अमेरिका-चीन फिर टैरिफ युद्ध की ओर

/amerika-china-phir-tariff-yuddha-ki-aur

साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका और साम्राज्यवादी चीन फिर आमने-सामने आ गये हैं। इस बार मसला दुर्लभ मृदा धातुओं पर नियंत्रण का है। 
    
30 सितम्बर को अमेरिका ने सेमीकंडक्टर चिपों के निर्यात पर प्रतिबंध की बात करते हुए कहा कि अमेरिकी चिपों का इस्तेमाल अमेरिकी निर्देशन में ही किया जा सकता है। साथ ही अमेरिका ने चीनी जहाजों पर बंदरगाह शुल्क बढ़ा दिया। अमेरिका के इस कदम के विरोध में 9 अक्टूबर से चीन ने अपने यहां से दुर्लभ मृदा खनिजों व उससे जुड़ी तकनीक के निर्यात हेतु लाइसेंस लेना अनिवार्य कर इस पर कठोर नियंत्रण लगाने की घोषणा कर दी। इस तरह अमेरिका की व्यापार बाधाओं का जवाब एक बार फिर चीन ने दुर्लभ मृदा धातुओं के अमेरिका को निर्यात में रुकावट खड़ी करके दिया। पहले भी अप्रैल 25 में ट्रम्प द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बाद चीन ने दुर्लभ मृदा धातुओं के निर्यात पर रोक लगा अमेरिका को कदम पीछे खींचने को बाध्य कर दिया था। 
    
अब चीन के निर्यात पर नियंत्रण के जवाब में पुनः ट्रम्प द्वारा चीनी मालों पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा हो चुकी है। 
    
30 सितम्बर को अमेरिका ने चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों को अमेरिकी चिपों या ताइवान में अमेरिकी तकनीक पर बनी चिपों की आपूर्ति पर रुकावट खड़ी कर दी। चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों को निशाने पर लेने वाले इस कदम पर चीन की कार्यवाही अवश्यम्भावी थी। चीन ने 9 अक्टूबर को 0.1 प्रतिशत अधिक दुर्लभ मृदा धातु वाले चीनी उत्पाद के निर्यात हेतु सरकारी लाइसेंस की घोषणा कर दी। अब चीन से दुर्लभ मृदा सामग्री की थोड़ी मात्रा भी बगैर सरकारी अनुमति मुश्किल हो गयी। दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण में चीन का 90 प्रतिशत कब्जा है। इनका उपयोग इलेक्ट्रोनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा तकनीक आदि में होता है। साथ ही चीन ने अमेरिकी जहाजों पर विशेष बंदरगाह शुल्क भी लगा दिय। चीन की इन घोषणाओं के जवाब में अमेरिका ने 1 नवम्बर 25 से लागू होने वाले चीनी मालों पर अतिरिक्त 100 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा कर दी। ये टैरिफ इस वर्ष की शुरूआत में लगाये गये मौजूदा 30 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त होगा। इस तरह कुछ क्षेत्रों में टैरिफ दर 130 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। 
    
ये टैरिफ युद्ध ऐसे समय में शुरू हुआ है जब एपेक शिखर सम्मेलन में ट्रम्प व शी जिन पिंग मिलने वाले थे। अब इस बैठक पर ग्रहण लग चुका है। 
    
अमेरिका जहां चीनी मृदा धातुओं पर काफी निर्भर है वहीं अमेरिका चीन के लिए बड़े बाजार के अलावा अमेरिकी ए आई, स्मार्टफोन चिप्स व र्स्माटफोन आपरेटिंग सिस्टम पर चीन बहुत निर्भर है। इस तरह मौजूदा टैरिफ युद्ध दोनों देशों के हितों के साथ वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं व उसमें शामिल अन्य देशों को भी प्रभावित करेगा। दुनिया भर की तमाम अर्थव्यवस्थायें दो बड़े साम्राज्यवादियों की जंग से प्रभावित होंगीं। 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।