झूठा कौन?

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
/liar-kaun

अक्सर ही भारत की राजनीति में नकली, बनावटी मुद्दे छाये रहते हैं। ये मुद्दे कभी सत्ता पक्ष से तो कभी विपक्ष की ओर से उछाले जाते हैं। इन मुद्दों को ऐसे पेश किया जाता है मानो देश का भविष्य इन्हीं के ऊपर निर्भर है। हकीकत में ये मुद्दे देश के वास्तविक मुद्दों पर पर्दा डालते हैं। भ्रम पैदा करते हैं। मीडिया-सोशल मीडिया इनके इर्द-गिर्द सनसनी व तर्क के जाल बुनता है और इस तरह पूरा देश हकीकत से कट कर नीम बेहोशी की हालत में चला जाता है। असली खेल पर्दे के पीछे चलता रहता है। एकाधिकारी घराने, पूंजीपति, राजनेता, नौकरशाह, बड़े व्यापारी मालामाल होते जाते हैं। साल दर साल इनकी सम्पत्ति बढ़ती जाती है। चाहे वह अम्बानी हो या अडाणी या मोदी या राहुल या फौज के जनरल या सरकारी बड़े अफसर हों। 
    
मसलन मोदी को घेरने के लिए पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब का राहुल गांधी प्रयोग कर रहे हैं। किताब में क्या लिखा है? किताब छपी है कि नहीं? झूठ कौन बोल रहा है? आदि, आदि सवाल मीडिया-सोशल मीडिया में नाच रहे हैं। संसद में हंगामा है। हंगामे के बीच मोदी मौन हैं। राहुल का हल्ला-गुल्ला व मोदी का मौन दोनों में कुछ नया नहीं है। मणिपुर पर राहुल हल्ला कर रहे थे मोदी मौन थे। नरवणे की किताब पर राहुल हल्ला कर रहे हैं मोदी मौन हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच उछलते-कूदते मुद्दों के बीच देश के असली मुद्दे गायब हैं। कभी-कभी असली मुद्दों पर औपचारिक, रस्मी, बनावटी विरोध विपक्ष करता है परन्तु वह ढंग से अपनी सीमा जानता है। उसे वहां तक कभी नहीं जाना जहां असली मुद्दों का असली हल छुपा है। 
    
मसलन असली मुद्दे क्या हैं? बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती असमानता, एकाधिकारी घरानों के बढ़ते मुनाफे, अमेरिका सहित पश्चिमी साम्राज्यवाद का बढ़ता मकड़जाल, हिन्दू फासीवाद आदि। असली मुद्दे कभी संसद को ठप्प करने या मोदी सरकार की नाक में दम करने का बायस या कारण नहीं बनते हैं। मोदी सरकार आराम से साल दर साल चलती जा रही है। नकली, बनावटी मुद्दे राजनीति व देश का माहौल गरमा कर रखते हैं। क्योंकि पक्ष-विपक्ष अच्छे ढंग से जानता है असली मुद्दों के छा जाने का मतलब उनके स्वयं के अस्तित्व व भविष्य पर सवाल खड़े हो जाना होगा। 
    
‘झूठा कौन’ सवाल का जवाब क्या यह नहीं है कि श्रीमान आप सब जो संसद में बैठे, राजनीति के बादशाह हैं, आप जो पक्ष-विपक्ष में हैं, सब ही झूठे हैं।  

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।