अपनी सम्प्रभुता को अमेरिका को बेचते भारतीय शासक

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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भारत-अमेरिकी व्यापार समझौता

भारत की मोदी सरकर खुद को ‘राष्ट्रवादी’ करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। कल तक दूसरों को देशद्रोह का सर्टिफिकेट बांटने वाली इस सरकार की कलई अब खुल चुकी है। अब साबित हो चुका है कि इनका सारा राष्ट्रवाद पड़ोसी छोटे मुल्कों को धमकाने तक ही सिमटा है और अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आगे ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं। अमेरिकी सरगना ट्रम्प द्वारा कुछ महीनों से छेड़े गये टैरिफ युद्ध का नतीजा यह निकला कि भारतीय शासकों ने घुटने टेक दिये। भारत-अमेरिकी व्यापार समझौता इस बात की घोषणा सरीखा है कि भारत ने न केवल अपनी सम्प्रभुता अमेरिका को गिरवी रख दी बल्कि अपने किसानों के हित भी दांव पर लगा दिये। 
    
धूर्तता की हद तब हो गयी जब भारत के ये फर्जी राष्ट्रवादी शासक अपनी जनता के सामने इस आत्मसमर्पण को महान उपलब्धि की तरह प्रचारित करने में जुट गये। पहले तो उनकी हिम्मत इस समझौते की घोषणा करने की नहीं हुई। जब ट्रम्प ने समझौते की घोषणा कर दी तो ये अपनी सफाई में एक के बाद एक कुतर्क देने लगे। ट्रम्प खुलेआम दम्भ भरता रहा कि उसने भारत को रूसी तेल खरीदने से रोक लिया है कि भारत अपने कुछ कृषि उत्पादों समेत तमाम क्षेत्रों में तटकर घटायेगा। कि भारत अमेरिका से 500 अरब डालर का सामान आयात करेगा। पर भारतीय शासक सफाई देने में जुटे रहे कि उन्होंने अपनी सम्प्रभुता का समर्पण नहीं किया है कि किसानों के हित से कोई सौदा नहीं किया गया है। 
    
असलियत क्या है? असलियत यही है कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा थोपे गये तटकरों से भारत के पूंजीपति परेशान हो चुके हैं। वे किसी भी कीमत पर इन तटकरों को घटाना चाहते थे। अमेरिकी साम्राज्यवादी इस जिद पर अड़े थे कि भारत अपने बाजार अमेरिकी कृषि कम्पनियों के लिए खोले, भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे तभी वे भारतीय मालों के लिए तटकर घटायेंगे। अंततः भारतीय शासक अमेरिकी जिद के आगे झुक गये और अमेरिका ने तटकर घटा कर 18 प्रतिशत कर दिया। बदले में तमाम क्षेत्रों में भारत ने तटकर शून्य कर दिया। इस समझौते से अम्बानी-अडाणी सरीखे भारतीय पूंजीपति खुश हो गये। शेयर बाजार की चढ़ती में उनकी खुशी नजर आयी। 
    
जहां तक प्रश्न भारतीय किसानों का है तो समझौते में ऐसी भाषा का इस्तेमाल हुआ है जिसका दोनों पक्ष अपने-अपने ढंग से अर्थ समझा सकें। समझौते में कहा गया है कि सूखे ग्रेन्स (डी डी जी), पशु आहार के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट तथा अन्य उत्पादों सहित अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की विस्तृत श्रृंखला पर भारत टैरिफ को समाप्त या कम करेगा। पहले जारी घोषणा में इसमें दालें भी शामिल थीं जिन्हें बाद में हटा दिया गया। अब अमेरिकी कृषि उत्पादों से दोनों पक्ष अलग-अलग आशय निकाल सकते हैं। पर इतना स्पष्ट है कि पशु आहार, फल, सोयाबीन तेल, मेवे आदि मामलों में अमेरिकी सस्ते मालों की चुनौती भारतीय किसानों को झेलनी पड़ेगी। और यह भारतीय किसानों की तबाही को तेज करेगा। चोर दरवाजे से सरकार बाकी अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भी तटकर घटा भविष्य में किसानों की तबाही को और तेज कर सकती है। 
    
स्पष्ट है कि इस समझौते के जरिये भारतीय किसानों के हितों को दांव पर लगा भारत सरकार ने अम्बानी-अडाणी-टाटा-बिड़ला सरीखे पूंजीपतियों की खुशियां खरीदी हैं। साथ ही रूस से सस्ता तेल खरीदने की सम्प्रभुता को भी कुर्बान कर दिया है। 
    
इस समझौते के जरिये वैश्विक स्तर पर बढ़ते अंतरसाम्राज्यवादी अंतरविरोध में भारत ने खुद को अमेरिकी साम्राज्यवादियों के पाले में और अधिक ढकेल दिया है। रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों से वह और दूर चला गया है। चीनी साम्राज्यवादियों की बढ़त को रोकने की अमेरिकी मुहिम का भारत मजबूत साझीदार बनता जा रहा है। 
    
‘महान राष्ट्रवादियों’ की कलई खुल चुकी है। ‘देश नहीं बिकने दूंगा’ का दावा करने वाले किसान हितों के साथ-साथ देश की सम्प्रभुता का भी सौदा कर रहे हैं। जरूरी है कि सत्तासीन हिन्दू फासीवादियों के असली चेहरे को पहचाना जाये और मजदूरों-किसानों के हितों को दांव पर लगाने वाले इस सौदे का विरोध किया जाये। ‘महान राष्ट्रवादियों’ से राष्ट्र को बचाया जाये। 

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