म.प्र. कफ सिरप कांड : गरीब बच्चों की जान लेती व्यवस्था

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सितम्बर माह में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में कफ सिरप पीने से लगभग दो दर्जन बच्चों की मौत हो गई। कुछ बच्चे महाराष्ट्र में भी इस सिरप के पीने से मारे गए। यह ज्ञात आंकड़े हैं, यह आंकड़ा निश्चित ही इससे ज्यादा होगा। मध्य प्रदेश सरकार ने पहले एक डाक्टर को बर्खास्त कर मामले को रफा-दफा करने को प्रयास किया। यह बोलकर कि डाक्टर द्वारा गलत दवा लिखने की लापरवाही के कारण यह मौतें हुईं। जब मामला नहीं दबा तो बच्चों को दी गई दवा की जांच की गई। अंततः पता चला कि कोल्ड्रिफ नाम के सिरप, जिसे उन बच्चों ने लिया था, में डाईइथिलीन ग्लाईकोल की मात्रा लगभग 50 प्रतिशत थी, जबकि 5-10 प्रतिशत की मात्रा में भी यह किडनी के लिए घातक है। यह कोल्ड्रिफ सिरप तमिलनाडु स्थित श्रीसन फार्मास्युटिकल द्वारा निर्मित था। जब इस कम्पनी की फैक्टरी पर छापा मारा गया तो पता चला कि वहां निर्धारित मानकों का हर तरह से खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन चल रहा है। फिलहाल कम्पनी का दवा निर्माण का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है और उसके मालिक एस. रंगनाथन को गिरफ्तार कर लिया गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने मृतक बच्चों के परिवार को मात्र 4-4 लाख के मुआवजे की घोषणा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। मुख्यमंत्री मोहन यादव अब इस सम्बन्ध में पत्रकारों के सवाल भी सुनने से इंकार कर दे रहे हैं।
    
नकली और मानकहीन दवाओं से होने वाली इस प्रकार की मौतों का यह पहला और आखिरी मामला नहीं है। आजादी के बाद से ही यह एक मुद्दा रहा है। 1969 में ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सत्यकाम’ का यही प्रमुख विषय था। और भी ऐसी फिल्में उस जमाने में इस विषय पर बनती रही हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि पचास साल के बाद भी हमारे देश में नकली और मानकहीन दवाओं का यह कारोबार बदस्तूर जारी है। वर्तमान भारतीय पूंजीवादी समाज की विद्रूपता देखिए कि अब इस विषय पर कोई फिल्म तो दूर मुख्य संचार साधनों के ऊपर कोई चर्चा भी नहीं होती है। आज ऐसी किसी भी चर्चा को सरकार-मीडिया का गठजोड़ ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के विरुद्ध एक साजिश बोलकर देशद्रोह घोषित कर देगा।
    
गौरतलब है कि 2023 में भी कफ सिरप में बेहद हानिकारक डाईइथिलीन ग्लाईकोल नामक इस रसायन को लेकर विवाद उठा था। उस समय अफ्रीकी देश गाम्बिया में 70 बच्चों की और मध्य एशियाई देश उज्बेकिस्तान में 18 बच्चों की मौत इसी तरह के कफ सिरप के पीने से हुई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी जांच में पाया कि इन मामलों में क्रमशः मैडन फार्मास्युटिकल और मेरिओन बायोटैक नामक कम्पनियां द्वारा निर्मित कफ सिरप जिम्मेदार थे, यह दोनों ही कम्पनियां भारतीय हैं और यह कफ सिरप भारत से ही निर्यातित थे। उस समय भी भारत सरकार ने इस मामले को एक साजिश घोषित करके रफा-दफा कर दिया। अपनी तथाकथित जांच के कुछ समय बाद दूसरी कम्पनी को तो दवाईयां बनाने की इजाजत भी दे दी गई। वर्तमान भाजपा सरकारों का तो सूत्र बिल्कुल स्पष्ट है। प्रत्येक आरोप को साजिश घोषित कर दो, हर घटना को मानने से इंकार कर दो। जब यह सब मुश्किल हो तो मामले को हल्का बनाने के लिए अपने पालतू मीडिया को लगा दो। मीडिया में बच्चों की मौतों के मुद्दे पर रस्म अदायगी करके उसे खत्म मान लिया गया।
    
