पेरिस कम्यून को क्यों याद करें
इस वर्ष 18 मार्च को पेरिस कम्यून को घटे 154 वर्ष हो जायेंगे। पेरिस कम्यून की ऐतिहासिक घटना से परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों का यह प्रश्न हो सकता है कि ‘हम पेरिस कम
इस वर्ष 18 मार्च को पेरिस कम्यून को घटे 154 वर्ष हो जायेंगे। पेरिस कम्यून की ऐतिहासिक घटना से परिचित और अपरिचित दोनों तरह के लोगों का यह प्रश्न हो सकता है कि ‘हम पेरिस कम
अमेरिका में राष्ट्रपति की शपथ लिए अभी 1 महीना भी नहीं बीता कि लोगों का गुस्सा उन पर फूट पड़ा है। लोग सड़कों पर ट्रम्प के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। वे ट्रम्प द्वारा ट्रांसजेंड
बीते 5 फरवरी 2025 को अमेरिका से 104 भारतीय मजदूरों/अवैध प्रवासियों को हाथ-पैर में जंजीरों से बांधकर अमेरिकी सैन्य विमान द्वारा भारत के अमृतसर हवाई अड्डे पर लाया गया। इन अ
28 जनवरी को सुबह से ही बांग्लादेश के रेलवे के रनिंग (ट्रेनों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले) कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी। यह हड़ताल रेलवे यू
दक्षिण अफ्रीका की सोने की खान से इन दिनों खनिकों की लाशें निकल रही हैं। 10 जनवरी से शुरू हुए बचाव अभियान में अब तक दर्जनों लाशें निकाली जा चुकी हैं। यह अभियान कुछ संगठनों
20 दिसम्बर को 5 लाख से अधिक क्यूबावासी हवाना के मालेकान से अमेरिका दूतावास तक मार्च करने के लिए सड़कों पर उतरे। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डिआज कैनेल के आह्वान पर आयोजित
3 दिसंबर को न्यूजीलैंड में 36,000 नर्सों, सहायकों और मिडवाइव्स ने आठ घंटे की हड़ताल कर अपने वेतन को बढ़ाने की मांग की। साथ ही उनकी मांग खाली पड़े पदों को भरने की भी है। पिछल
5 दिसम्बर को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में सीनेट के सामने हजारों अध्यापकों, आर्टिस्ट, सार्वजनिक कर्मचारियों और सांस्कृतिक कर्मियों, देखभाल करने वालों ने प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन सीनेट द्वारा सार्व
4 दिसंबर को श्रीलंका के शिक्षा मंत्रालय के सामने करीब 500 स्कूल डवलपमेंट आफिसर्स ने प्रदर्शन किया। इनकी मांग इनको स्थायी किये जाने की है। स्कूल डवलपमेंट आफिसर्स के इस प्र
20 नवंबर को ग्रीस में सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और मजदूरों ने 24 घंटे की आम हड़ताल कर अपने वेतन को बढ़ाने की मांग की। यह हड़ताल उस समय आयोजित की गयी है जब ग्रीस
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।
जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है
हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।