पिछले 12 साल से हिंदू फासीवादी सत्ता पर हैं। इस दौरान लगातार ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम दावे और बातें इन्होंने की हैं। इन्होंने मेक इन इंडिया का नारा भी भारत को आत्मनिर्भर बनाने के दावे के साथ ही दिया था। ये तरह-तरह के तौर-तरीकों से आत्मनिर्भर होने या बनने की बातें करते रहे हैं। पढ़े-लिखे युवाओं के लिए भी इनका नारा है- नौकरी लेने वाले मत बनो, नौकरी देने वाले बनो। विचित्र स्थिति है सरकार जिसके हाथ में देश के तमाम संसाधन हैं वह नौकरी सृजित नहीं कर सकती मगर वह युवाओं से अपील करती हैं कि वह रोजगार सृजित करने वाला बने। इसके लिए कुछ सब्सिडी आधारित बैंक लोन युवाओं को मिल जाना था। इसका हश्र बर्बादी के सिवा क्या होना था जैसा कि स्टार्ट अप के नारे ने साबित भी किया।
हिंदू फासीवादियों के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के इस नारे में कौन आत्मनिर्भर नहीं था। क्या ये बड़े एकाधिकारी पूंजीवादी घराने थे जो आत्मनिर्भर नहीं थे जो बैंकों का कई लाख करोड़ रुपए हजम कर चुके थे। जो तरह-तरह से सरकार के सहयोग या मदद पर निर्भर थे। नहीं! मोदी-शाह और इनकी सरकार के हिसाब से ये तो वेल्थ क्रिएटर यानी दौलत पैदा करने वाले लोग थे। यानी जो परजीवी थे और हैं वे हिंदू फासीवादियों के लिए धन-दौलत पैदा करने वाले थे।
इनकी नजरों में जो आत्मनिर्भर नहीं थे जो परजीवी थे, वह देश की जनता थी। इस जनता को पांच किलो राशन देकर मोदी सरकार अहसान का काम कर रही थी। इसलिए ये नागरिक नहीं बल्कि लाभार्थी थे जो मोदी के रहमो करम पर जिंदा थे। इन्हें इसके बदले ‘आत्मनिर्भर मोदी’ को वोट देना था। मोदी सरकार की नजर में फैक्टरियों में मामूली वेतन पर काम करने वाले करोड़ों मजदूर जो अपने श्रम से हवाई जहाज से लेकर सुई तक बना रहे थे, वे आत्मनिर्भर नहीं थे। खेती में लगे किसान इनके लिए आत्मनिर्भर नहीं थे। ये सब हिंदू फासीवादियों की नजर में परजीवियों की जमात थी। युवा बेरोजगारों के बारे में तो मोदी सरकार का कहना ही क्या।
हिंदू फासीवादियों के इस आज के कथित आत्मनिर्भर भारत की क्या स्थिति है? खुद मोदी विदेशी पूंजी की भीख मांगने के लिए विदेशों में कई-कई चक्कर पिछले 12 सालों में लगा चुके हैं। यानी इनके आत्मनिर्भर भारत में विदेशी पूंजी के दम पर आत्मनिर्भरता हासिल होनी है। आलम यह है कि विदेशी पूंजी तमाम छूट हासिल करने के बावजूद उम्मीद से काफी कम आती रही है। यह, जब आ रही है तो इसका बड़ा हिस्सा सट्टा बाजार में चला जा रहा है। पिछले दो सालों से तो विदेशी निवेशक अपनी पूंजी बाजार से निकाल ले जा रहे हैं। हालत यह है कि आत्मनिर्भर रुपया वैश्विक बाजार के दबाव में लगातार गोता लगाते हुए डालर के सापेक्ष 100 के करीब पहुंचकर रिकार्ड कायम कर चुका है।
आत्मनिर्भर भारत के दावे के लिए जो मेक इन इंडिया का नारा उछाला गया था। उसकी क्या स्थिति है? यह विदेशी पूंजी और विदेशी तकनीक पर ही निर्भर है। मोबाइल से लेकर सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्र में उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर होने के जो दावे किए जा रहे हैं वह बिल्कुल फर्जी हैं। हाल में 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री ने इसी तरह हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली ट्रेन के बारे में दावा किया। दावा किया