गाजा नरसंहार के दो वर्ष पूरे होने पर दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन

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इजरायल द्वारा गाजा का नरसंहार शुरू किये दो वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस पूरी अवधि में गाजा के समर्थन में दुनिया भर में जनता की एकजुटता बढ़ती गयी है। 2 वर्ष पूरे होने पर भी जगह-जगह लोगों ने फिलिस्तीन के समर्थन में 10-12 अक्टूबर को प्रदर्शन किये।     

1. आस्ट्रेलिया में अदालती रोक के बावजूद 10,000 प्रदर्शनकारी फिलिस्तीन के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मेलबर्न व ब्रिस्बेन में भी हजारों प्रदर्शनकारियों ने फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन किये। न्यू साउथ वेल्स के न्यायालय ने सिडनी में मार्च पर प्रतिबंध के साथ-साथ इसमें भाग लेने वालों को न्यायालय की अवमानना का दोषी मानने व आजीवन कारावास तक की सजा भुगतने की धमकी दी थी। पर इस धमकी को धता बताकर प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। 

2. 11 अक्टूबर को लंदन में 5 लाख लोगों ने फिलिस्तीनी जनता के समर्थन में रैली निकाली। यूरोप में तुर्की, नीदरलैण्ड में भी प्रदर्शन हुए। 

3. एशिया में पाकिस्तान, फिलीपींस, ताइवान, बांग्लादेश, जापान व भारत में विरोध प्रदर्शन हुए। 

4. अमेरिका व इजरायल में भी कुछ जगहों पर फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन हुए। 
    

ज्यादातर प्रदर्शनों में ट्रम्प के द्वारा थोपे समझौते को फिलिस्तीन की गुलामी का दस्तावेज कहा गया। सब जगह नरसंहार के अंत व फिलिस्तीन की आजादी की मांग की गयी। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?