विविध

किसान आंदोलन और विश्व व्यापार संगठन

फरवरी माह के मध्य से किसान आंदोलन फिर से चर्चा का विषय बना हुआ है। 13 फरवरी से ‘दिल्ली चलो’ के आह्वान के तहत हजारों किसान पंजाब-हरियाणा सीमा पर डटे हुए हैं। हरियाणा पुलिस

जंगली जानवरों के आतंक से निजात दिलाने की मांग के साथ जन सम्मेलन का आयोजन

जंगली जानवरों के आतंक से निजात दिलाने की मांग के साथ 18 फरवरी को ग्राम कानिया (रामनगर) में आयोजित जन सम्मेलन में सैंकड़ों की तादात में ग्रामीणों ने भागीदारी की। सम्मेलन से

आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का बरेली में प्रदर्शन

दिनांक 16 फ़रवरी को जहां एक ओर देश भर में किसान और मजदूर संगठन, दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के दमन के विरोध में भारत बन्द और हड़ताल कर रहे थे वहीं जनपद बरेली में बड़ी संख

म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन में फिलिस्तीन कहां?

म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन, 2024 फरवरी के तीसरे सप्ताह में सम्पन्न हुआ। कहने के लिए तो यह सुरक्षा सम्मेलन था और इसमें बार-बार ‘‘शांति’’ और ‘‘सहयोग’’ की दुहाई दी जा रही थी। ल

सांप्रदायिक सौहार्द बचाने हेतु कौमी एकता मंच का गठन

हल्द्वानी/ 25 फरवरी को क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा हल्द्वानी में सांप्रदायिक सौहार्द को बचाने हेतु भाईचारा बैठक बुलाई गई जिसमें अलग-अलग स्थानों स

पूंजीवादी जनतंत्र और धनतंत्र

आजकल अपने देश में चुनावों में पैसे के खेल को लेकर काफी चर्चा है। इस चर्चा को तब काफी बल मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने छः साल बाद आखिरकार चुनावी बांड की संवैधानिकता पर अपना

भोजनमाताओं का सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

प्रगतिशील भोजनमाता संगठन द्वारा उत्तराखंड में कुमाऊं के हल्द्वानी में 24 फरवरी और गढ़वाल के हरिद्वार में 25 फरवरी को जोरदार विरोध-प्रदर्शन किए गये।
    

16 फरवरी : ग्रामीण भारत बंद एवं औद्योगिक हड़ताल के मौके पर रैली, सभा, ज्ञापन एवं पुतला दहन

मोदी सरकार की मजदूर-किसान विरोधी नीतियों के विरोध में 16 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों द्वारा आहूत ग्रामीण बंद एवं औद्योगिक हड़ताल को व्

‘समान नागरिक संहिता’ : कहीं पे निगाह कहीं पे निशाना

एक जर्मन कहावत है, ‘‘बदलाव और बेहतरी के लिए बदलाव; दो अलग बातें हैं’’। जर्मनी के ही उदाहरण से हम जानते हैं कि अपने दौर में हिटलर ने भी जर्मनी के सामाजिक-राजनैतिक ढांचे मे

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?