यहां एक तथ्य ध्यान देने योग्य है। कुछ समय पहले सर्वाच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने इलेक्टोरल बांड के आंकड़ों का विवरण जारी किया था। उन आंकड़ों में यह तथ्य मौजूद है कि राजनीतिक दलों को मिले इलेक्टोरल बांड वाले चंदों में 935 करोड़ का चंदा दवा निर्माता कम्पनियों द्वारा दिया गया था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह चंदा किस राजनीतिक दल को मिला होगा। दरअसल भाजपा ने इलेक्टोरल बान्ड की व्यवस्था को चंदा उगाही का औजार बना लिया था। जिस क्षेत्र या कम्पनी में गड़बड़ी मिले तुरन्त चंदा उगाही का फरमान उस कम्पनी के लिए जारी कर दो। इलेक्टोरल बांड भाजपा के भ्रष्टाचार का एक बड़ा खेल रहा है। जब इसका वास्तविक खुलासा होगा, तब जाकर इसकी गम्भीरता विस्तार में सामने आयेगी। लेकिन इसके नतीजे तो सामने आ ही रहे हैं। हाल में हुई इन बच्चों की मौतें इसी भ्रष्टाचार और दवा कम्पनी मालिकों की मुनाफाखोरी का नतीजा है। बड़ी-बड़ी दवा कम्पनियां हर वर्ष देश के नामी-गिरामी डाक्टरों और अस्पताल मालिकों के ऊपर अरबों रुपया खर्च करती हैं, केवल इसलिए कि वे लोग उनके द्वारा निर्मित दवाईयों को प्रचलन में बढ़ावा दें। इसी तरह की खरीद-फरोख्त सरकारी अधिकारियों और दवा मानक नियंत्रक संस्थाओं के अधिकारियों की भी होती है। इस सबकी कीमत चुकाते हैं, गरीब मजदूर-किसान और उनके परिजन।
    
सरकार हर संभव प्रचार करती है कि आज हम विश्व में तीसरे नम्बर के दवा निर्माता हैं और जेनरिक दवाईयों के निर्यात में हम दुनिया में नम्बर एक हैं। 2025 में भारत का दवा निर्यात 30 अरब अमेरिकी डालर को पार कर गया है। लेकिन इन आंकड़ों के नीचे दबी भयावह सच्चाई पर न तो सरकार न ही कारपोरेट मीडिया बात करता है। कोई भी घटना घट जाने के बाद सरकार ‘सख्त रवैया’, ‘जीरो टोलरेन्स’, ‘बख्शा नहीं जायेगा’ आदि, आदि जुमले उछालती है। सवाल यह है कि घटना होने से पहले सरकारें क्या कर रही होती हैं, साथ ही घटना पर चर्चा ठंडी पड़ जाने के बाद फिर वही पुरानी चाल-ढाल वापस क्यों लौट आती है। सिर्फ इसलिए कि मरने वाले गरीब हैं, उनकी जान की पूंजीवादी व्यवस्था में कोई कीमत नहीं है, आज आम भारतीय जनमानस बर्दाश्त करते चले जाने की ही मनोस्थिति में बना हुआ है या हिन्दू-मुसलमान के झूठे मुद्दों मेंं उलझा हुआ है।
    
इसी अक्टूबर माह के शुरूआत की ही बात है। अमेरिका की एक अदालत ने जानसन एंड जानसन कम्पनी पर लगभग 8500 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इस कम्पनी द्वारा बनाये जाने वाले पाउडर का नियमित उपयोग करने से एक 88 वर्षीय महिला को कैंसर हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। उस पाउडर में ऐस्बैस्टस की अत्यधिक मात्रा थी, जो कैंसर का कारण बनी। आरोप सिद्ध होने के बाद अमेरिकी अदालत ने कम्पनी पर 140 करोड़ रुपये मुआवजे और 8360 करोड़ रुपये सजा के बतौर पीड़ित महिला के परिजनों को भुगतान करने का फैसला सुनाया। और हमारे देश में अभी क्या हुआ है? 4 लाख रुपये मुआवजा, भारी दबाव के बाद एक-दो लोगों की गिरफ्तारी, जो निश्चित ही कुछ दिन में जमानत पर छूट जायेंगे और अंततः बरी हो जायेंगे या सजा हुई भी तो कुछ हजार का जुर्माना और चंद माह की जेल। 
    
सच हमारी नजर के सामने है। गरीब देशों में आम लोगों की जिन्दगियों की सरकार और उसकी संस्थाओं-विभागों-अधिकारियों की नजर में क्या कीमत है।

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