अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाजापट्टी में युद्ध समाप्त करने सम्बन्धी अपनी 20 सूत्रीय वर्तमान योजना को अंजाम देना शुरू कर दिया है। इसके तहत इजरायल और गाजापट्टी के प्रतिरोध संगठनों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता हुई जिसकी मध्यस्थता मिश्र, कतर और तुर्की कर रहे थे और यह अमरीकी निगरानी में हुई थी। इस समझौते को चार चरणों में बांटा गया है। अभी पहला चरण लागू हो रहा है। इस पहले चरण में हमास बचे हुए सभी इजरायली बंधकों को रिहा करेगा। इसके जवाब में इजरायल करीब 2000 फिलिस्तीनी बंदियों को रिहा करेगा। हमास ने लम्बे समय से कैद कुछ फिलिस्तीनी नेताओं को अपनी रिहाई सूची में दर्ज करके मांग की है लेकिन इजरायली हुकूमत उसे स्वीकार नहीं कर रही है। यह बंदियों की रिहाई समझौता होने के 72 घण्टे के भीतर लागू होने की शर्त रखी गयी है। इसके अतिरिक्त, इजरायल गाजापट्टी में जमीनी, हवाई या पानी से हमला पूर्णतया बंद कर देगा, यह समझौते का प्रावधान रखा गया है। भोजन, दवायें और अन्य राहत सामग्रियों को आने से इजरायल नहीं रोकेगा। यह राहत सामग्री आना शुरू हो चुकी है। समझौते के प्रथम चरण में इजरायली सेना गाजापट्टी के कुछ इलाकों को खाली करके वापस लौट जायेगी। इस पहले चरण के लागू होने के बाद ट्रम्प की योजना के दूसरे, तीसरे और चौथे चरण की प्रक्रिया लागू होगी। इसमें हमास और प्रतिरोध समूहों को निरस्त्र करना और हमास की सत्ता को समाप्त करके ट्रम्प और पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की सरपरस्ती में गाजापट्टी में सरकार का गठन शामिल है।
हमास और प्रतिरोध आंदोलन के नेता जहां इस प्रथम चरण के समझौते को स्थायी शांति की दिशा में एक कदम के बतौर देख रहे हैं वहीं यहूदी नस्लवादी नेतन्याहू सरकार इसे आगे के हमले और अपनी वृहत्तर इजरायली परियोजना को लागू करने के बीच एक मध्यान्तर काल समझ रही है। अमरीकी साम्राज्यवादी हमेशा इजरायली कब्जाकारियों का समर्थन और सहयोग करते रहे हैं।
जब समझौता लागू होने का समय आ गया और गाजापट्टी की फिलिस्तीनी आबादी जश्न मनाने के लिए जगह-जगह इकट्ठा होने लगी, तभी इजरायली हवाई हमले कई जगह हुए जिसमें कई लोग मारे गये और 70 से अधिक घायल हुए। इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता समझौता लागू होते समय भी फिलिस्तीनी आबादी पर दहशत का माहौल बनाये रखने की उम्मीद में कत्लेआम कर रही है।
दो साल से जारी नरसंहार और विनाश के बावजूद इजरायली हुकूमत अपना कोई भी बुनियादी मकसद नहीं हासिल कर सकी। न तो वह हमास का सफाया कर सकी और न ही इजरायली बंधकों की रिहाई अपने सैनिक हमले के जरिये कर सकी। हालांकि वह हमास के कुछ नेताओं को आतंकवादी हमलों के जरिए मौत के घाट उतारने में कामयाब रही, लेकिन इन सब कदमों के जरिए वह फिलिस्तीनियों के अपनी जमीन के प्रति प्रेम को कम नहीं कर सकी। लाखों की संख्या में लोगों को जबरन विस्थापित करने के बाद जब पिछले समझौते के पहले चरण की घोषणा हुई तो लाखों लोग अपने घर गाजा शहर की ओर चल पड़े। यह जानते हुए भी कि वहां उनका घर मलबे में तब्दील हो चुका है, वे वहां गये और फिर से अपने नये जीवन की तलाश में, उसको संवारने में लग गये।
