विस्फोटक स्तर तक बढ़ चुकी है। छात्रों-युवाओं की रोजगार को लेकर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। इस बेचैनी का एक नमूना बीते दिनों
भारत में पढ़े-लिखे युवाओं में बेकारी की समस्या विस्फोटक स्तर तक बढ़ चुकी है। छात्रों-युवाओं की रोजगार को लेकर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। इस बेचैनी का एक नमूना बीते दिनों
भारत के प्रधानमंत्री मोदी की नार्वे यात्रा काफी चर्चित रही। इस अचानक की गयी यात्रा के उद्देश्य और वहां नार्वे की पत्रकार के प्रश्न पर मोदी की चुप्पी दोनों चर्चा में रहे।
अंततः वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। विशेष गहन पुनरीक्षण संवैधानिक है या नहीं, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पिछले साल लगी थी। यह मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जोयमाला ब
योगी यानी बुलडोजर बाबा को खास तरह की यूनियन से चिढ़ है, सख्त नफरत है और उनका बस चले तो वो यूनियनों को खत्म करवा दें। यूनियन यानी एक रूप में संगठन या संगठित समूह से नफरत को
पूरे देश भर में मेडिकल स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आयोजित नीट की परीक्षा पेपर लीक की वजह से रद्द कर दी गयी है। 3 मई को हुई इस परीक्षा में लगभग 23 लाख छात्रों ने हि
उड़ीसा के रायगड़ा जिले की अदालत और हाईकोर्ट ने बीते एक वर्ष के भीतर 8 ऐसे जमानती आदेश जारी किये जिससे उनके जातिवादी पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इन अदालतों ने द
उत्तर भारत में दो माह पूर्व पैदा हुई मजदूर संघर्षों की लहर लगातार जारी है। मजदूरों के संघर्ष की इस लहर ने पहले हरियाणा-उ.प्र.
9 मई को पं.बंगाल का नया मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी, एक पूर्व तृणमूली बन चुका है। इस आदमी का नाम शुभेन्दु अधिकारी है। इससे पहले असम का मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी ह
आजकल सबरीमाला मामले पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच सुनवाई कर रही है। यह पीठ केरल के तीर्थस्थल में माहवारी वाली महिलाओं के प्रवेश पर उठे विवाद पर इससे संबंधित
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है