गया कि दुनिया की सबसे लंबी और सबसे ताकतवर हाइड्रोजन ट्रेन भारत के पास है। इसे मेक इन इंडिया की सफलता बताया गया। हकीकत यह थी कि यह एकमात्र ट्रेन जींद सोनीपत मार्ग पर चल रही है। यह 10 कोच वाली ट्रेन है। इसके सभी महत्वपूर्ण घटक विदेशी तकनीक पर निर्भर हैं और आयातित भी हैं। यह भी तथ्य है कि दुनिया इस हाइड्रोजन ईंधन से किनारा कर रही है। साफ है कि मोदी सरकार की इस आत्मनिर्भरता का दावा विदेशी तकनीक आयात और असेंबली पर टिका हुआ है।
कोई कह सकता है कि बिना सहयोग के तो दुनिया नहीं चल सकती। कि ये निर्भरता नहीं सहयोग है। लेकिन हर कोई जानता है कि यह सहयोग का संबंध कतई नहीं है। सहयोग किसी की निर्भरता को बढ़ाता नहीं है इसके उलट आत्मनिर्भर होने की ताकत देता है। आत्मनिर्भरता को बढ़ाने में सहयोगी होता है। जबकि यहां सब कुछ निगलने या अधीनस्थ करने के लिए जुड़ाव है।
विदेशी पूंजी और विदेशी तकनीक लूट-खसोट और शोषण के मकसद से दूसरे देश में घुसते हैं जहां भी उन्हें मुफीद परिस्थितियां हासिल हों। और ईजी आफ डूइंग बिजनेस के नाम पर हिंदू राष्ट्रवादी यही काम कर रहे हैं। निर्भरता को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं। इस निर्भरता से भी जब देशी एकाधिकारी पूंजी गठजोड़ करके मुनाफा बटोर रही हो तब फिर इन्हें वास्तव में देश के आत्मनिर्भर होने की क्या जरूरत।
भाजपा और संघ लंबे समय से स्वदेशी का जाप करते रहे हैं जो आत्मनिर्भर भारत अभियान तक जा पहुंचा है। 2020 से शुरू हुआ यह अभियान कहां पहुंचा है किसी से नहीं छुपा हुआ है। न केवल उत्पादन में बल्कि व्यापार से लेकर विदेश नीति तक हिंदू भाजपा और संघ की आत्मनिर्भरता बेनकाब हो चुकी है। व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है। विदेश नीति में साम्राज्यवाद खासकर अमेरिका के आगे समर्पण ज्यादा साफ हुआ है।
आत्मनिर्भता के संबंध में इनके लिए बात दरअसल उलटी है। आत्मनिर्भर भारत का यह नारा एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों को और साथ ही भाजपा व संघ के शीर्ष लोगों को मालामाल करने के लिए गढ़ा गया था। वैसे यह नारा कोई आज की बात नहीं, यह नारा आजादी के बाद भारत में शासक वर्ग जब तब उछालता रहा है। नेहरू के जमाने में और बाद में भी एक दौर तक यह आत्मनिर्भर भारत का नारा आयात प्रतिस्थापन और संरक्षणवाद के रूप में सामने था। तब भी यह एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों की जरूरत के अनुरूप ही था। बस दुनिया की खास परिस्थितियों में यह संभव हो पा रहा था। इसके चलते एक हद तक तकनीकी विकास संभव हुआ। 1990 के दशक के बाद नई आर्थिक नीति के बाद यह गति उलटी हो गई। हालांकि साम्राज्यवादी देशों पर भारत की निर्भरता जो एक हद तक नेहरू काल में भी थी वह मोदी काल में अपने बढ़े हुए रूप में खुलकर सामने आ गई।
मोदी काल में तो इसने विशेष रफ्तार पकड़ ली। आत्मनिर्भर भारत का सपना अब विकसित भारत में बदलकर इसे 2047 तक हासिल करने का लक्ष्य घोषित कर दिया गया। यह सब कुछ जनता को निचोड़कर और रौंदकर हासिल होना है। यही एक सीमा तक नेहरू काल में भी हुआ था। आत्मनिर्भर भारत में न तब जनता शामिल थी न ही आज। पहले थोड़ा बहुत जो गुंजाइश भी थी मोदी काल में वह भी खत्म हो गई है।