आखिरकार ट्रम्प और इजरायल यह समझौता करने के लिए क्यों मजबूर हुए? इजरायल के पास इस क्षेत्र की सबसे आधुनिक सेना है और अमरीकी साम्राज्यवादी उसके पीछे खड़े हैं और अरबों डालर की सैन्य मदद वे कर रहे हैं, तब भी वह समझौता करने को क्यों मजबूर हुआ? इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि दुनिया भर में इजरायली हुकूमत अलग-थलग पड़ती जा रही थी। दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश और न्यायप्रिय आबादी तो इसके विरोध में प्रदर्शन कर रही थी। उनके इजरायल के विरोध और फिलिस्तीन के पक्ष में प्रदर्शनों ने यूरोप के देशों के शासकों को भी मजबूर कर दिया कि वे इजरायली अत्याचारों और नरसंहार के विरोध में बोलें और स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य का समर्थन करें। इजरायली हुकूमत को अभी तक खुला समर्थन कर रहे यूरोपीय शासक अब इजरायली अत्याचारों की निंदा करने के लिए मजबूर हुए। खुद अमरीकी साम्राज्यवादियों के अपने देश के भीतर इजरायली अत्याचारों और नरसंहार का विरोध तेज से तेजतर होता गया। इससे खुद यहूदी नस्लवादी इजरायली सरकार के समर्थकों में भी दरार पड़ने लगी और वे इजरायल की नेतन्याहू हुकूमत के नरसंहार और महाविनाश के विरुद्ध आवाज उठाने लगे। इससे ट्रम्प भी शांति की योजना पेश करने के लिए मजबूर हो गये।
यही हाल पश्चिमी एशिया की क्षेत्रीय ताकतों का रहा है। बल्कि उनको तो अपने यहां विद्रोह होने का ज्यादा बड़ा खतरा नजर आ रहा है। अरब जगत की मजदूर-मेहनतकश और न्यायप्रिय आबादी फिलिस्तीनी लोगों के साथ भाईचारे के सम्बन्धों में बंधी हुई है। वे जब अपने अरब फिलिस्तीनी भाइयों पर यहूदी नस्लवादी इजरायली सत्ता का दमन, अत्याचार, नरसंहार, विनाश और विस्थापन देखते हैं तो उनका खून खौल जाता है। वे फिलिस्तीनी लोगों के समर्थन और इजरायली सत्ता के विरोध में लाखों की तादाद में उठ खड़े होते हैं। इससे इन अरब सत्ताधीशों को अपनी सत्ता के विरुद्ध बगावत का खतरा आसन्न लगने लगता है। इस आसन्न खतरे के डर से ये फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य का दर्जा देने की मांग करने लगते हैं। अन्यथा, फिलिस्तीन की आजादी का मसला इनके ठंडे बस्ते में चला गया था। ये तो काफी अरसे से इजरायली हुकूमत के साथ अपने व्यापार को बढ़ा रहे थे। ये इस नरसंहार और महाविनाश के दौरान भी इजरायल को तेल आपूर्ति सुनिश्चित करा रहे थे और उससे गैस खरीद रहे थे। यहां तक कि जब यमन के हूथी लोगों ने इजरायल आने-जाने वाले जहाजों पर लाल सागर में पाबंदी लगा रखी थी, तब ये जमीन के रास्ते इजरायल को उसकी जरूरतों का सामान उपलब्ध कराने में मदद कर रहे थे। इनमें साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जार्डन शामिल थे। तुर्की तो अजरबैजान के तेल को समुद्री रास्ते-पूर्वी भूमध्यसागर के रास्ते- से इजरायल को तेल और अन्य जरूरी सामान मुहैय्या कराने में मदद कर रहा था।
इनमें से कुछ तो इजरायल के साथ अब्राहम समझौते के तहत सामान्य सम्बन्धों में जुड़कर उसकी मदद कर रहे थे। अब ये ट्रम्प की 20 सूत्रीय शांति योजना के अनुयायी के बतौर उपस्थित हुए हैं। मिश्र के शर्म अल-साब शहर में इस समझौता वार्ता में भागीदार बन कर इन्होंने इस समझौते को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। फिर भी, ये हमास और प्रतिरोध संगठनों पर हथियार छोड़ने के लिए दबाव बनाने में लगे हुए थे। उनके इस प्रस्ताव को प्रतिरोध के नेताओं ने अस्वीकार कर दिया। इसके बावजूद, इस समझौते को कराने में मिश्र, कतर और तुर्की की वस्तुगत तौर पर एक सकारात्मक भूमिका रही है।
