हिंदू फासीवादी मोदी सरकार एवं भाजपा शासित राज्य सरकारों में हर तरह से जनवाद और लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। जनता को फासीवादी आतंक के साये में जीने मजबूर किया जा रहा है। संघ-भाजपा के इस फासीवादी आतंक का निशाना मजदूर मेहनतकश हैं। सामाजिक समूहों में सबसे ज्यादा इनके निशाने पर मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय है। मुसलमान समुदाय के हर अधिकार को कुचलकर उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों को फासीवादी बूटों तले रौंदा जा रहा है।
फासीवादी संगठन और उसके कारिंदों द्वारा चलाई जा रही इस मुहिम के तहत मुसलमानों को उनके बुनियादी अधिकार अपने धर्म का पालन करने, अपनी धार्मिक मूल्य-मान्यताओं का निर्वहन करने, अपने धार्मिक त्यौहारों को मनाने, अपनी सांस्कृतिक विरासत को अपनाने और उसका प्रदर्शन करने से उन्हें रोका जा रहा है। मुसलमानों के आम धार्मिक व सामाजिक समारोहों को भी कुछ हिंदूवादी संगठनों की शिकायत पर रोक दिया जाता है। नई परंपरा का बहाना बनाकर उनके कार्यक्रम को तहस-नहस कर दिया जाता है। अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा जब अपने अधिकारों की हिफाजत की बात की जाती है, सरकार के निर्णय का विरोध किया जाता है, तो पुलिस प्रशासन और हिन्दू फासीवादी संगठनों द्वारा उन पर हमले किए जाते हैं। इन हमलों का प्रतिरोध जब पीड़ित समुदाय करता है तो उनका भीषण दमन किया जाता है। फर्जी मुकदमों, फर्जी गिरफ्तारियों में उन्हें फंसाकर टार्चर करने की कार्यवाही की जाती है। इसके बाद अल्पसंख्यक समुदाय को भांति-भांति से आरोपी बनाकर उन्हें न सिर्फ जेलों में सड़ाया जाता है बल्कि उन पर आर्थिक हमला भी बोला जाता है।
मुसलमानों के आर्थिक बायकाट के साथ ही उनकी दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, धार्मिक स्थलों से लेकर उनके घरों तक को बुलडोजर से ढहा दिया जाता है। पूरे सामाजिक समूह को डर के साए में जीने को मजबूर कर दिया जाता है। प्रदेश के मुख्यमंत्री भाषण में खुलेआम सबक सिखाने की धमकी देते हैं। जिससे हमलावर लंपट संगठनों के कार्यकर्ताओं के हौंसले और भी बढ़ जाते हैं। कुल मिलाकर फासीवादी आतंक का नंगा नाच बदस्तूर जारी रहता है। योगी सरकार के इस माडल को अन्य भाजपा शासित राज्य भी तेजी से अपना रहे हैं। इसका मतलब है कि यह फासीवादी हमला देशव्यापी रूप ग्रहण कर रहा है। जिसका नेतृत्व केंद्रीय स्तर पर मोदी सरकार कर रही है।
इसी कड़ी में एक घटना कानपुर में घटती है। कानपुर में ईद मिलादुन्नबी के अवसर पर एक कार्यक्रम मुसलमान समाज द्वारा आयोजित किया गया। इस बार मुहम्मद साहब का 1500 वां जन्मदिवस था। इसलिए पूरी ही दुनिया में मुसलमानों ने इस त्यौहार को बड़ी धूमधाम से मनाया। इस खास मौके पर इस्लाम को मानने वाले लोग अपने नबी की याद में कुछ खास बनाना चाहते थे। इस खास बनाने की चाहत में मुस्लिम नौजवानों ने कहीं-कहीं कुछ खास प्रयोग किए। इन प्रयोगों में ही एक प्रयोग था, अपने नबी से प्यार का इजहार। इस इजहार को व्यक्त करने के लिए मुहम्मद साहब के अनुयायियों ने एक बैनर लगाया जिस पर लिखा