उत्तराखंड में रोज तीन बच्चे लापता

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देश और देश के अलग-अलग राज्यों में अपराधों को बताने के लिए सरकारी संस्थाएं हर साल एक रिपोर्ट तैयार करती हैं और उस रिपोर्ट को जारी करती हैं ताकि देश में अपराधों की स्थिति का आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण और मूल्यांकन किया जा सके। अपराधों को रोका जा सके। इनमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) विशेष एवं स्थानीय कानून (एलएलएल) के तहत दर्ज मामलों के साथ ही महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों के आंकड़े संकलित किए जाते हैं। यानी इसमें वही आंकड़े होते है जो पुलिस थानों में दर्ज होते हैं। 
    
हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट जारी हुई है। इस बार उत्तराखंड बच्चों के अपहरण/लापता में अन्य राज्यों के मुकाबले पहले स्थान पर है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2023-24 में एक साल में 1209 मासूम बच्चे गायब हुए हैं। यानी हर रोज तीन बच्चे गायब हो रहे हैं। गायब हुए बच्चों में 408 लड़के और 802 लड़कियां गायब हुई हैं जिनकी उम्र 18 साल से कम है।
    
हालांकि, सरकार ने बच्चों के लिए कई एनजीओ चला रखे हैं जो सूचना मिलने पर बच्चों को उनके माता-पिता से मिलवाने का काम करते हैं। ऐसे ही उत्तराखंड में सरकार ने आपरेशन स्माइल चला रखा है जिसके तहत लगातार बच्चों को तलाशा जा रहा है और गायब हुए बच्चों को उनके माता-पिता से मिलाने का काम किया जा रहा है। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि 276 बच्चे ही मिल सके हैं बाकी सारे बच्चे लापता है। वे कहां हैं? कैसे हैं? कुछ नहीं पता। और अभी भी उत्तराखंड में छोटे बच्चों के लापता होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है जो कि बेहद चिंताजनक है। 
    
उत्तराखंड जैसे छोटे से राज्य में इतनी बड़ी संख्या में बच्चे लापता हो रहे हैं। इन लापता बच्चों की मानव तस्करी की जा रही है या उनके शरीर के अंग निकलकर बेचे जा रहे हैं, या उनको देह व्यापार में लगाया जा रहा है। इसका सरकार को, पुलिस को कुछ नहीं पता है। और पता लगाने की कोशिश भी नहीं की जा रही है। या यूं कहा जा सकता है कि ये सारे धंधे बिना पुलिस प्रशासन के संरक्षण के चल ही नहीं सकते हैं। 
    
ये आंकड़े वर्ष 2023-24 के हैं और अब 2025 भी खत्म होने जा रहा है। यह केवल वही आंकड़े हैं जो पुलिस थानों में रजिस्टर में दर्ज होते हैं। और यह सब जानते हैं कि पुलिस सारे मामले दर्ज करती ही नहीं है और बहुत से लोग पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते है। असल में यह स्थिति कितनी भयावह होगी।
    
ये किनके बच्चे हैं? जिनको खोजने में इतनी लापरवाही हो रही है? क्योंकि अमीर लोगों (नेता, मंत्रियों, अफसरों, फैक्टरी मालिक आदि) के कुत्ते या गाड़ियां भी गुम हो जाती हैं तो शासन-प्रशासन दिन-रात एक करके उनको ढूंढ निकालते हैं। लेकिन इन बच्चों को अभी तक नहीं खोजा जा सका है तो इसका साफ मतलब है कि ये बच्चे गरीब मजदूर मेहनतकशों के हैं जिनको खोजने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है। और इन बच्चों के न मिलने पर शासन-प्रशासन की कोई जवाबदेही भी नहीं है।
     
एक ओर राज्य के अंदर सरकार की नीतियों के खिलाफ लोगों के एकजुट हो संघर्ष करने से पहले ही शासन-प्रशासन को पता चल जाता है। लेकिन यहां राज्य से इतने बच्चे गायब हैं जिसके बारे में शासन-प्रशासन को पता ही नहीं है।
    
उत्तराखंड राज्य जब अलग बना तो उत्तराखंड के लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने पर रोजगार के अवसर मिलेंगे, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, महिला अपराधों पर रोक, बच्चों की बेहतर परवरिश, नशे की लत से मुक्ति आदि पर काम किया जाएगा। लेकिन उत्तराखंड की आज की हकीकत हमारे सामने है। रोजगार के मामले में तीन-तीन हजार रुपए में सरकारी संस्थाओं में महिलाओं से काम कराया जा रहा है। रिक्त पदों पर भर्ती नहीं निकाली जा रही है और जब भर्ती निकल रही है तब पेपर लीक हो जाते हैं। महिला हिंसा और बच्चों के लापता होने पर तो खुद सरकार की संस्थाएं ही आईना दिखा रही हैं।
    
उत्तराखंड की सरकार इन मुद्दों पर काम करने के बजाय कभी लव जिहाद, तो कभी लैंड जिहाद, तो कभी तथाकथित गौ रक्षा के फर्जी मुद्दे उठा राज्य में केवल नफरती माहौल बना रही है। ताकि राज्य की जनता को आपस में लड़ाती रहे और पूंजीपति उनकी मेहनत की कमाई लूटकर अपना मुनाफा बढ़ाते रहें।
    
असल में सरकार को जनता के लिए कुछ नहीं करना है वह केवल पूंजीपतियों के लिए काम कर रही है। आम मेहनतकश जनता को अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए, महिलाओं की सुरक्षा के लिए, रोजगार के लिए, शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए एकजुट होकर लड़ना होगा क्योंकि यहां बिना लड़े कुछ नहीं मिलता है। इसलिए लड़ना जरूरी है।
 

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