यहां अंतर्राष्ट्रीय समर्थन में उतरे सुमुद फ्लोटिला के 40 से अधिक देशों से आयी सहायता सामग्री पहुंचाने वालों की भूमिका को भी बताना आवश्यक है। ये गाजापट्टी में भुखमरी का सामना कर रहे और कुपोषित बच्चों के लिए राहत सामग्री लेकर समुद्री रास्ते से गाजापट्टी जा रहे थे। इन्हें इजरायली सत्ता ने समुद्र में ही रोक दिया और इनके 497 सदस्यों की गिरफ्तारी करके कुछ दिनों बाद इन्हें अपने-अपने देशों में भेज दिया। इसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर भर्त्सना हुई और इजरायली सत्ता द्वारा इनके साथ किये गये दुर्व्यवहार और यातना देने की चर्चा से यूरोप के देशों के भीतर इजरायली हुकूमत के विरुद्ध बड़े पैमाने के प्रदर्शन हुए हैं। इन प्रदर्शनों ने भी यूरोप की इजरायल समर्थक सत्ताओं को एक हद तक इजरायल विरोधी रुख अपनाने के लिए बाध्य कर दिया है।
जहां तक हमास और अन्य प्रतिरोध संगठनों का सम्बन्ध है, वे इस समझौता वार्ता में इसलिए शामिल हुए क्योंकि पिछले दो वर्षों से गाजापट्टी के फिलिस्तीनी लोगा, विशेष तौर पर महिलायें और बच्चे भयंकर गोलीबारी, तबाही और बर्बादी के शिकार होकर भुखमरी, बीमारी और हर तरह के अभाव से गुजर रहे थे। उनके पास न रहने का ठिकाना था, न भोजन, न दवा, इलाज के लिए अस्पताल, न स्वच्छ पीने का पानी और न ईंधन, न बिजली व न साफ-सफाई का इंतजाम कुछ नहीं था। सब कुछ विशाल मलबे में तब्दील हो चुका था। हजारों की तादाद में लोग नेस्तनाबूद किये गये घरों के मलबों के नीचे दबे पड़े थे। 67 हजार से ज्यादा बमबारी में मारे गये, इनमें से 50 फीसदी से ज्यादा महिलायें और बच्चे थे। ऐसी स्थिति में जब अंतर्राष्ट्रीय राहत पर भी इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत ने प्रतिबंध लगा दिया हो और राहत के नाम पर हत्यारों के गिरोह द्वारा राहत सामग्री का बंटवारा करने के दौरान बच्चों, बूढ़ों और कतार में लगे लोगों की हत्या की जा रही हो, तब गाजापट्टी की आबादी की जीने की स्थिति बनी रहे, इसके लिए राहत सामग्री की और कुछ दिनों के लिए ही सही शांति की जरूरत थी। इसके लिए प्रतिरोध आंदोलन के नेता हमेशा सक्रिय रहे हैं। जैसे ही ट्रम्प की 20 सूत्रीय योजना सामने आयी तो इसके पहले चरण को लागू करने का हमास और अन्य प्रतिरोध संगठनों के नेताओं ने समर्थन किया। इससे यह समझौता सम्पन्न हो सका।
लेकिन जैसा कि इजरायल की यहूदी नस्लवादी सत्ता का अतीत का इतिहास रहा है, यह अपने समझौते को कभी भी अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ देती है और इसका दोष अपने विरोधियों के ऊपर डाल देती रही है। अब की बार, इससे भिन्न यह आचरण करेगी, इसकी उम्मीद न के बराबर है।
इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता ने 1978 में मिश्र के राष्ट्रपति अनवर सादात के साथ कैम्प डेविड समझौता किया था। इस समझौते में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ने हिस्सा नहीं लिया था। इस समझौते के बाद के चरणों को कभी भी लागू नहीं किया गया। इन चरणों के अनुसार, इजरायल को जार्डन और मिश्र के साथ मिलकर फिलिस्तीनी सवाल का समाधान करने, पांच वर्षों के भीतर पश्चिमी तट पर और गाजा में फिलिस्तीनी स्वशासन की अनुमति देने, तथा पूर्वी येरूशलम सहित पश्चिमी तट में इजरायली बस्तियों के निर्माण को समाप्त करने का वादा शामिल था।