था- आई लव मुहम्मद। लेकिन उत्तर प्रदेश में सत्ता के नशे में चूर फासीवादी योगी सरकार और उनके समर्थक हिंदूवादी संगठनों को मुसलमान समुदाय का अपने धर्म और उसके पैगम्बर के प्रति यह प्यार रास नहीं आया। और उन्होंने ‘‘आई लव मुहम्मद’’ के बैनर को आधार बनाकर कानपुर में कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया और उन्हें जेल भेज दिया गया। इस गलत कार्यवाही को जायज ठहराने के लिए कहा गया कि मुसलमानों ने नई परंपरा डाली है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जबकि हिन्दू धार्मिक त्यौहारों को मनाने के लिए पूरा शासन-प्रशासन जुट जाता है। पूरे देश का आम जनजीवन इन त्यौहारों के समय अस्त-व्यस्त हो जाता है। हमने कांवड़ यात्रा के समय कांवड़ियों के उत्पात को भी देखा है। वहीं इन कांवड़ियों पर शासन-प्रशासन को फूल बरसाते और उनकी सेवा करते देखा है। कांवड़ यात्रा में लूटपाट, छेड़छाड़ और मारपीट सब जायज है, इसके बाद भी इन्हें मिलती सरकारी सेवा देखने से लगता है कि इस देश का शासन-प्रशासन कितना धार्मिक है। इनका फासीवादी चरित्र तब सामने आ जाता है जब यही लोग अल्पसंख्यक समुदायों को अपने त्यौहारों पर अपमानित करते हैं, उनका दमन करते हैं।
कानपुर की इस घटना के बाद पूरे देश में हर जगह ‘‘आई लव मुहम्मद’’ के समर्थन और पुलिस कार्यवाही के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मुसलमान धार्मिक समूहों और संगठनों द्वारा प्रदर्शन आयोजित किए गए। लेकिन उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रशासन ने इन सभी प्रदर्शनों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। इसमें मुसलमान समुदाय के लोगों को बड़ी संख्या में गिरफ्तार किया गया।
इसी कड़ी में ‘‘आई लव मुहम्मद’’ के समर्थन और पुलिस कार्यवाही के विरोध में बरेली में एक प्रदर्शन और ज्ञापन के कार्यक्रम का आह्वान किया गया। यह आह्वान इतिहाद ए मिल्लत कौंसिल के नेता मौलाना तौकीर रजा खान ने किया था। मौलाना तौकीर रजा खान आला हजरत के खानदान से ताल्लुक रखते हैं। बरेली सहित पूरे देश में आला हजरत के अनुयायी काफी ज्यादा हैं। इस कारण मौलाना तौकीर रजा खान भी काफी मशहूर शख्सियत बन जाते हैं। स्थानीय राजनीति में भी उनकी दखलंदाजी रहती है। हालांकि जैसा कि बरेली में आम तौर पर स्थापित बात है कि मौलाना तौकीर रजा खान शासन-प्रशासन की मिलीभगत से इस तरह के आयोजन करते रहते हैं। लोगों का इस कार्यक्रम के बारे में अंदाजा भी कुछ ऐसा ही था। 26 सितंबर के दिन शुक्रवार जुम्मे की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कालेज के मैदान में लोगों को इकट्ठा होना था। यहां से मार्च करते हुए जिला मुख्यालय जाकर एक ज्ञापन देना था। जिला प्रशासन ने इस कार्यक्रम को रोकने का प्रयास किया। एक बार यह भी अफवाह उड़ी कि मौलाना तौकीर रजा ने कार्यक्रम वापस ले लिया है। लेकिन उन्होंने कहा कि कार्यक्रम वापस नहीं लिया गया है। कार्यक्रम तय समय पर ही होगा।
