बांग्लादेश : बी एन पी की चुनावी जीत

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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बांग्लादेश में बहुप्रतीक्षित चुनाव 12 फरवरी को सम्पन्न हो गये। इस चुनाव में उम्मीद के मुताबिक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बी एन पी) को भारी जीत हासिल हुई है। खबर लिखे जाने तक 299 सीटों के लिए हुए चुनाव में बी एन पी 200 से अधिक सीटें जीत चुकी है। जबकि जमात-ए-इस्लामी गठबंधन 60 सीटों पर जीत चुका था। बी एन पी पार्टी के नेता व खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान के देश का अगला प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद है। 
    
इस चुनाव के साथ ही 2024 के जनआंदोलन के बाद के ‘सुधारों’ पर जनमत संग्रह भी कराया गया। इन सुधारों में बांग्लादेश में दो सदनों वाली संसदीय व्यवस्था, राष्ट्रपति के अधिकारों में वृद्धि, महिलाओं की संसद में भागीदारी में वृद्धि, प्रधानमंत्री के अधिकारों में कटौती आदि प्रावधान शामिल हैं। जनमत संग्रह में इन सुधारों के भी पारित होने की संभावना है। पारित होने के बाद नई सरकार को इन्हें लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर संविधान संशोधन कराने होंगे। 
    
2024 के जन आंदोलन के दौरान अवामी लीग की शेख हसीना को युवाओं-जनता ने सत्ताच्युत कर दिया था। शेख हसीना भागकर भारत में शरण लेने को मजबूर हुई थी। पश्चिमी साम्राज्यवादियों के चहेते मोहम्मद युनुस सलाहकार के तौर पर सत्ता पर काबिज हुए थे। इस दौरान उनके द्वारा चुनाव को टालने के प्रयासों का फिर से जनता की ओर से विरोध हुआ। कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी द्वारा बांग्लादेश में साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिशें हुईं तो अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। इन परिस्थितियों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत की पहले से ही संभावना व्यक्त की जा रही थी। 
    
2024 के जनांदोलन के पीछे शेख हसीना शासन के तानाशाही भरे कदमों के साथ उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की भी भूमिका थी। इन नीतियों के चलते बेकारी, महंगाई, घटते जीवन स्तर की बांग्लादेशी जनता शिकार थी। यह इसके बावजूद हो रहा था कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रही थी, पूंजीपति मालामाल हो रहे थे। जनांदोलन के बाद के समय में भी इन समस्याओं का कोई हल नहीं हुआ है और नई सरकार को इन चुनौतियों से निपटना होगा अन्यथा वह भी जनाक्रोश का शिकार होने को अभिशप्त होगी। बी एन पी के इतिहास को देखते हुए इसकी कोई संभावना नहीं है कि वो युवाओं-मेहनतकशां की समस्याओं को हल करने की ओर बढ़ेगी। इसके उलट वह भी पूंजीपतियों के मुनाफों को ही बढ़ाने का काम करेगी। 
    
2024 के जनांदोलन में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की भूमिका भी स्पष्टतः नजर आयी थी। उनके चहेते युनूस के सत्तासीन होने ने इस भूमिका के आरोपों पर मुहर लगा दी थी। बीते डेढ़ वर्ष में युनूस ने साम्राज्यवादियों के हित में कई काम किये हैं। ठीक चुनाव से पहले अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौता भी इसी का एक प्रयास था कि बांग्लादेश में अमेरिकी हित सुरक्षित रहें। प्रस्तावित सुधारों के जरिये भी साम्राज्यवादी बांग्लादेश पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहते हैं। 
    
वहीं 2024 के जनांदोलन के बाद से भारत-बांग्लादेश के सम्बन्ध खराब होते गये। भारत का समर्थन हमेशा से अवामी लीग व शेख हसीना को रहा है। जबकि बी एन पी-जमात-ए-इस्लामी गठबंधन भारतीय हस्तक्षेप के विरोधी रहे हैं। अब बदली परिस्थितियों में चुनाव से काफी पहले से भारतीय शासक बी एन पी से अपने रिश्ते सुधारने का प्रयास करते रहे हैं। यहां तक कि जमात-ए-इस्लामी से भी वे चोरी छिपे वार्ता को प्रयासरत रहे हैं। बी एन पी की जीत पर मोदी की बधाई दिखलाती है कि भारतीय शासकों ने एक हद तक सम्बन्ध सुधारने के इंतजाम कर लिये हैं। 2025 के मध्य से ही बी एन पी के भारत के प्रति तेवर बदलने शुरू हो गये थे। तब जमात-ए-इस्लामी के घोर भारत विरोधी रुख से बी एन पी खुद को अलग करने लग गयी थी। 
    
बांग्लादेश में चीनी साम्राज्यवादियों का बढ़ता निवेश भारतीय व अमेरिकी शासकों की चिंता को बढ़ाता रहा है। अब नई सरकार को जहां चीनी-अमेरिकी साम्राज्यवाद के हस्तक्षेप से निपटना होगा वहीं भारतीय दादागिरी का भी मुकाबला करना पड़ेगा। 
    
इन चुनावों से कुल मिलाकर बांग्लादेश के युवाओं, मजदूरों-मेहनतकशों की दुर्दशा का कोई हल नहीं होना है। पूंजीवादी व्यवस्था के रहते इन समस्याओं का हल हो भी नहीं सकता। ऐसे में बांग्लादेशी जनता को फिर नये जनउभार की जरूरत होगी जिसके निशाने पर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को लेना होगा। पूंजीवाद का नाश कर ही बांग्लादेशी अवाम बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है।   

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