दुनिया भर में हत्यारे इजरायल का बढ़ता विरोध
इजरायली शासकों द्वारा फिलिस्तीन में किये जा रहे नरसंहार का विरोध दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सम
इजरायली शासकों द्वारा फिलिस्तीन में किये जा रहे नरसंहार का विरोध दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सम
गाजा में जारी नरसंहार पर यूरोप के देशों में हो रहे प्रदर्शनों के दबाव में इन देशों की सरकारें भले ही इसराइल का विरोध करने पर मज़बूर हो रही हैं। भले ही, ये फिलिस्तीन को स्व
अमरीकी साम्राज्यवादियों ने लेबनान की सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह हिजबुल्ला के हथियारों को छीन ले या उन्हें नष्ट कर दे। अमरीका के लेबनान में राजदूत के इस प्रस्ताव
इजरायल का युद्धोन्मादी, भ्रष्ट व क्रूर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अब पूरी गाजा पट्टी पर कब्जा करना चाहता है। गाजा शहर पर कब्जा करने के लिए उसने इजरायली कैबिनेट की दस
जुलाई माह में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में सेनेगल से फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों को अपनी सेना को हटाना पड़ा। पिछले तीन वर्षों में सेनेगल सातवां देश है, जहां से फ्रां
बीते दिनों फिलिस्तीन के मसले पर फ्रांसीसी व ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के सुर बदले से नजर आने लगे हैं। पहले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रां ने घोषणा की कि फ्रांस सितम्बर में फ
इजरायली जियनवादी शासकों का गाजा में नरसंहार जारी है। अभी इसका प्रमुख रूप गाजा में मानवीय सहायता पर रोक लगा भुखमरी के हालात पैदा करना बना हुआ है। नन्हे मासूम बच्चे भोजन के
जब एक पत्रकार ने पूछा कि 4 जुलाई को पानी के स्तर के अपने मारक शिखर पर पहुंचने से पहले गुआडलूपे नदी के किनारे के समर कैंप के बच्चों को सुरक्षित स्थानों तक क्यों नहीं पहुंच
विलियम रूटो केन्या के राष्ट्रपति हैं। उनके राष्ट्रपतित्व काल में केन्या की मजदूर-मेहनतकश आबादी की हालत खराब होती गयी है। वहां बेरोजगारी 67 प्रतिशत के आस-पास है। रूटो 2023
अमेरिकी चुनाव में रूस-यूक्रेन युद्ध बेहद कम समय में रुकवाने का वादा करने वाले ट्रम्प अब अपने वायदे से पलटी मारते नजर आ रहे हैं। चुनाव के वक्त ट्रम्प ने पुतिन की तारीफ करत
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?