26 सितंबर को सुबह से ही पूरे शहर को छावनी में तब्दील कर दिया गया। जुम्मे की नमाज के बाद जैसे ही अलग-अलग जगहों से लोग इस्लामिया इंटर कालेज के मैदान की तरफ आना शुरू हुए, मौलाना तौकीर रजा खान को उसके घर में कैद (हाउस अरेस्ट) कर लिया गया। और कालेज के आस-पास सड़कों पर बेरीकेड लगाकर भीड़ को रोका जाने लगा। भीड़ बढ़ती गई, भीड़ मैदान में जाने की कोशिश कर रही थी। लोगों के हाथों में ‘‘आई लव मुहम्मद’’ की तख्तियां और बैनर थे। ऐसे में पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। इस लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। पुलिस अपने बयान में कह रही है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर पत्थर फेंके गए। लेकिन वायरल वीडियो में ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा। हालांकि एक वीडियो में लोग किसी गैर मुस्लिम के बारे में कह रहे हैं कि देखो वो छत से पत्थर फेंक रहा है। लेकिन वो व्यक्ति भी अकेला ही दिख रह था। ऐसे में पत्थरबाजी जैसी घटना या पुलिस से मारपीट की घटना कहीं नहीं दिखती। बल्कि पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के बाद सड़क पर सिवाए लोगों की चप्पलों के कुछ नहीं दिख रहा था। घायलों को अस्पताल ले जाया गया।
अगले दिन मौलाना तौकीर रजा और उनके साथ कुछ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उसके बाद पुलिसिया उत्पीड़न का तांडव शुरू होता है। बड़ी संख्या में नौजवानों सहित ढेरों लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस हिरासत में क्रूरतापूर्वक टार्चर किया गया। टार्चर करने के बाद लोगों की लंगड़ाते, हाथ जोड़े, रोते हुए पुलिस द्वारा परेड कराया जाना और यह वीडियो वायरल करना यह दिखाता है कि किस तरह समाज को आतंकित करने को कोशिश की जा रही है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो पर दूषित फासीवादी मानसिकता के लोगों द्वारा पुलिस के इस कृत्य की तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं। लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों के बाद पुलिस जब सड़क पर मार्च कर रही थी तो स्थानीय हिन्दू व्यापारियों ने पुलिस को मिठाई खिलाई और फूल बरसाए। तमाम वीडियो वायरल होते हैं जिसमें हिंदूवादी संगठनों की भीड़ नारे लगा रही है कि यू पी पुलिस लट्ठ बजाओ हम तुम्हारे साथ हैं। यह घटना यह दिखाती है कि एक समुदाय पुलिस की ज्यादतियों का शिकार हो रहा है तो दूसरा समुदाय खुश हो रहा है। इससे मुसलमानों के खिलाफ समाज में फासीवादी संगठनों द्वारा फैलाई गई नफरत का असर देखा जा सकता है।
एक ओर जहां पुलिस द्वारा दबिश और गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है वहीं दूसरी तरफ मुसलमानों पर आर्थिक हमला और बुलडोजर बाबा की कार्यवाही जारी है। वक्फ बोर्ड द्वारा संचालित बाजार की दुकानों को सील कर दिया गया। पुलिस द्वारा बनाए गए आरोपियों के घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, दुकानों को बुलडोज किया जा रहा है। बड़ी संख्या में लोगों की रोजी-रोटी के साधनों को बर्बाद किया जा रहा है। मौलाना तौकीर रजा के सहयोगियों, रिश्तेदारों, परिजनों को निशाना बनाया जा रहा है। या तो उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा है या उनके प्रतिष्ठानों को