इस आत्मनिर्भर भारत में जनता तो दूर प्रांतीय सरकारों को भी केंद्र पर निर्भर बना दिया गया है। संघी सरकार का नारा है वोकल फार लोकल। मगर काम, इसके खिलाफ किया गया। राज्यपालों के जरिए केन्द्र का पूरा नियंत्रण राज्यों पर करने के काम हुए। जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटकर राज्य का स्टेटस ही गिरा दिया गया। बाकी खेल तो साफ है कि किस तरह प्रांतों की सीमित राजनीतिक आत्मनिर्भरता को खत्म करने के काम किए गए। वैसे यह कोई नया खेल नहीं। नेहरू के जमाने से होता आया है। मगर जो काम हिंदू फासीवादियों ने किया है वह है केन्द्र के कुल राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी कम कर देना। ऐसा विभाज्य पूल को कम करके, राजस्व घाटा और जी एस टी अनुदान समाप्त करके व अन्य तरीकों से किया गया। प्रांतों को केंद्र का मोहताज बना दिया गया।
आत्मनिर्भरता के संदर्भ में मोदी सरकार स्टार्ट अप का हवाला देती है। हालात यह है कि कुल स्टार्ट अप का 55 प्रतिशत-85 प्रतिशत हिस्सा एक जगह पर अटके हुए हैं। शुरुवाती फंडिंग के बाद फंड मिलना बेहद मुश्किल होता है। बंद या निष्क्रिय होने वालों की भी ठीक-ठाक संख्या है। इसके अलावा रोजगार सृजन करने वाले क्षेत्र एम एस एम ई (डैडम्) के मामले में 1.37 लाख एम एस एम ई पिछले पांच साल में बन्द हुए हैं। इससे 10 लाख से ज्यादा लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है। एकाधिकारी पूंजी इसे भांति-भांति के तरीके से निगल रही है या अधीन बना रही है। यही मोदी सरकार की एम एस एम ई और स्टार्ट अप के लिए आत्मनिर्भरता है।
जहां तक आम जनता के अलग-अलग हिस्सों का सवाल है उन्हें तो हिंदू फासीवादियों के इस ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए अपना अब कुछ स्वाहा कर देना था और है। अधिकारों से लेकर सुविधाओं तक सब कुछ कुर्बान कर देना है। जाहिर है यह अधीनता की स्थिति है। गुलामों की स्थिति में धकेले जाने की स्थिति है। यही इनका हिंदू राष्ट्र होगा। जहां जनता गुलामी या पराधीनता में होगी। संभावित तौर पर, यही लक्ष्य 2047 के भारत का मोदी-शाह और संघ का है।
यहीं से समस्या खड़ी हो रही है। जनता मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के खिलाफ हो जा रही है। इस नारे के असली अर्थ को अब वह भांति-भांति के तरीकों से अपनी-अपनी जिंदगी के अनुभवों से समझ रहे है। मजदूर, किसान, आदिवासी, छात्र-नौजवान सभी। इसलिए प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है।
यहां से यह समझने में भी देर नहीं लगेगी कि दरअसल आत्मनिर्भरता और सहयोग दोनों एक ही विकास-प्रक्रिया के दो परस्पर विरोधी पहलू हैं। कि वर्ग समाज में दोनों के लिए आत्मनिर्भरता के अर्थ भी अलग-अलग हैं। उत्पादन के साधनों का मालिक शासक वर्ग, आज के दौर में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की आत्मनिर्भरता का स्रोत उसकी सत्ता और उसकी पूंजी है जो आम जनता को हर तरह से अधीन बनाने में लगी हुई है। यहां सहयोग नहीं बल्कि वर्चस्व ही हो सकता है। जनता की कीमत पर ही यह अपनी हैसियत और पूंजी बढ़ा रही है। श्रम शक्ति के मालिक मजदूर वर्ग के लिए तो यह अत्यधिक स्पष्ट है। मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश जनता की सामूहिक संगठित शक्ति ही इसकी आत्मनिर्भरता का स्रोत है। इसलिए इस अधीनता की स्थिति से मुक्ति का रास्ता मुक्ति के विचारों के इर्द-गिर्द संगठित, अनुशासित और सामूहिक संघर्ष से ही होकर गुजरता है।