1993 में ओस्लो समझौते के तहत फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन ने इजरायल के अस्तित्व के अधिकार को माना और इजरायल ने पी एल ओ को फिलिस्तीनी लोगों का वैध प्रतिनिधि माना। लेकिन इसके बाद पी एल ओ को दंतहीन कर दिया गया। 1995 में ओस्लो-II के तहत शांति और फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में एक प्रक्रिया बताई गयी। ओस्लो-II समझौते के तहत पश्चिमी तट से इजरायली सेना हटाने का जो वायदा था, वह इजरायल ने कभी पूरा नहीं किया। इजरायल ने अपनी सेना हटाना तो दूर वहां यहूदी बस्तियां लगातार बसाना जारी रखा।
अभी हाल ही में 18 मार्च, 2025 को इजरायल ने पिछले दो महीने से चले आ रहे संघर्ष विराम को धता बताते हुए गाजापट्टी में हवाई हमला शुरू कर दिया जो अभी तक जारी रहा है। इस हवाई हमले में पहली ही रात को लगभग 400 लोगों की मौत हो गयी।
इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि इजरायली यहूदी नस्लवादी नेतन्याहू की हुकूमत इस बार इससे भिन्न आचरण करेगी, इसमें संदेह है।
हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन के योद्धा इस इजरायली आचरण के प्रति सचेत हैं। इसलिए वे ट्रम्प से इस बात की गारण्टी चाहते हैं कि इजरायल पहले चरण के बाद फिर से हमला न शुरू करे। ट्रम्प और अन्य मध्यस्थों ने प्रतिरोध संगठनों को आश्वस्त किया है कि इस बार ऐसा नहीं होगा।
अमरीकी साम्राज्यवादियों की इस आश्वस्ति पर कोई कैसे भरोसा कर सकता है? ट्रम्प हुकूमत के साथ ईरानी वार्ताकारों की अप्रत्यक्ष बातचीत के दौरान ही ईरान पर इजरायल ने हमला किया था। इस हमले का ट्रम्प ने समर्थन कर दिया था। इसी प्रकार कतर में हमास के लोगों को खत्म करने के लिए इजरायल ने दोहा की नागरिक आबादी वाले इलाके में हमला किया था। यह भी ट्रम्प की जानकारी में किया गया था। ट्रम्प या किसी भी साम्राज्यवादी के वायदों पर कोई मूर्ख ही आंख मूंद कर भरोसा कर सकता है।
ट्रम्प या अमरीकी साम्राज्यवादियों की विदेश नीति सैनिक-औद्योगिक काम्प्लेक्स के हितों द्वारा निर्धारित होती है। सैनिक-औद्योगिक काम्प्लेक्स के स्वार्थ हथियारों और गोला-बारूद की बिक्री में हैं। हथियारों और गोला-बारूद की बिक्री तभी जारी रह सकती है और बढ़़ सकती है जब युद्ध लगातार होते रहें। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार युद्धों के नये-नये क्षेत्र में जाते हैं और उन्हें बढ़ाते हैं।
नेतन्याहू की सत्ता तभी तक बनी रहेगी, जब तक वह किसी न किसी युद्ध में इजरायली अवाम को लगाये रखे। लेकिन बात सिर्फ नेतन्याहू की नहीं बल्कि यहूदी नस्लवादी सत्ता की है। इस यहूदी नस्लवादी सत्ता का वृहत्तर इजरायल का लक्ष्य है। यह अभी पूरा नहीं हुआ है। और न इजरायल का यह उद्देश्य बदला है। इस उद्देश्य के तहत गाजापट्टी से फिलिस्तीनियों का निष्कासन पहली शर्त है। इसलिए यह युद्ध किसी न किसी रूप में तब तक जारी रहेगा, जब तक इजरायली नस्लवादी सत्ता का या तो लक्ष्य बदल जाये या फिलिस्तीनी आबादी गुलाम बन जाये। या इजरायली नस्लवादी सत्ता को ध्वस्त कर दिया जाये।