ध्वस्त किया जा रहा है। बरेली शहर के नामी गिरामी बारात घरों को सील कर दिया गया। इस तरह हिन्दू फासीवादियों के कदम एक फासीवादी राज्य की ओर बढ़ रहे हैं। किसी राजनीतिक पार्टी के नेता या सामाजिक कार्यकर्ताओं को पीड़ितों से नहीं मिलने दिया जा रहा है। मिलने जाने वालों को रोका जा रहा है। पुलिस का कहना है कि उसने शहर को कर्फ्यू से बचा लिया। लेकिन एक अघोषित कर्फ्यू जारी रखा। इंटरनेट बंद कर दिया गया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, दबिशें डाली गईं। कहा जा सकता है कि एक तनावपूर्ण शांति रही।
अभी भी मुसलमान समुदाय में डर का माहौल है। बाकी शहर में शांति है। लेकिन शहर में घटी यह घटना कई सवाल छोड़ गई है। क्या फासीवादी योगी सरकार चाहती है कि मुसलमान लोग कोई प्रतिक्रिया दें और उसका दमन किया जाए, उसे सबक सिखाया जाए। अन्यथा तो किसी भी समुदाय का यह जनवादी अधिकार है कि वह धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, रैली के कार्यक्रम अपनी मांगों को लेकर कर सकता है। अगर प्रशासन चाहता तो इस प्रदर्शन को शांतिपूर्वक हो जाने देता और उनका ज्ञापन लेकर मामला रफा दफा करता। लेकिन शासन-प्रशासन को यही चाहिए था जो हुआ। या ये कहें वे चाहते थे कि कुछ ऐसा हो जिससे दमन का मौका मिले। दूसरी बात मुसलमान समुदाय के धार्मिक नेता जनवादी अधिकारों को कुचलने के विरुद्ध लड़ाई को धार्मिक गोलबंदी के माध्यम से लड़ने की कोशिश करते हैं। जिससे उनकी इस गोलबंदी का फायदा फासीवादी ताकतों को अपनी गोलबंदी को और मजबूत बनाने के रूप में होता है। कुल मिलाकर मुसलमान समुदाय फासीवादियों के लिए आसान चारा बन जाता है।
मौलाना तौकीर रजा के बारे में भी शहर के लोगों की कोई सही राय नहीं है। इनके बारे में कहा जाता है कि यह शख्स अपनी राजनीति को चमकाने और अपनी स्वीकार्यता को बनाए रखने के लिए शासन-प्रशासन की मिलीभगत से ऐसे आयोजन करता रहता है। 2010 के बरेली में हुए सांप्रदायिक दंगों में भी इसकी संदिग्ध भूमिका के चर्चे रहे थे। इसके और संघ-भाजपा के नेताओं के साथ इसके रिश्तों के बारे में भी लोगों को संशय रहता है। इसीलिए कई बार लोग कहते हैं कि मौलाना तौकीर रजा खान भाजपा की बी टीम है या उन्हीं के इशारों पर चलते हैं। यदि ऐसी संभावना भी है तो क्या इस तरह की घटनाएं कोई सोची-समझी साजिश का नतीजा हैं जिसमें सैकड़ों मुसलमान लोगों को दमन, जेल, आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है? या इस बार मौलाना की सेटिंग फेल हो गई? ये कुछ सवाल हैं जिनके जवाब न्याय पसंद लोगों को ढूंढने होंगे, क्योंकि आए दिन शहर को जलने से बचाने और गरीबों, मेहनतकशों, अल्पसंख्यकों को इस अन्याय से निकालने के लिए यह जरूरी है।
आम जनता को यह समझना होगा कि किसी भी मुद्दे पर धार्मिक गोलबंदी समाज को प्रतिक्रियावाद की ओर ही ले जाएगी। लोकतंत्र और जनवाद की लड़ाई किसी धार्मिक नारे के तहत नहीं लड़ी जा सकती। धार्मिक गोलबंदी जहां एक ओर मुस्लिम समुदाय को कट्टरपंथियों, कठमुल्लाओं के चंगुल में धकेलती है, वहीं दूसरी ओर हिन्दू कट्टरपंथियों को खाद-पानी मुहैय्या कराती है। अल्पसंख्यक गोलबंदी जहां अलगाववाद को जन्म देती है वहीं बहुसंख्यक गोलबंदी फासीवाद की ओर ले जाती है। इसलिए अल्पसंख्यकों सहित सभी समुदायों के मेहनतकशों पर होने वाले इन फासीवादी हमलों से किन्हीं धार्मिक नारों या धार्मिक गोलबंदी से नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि सभी उत्पीड़ित समुदायों और मेहनतकश वर्गों की व्यापक एकता पर जोर दिया जाए।
आज उत्तर प्रदेश योगी सरकार के नेतृत्व में संघ-भाजपा की हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला के रूप में उभर रहा है। यहां आर एस एस और उसके अनुषंगी व सहयोगी संगठनों से जुड़े फासीवादी लंपट गिरोह खुलेआम गुंडई कर रहे हैं। ये न्याय, नैतिकता, परंपराओं, त्यौहारों की नई परंपराएं गढ़ रहे हैं। ऐसी परिभाषाएं जो इनके आतंक को जायज ठहरा सकें। इनके त्यौहारों, कार्यक्रमों, जुलूसों में अब आस्था के बजाए फूहड़पन और नफरत है, मिथकों के आधार पर गढ़ी गई घटनाओं का बदला लेने की भावना है, दूसरे समुदाय को नीचा दिखाने का उल्लास है। यहां कोई नया निर्माण नहीं सिर्फ विध्वंस है। ये फासीवादी दस्ते न सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों बल्कि अपने राजनीतिक, वैचारिक विरोधियों पर भी हमले करते हैं। न्याय की मांग कर रहे मजदूर, किसान, महिलाएं, छात्र-नौजवान इनके हमेशा निशाने पर रहे हैं। वित्तीय पूंजी के बड़े मालिकों से इन्हें बहुत प्यार है, इन्हीं के दान पर ये फल-फूल रहे हैं। इनके राज में महिलाओं और दलितों पर हमले खूब बढ़े हैं। अल्पसंख्यक उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते, इन्हें देखते ही इनका भगवा खून खौलने लगता है, आम लोगों की बुनियादी समस्याओं पर ये चूं तक नहीं करते।
फासीवादी शासकों के राज में इनके विरोधियों और मुसलमान अल्पसंख्यकों पर किसी भी बात पर हमले हो जाते हैं। इन हमलों में पुलिस-प्रशासन और फासीवादी लंपट संगठन एक साथ होते हैं। आज शासन-प्रशासन और फासीवादी संगठनों का विलय सा हो गया है। कई बार शासन-प्रशासन का काम फासीवादी संगठन करते दिखते हैं तो फासीवादी संगठनों का काम पुलिस-प्रशासन करता दिखता है। राज्य की सभी संस्थाओं में फासीवादियों की घुसपैठ ने मामले को और घातक बना दिया है। ऐसे में कोई अचरज की बात नहीं कि पुलिस द्वारा जनता पर किए जा रहे जुल्म पर भी आम जनता के कुछ लोग, जो फासीवादी आंदोलन के प्रभाव में हैं, वे पुलिस की प्रशंसा कर रहे हैं।
आज जरूरत है कि देश को इस फासीवादी उन्माद से बाहर लाया जाए। इसके लिए फासीवादियों के हर जनविरोधी कृत्य का विरोध किया जाए। उनके हर हमले का विरोध किया जाए। समाज में उनके प्रभाव को कम करने का प्रयास किया जाए। उनके चंगुल में फंसी मेहनतकश जनता को बाहर निकाला जाए। अल्पसंख्यक समुदाय में जनवादी चेतना का विकास कर उन्हें सही जमीन पर खड़ा किया जाए जिससे वे कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसकर फासीवादियों का चारा ना बन पाएं। समाज में व्यापक स्तर पर जनवादी एवं वैज्ञानिक चेतना का प्रचार किया जाए। फासीवादी ताकतों का भंडाफोड़ किया जाए। तभी हम सही मायने में सभी उत्पीड़ित समुदायों को इस फासीवादी दानव से बचा पाएंगे।