पूंजीपतियों को मेवा-जनता को ठेंगा

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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बजट 2026-27 

2026-27 का बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के तीन उद्देश्य घोषित किये। पहला- आर्थिक विकास को तेज व सतत बनाए रखना, दूसरा- आकांक्षाओं को पूरा करना और क्षमता निर्माण व तीसरा- सबका साथ सबका विकास। थोड़ा भी गौर से देखने पर पता चलता है कि बजट का उद्देश्य दरअसल बड़ी एकाधिकारी पूंजी का तेज विकास, उसी की आकांक्षा पूरी करना व उसी का साथ व विकास है। जाहिर है पूंजीपतियों का तेज विकास जनता को और निचोड़ कर और तंगी में धकेल कर ही किया जा सकता है और यही काम मोदी सरकार ने इस बजट में किया है।
    
2025-26 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 3.93 लाख करोड़ रुपए रहा। सरकार के अनुसार भारत की विकास दर 7 प्रतिशत के ऊपर रही और आने वाले वर्ष में भी 7 प्रतिशत से ऊपर रहने की संभावना है। यह बता कर सरकार अपनी पीठ ठोकती है कि भारत दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करता देश है। बीते वर्ष सरकार ने 50.65 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया था पर सरकार ने 49.64 लाख करोड़ रुपए ही करों से जुटाए व खर्च किए। वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने 53.47 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया है।
    
अगर सरकार को हासिल होने वाले करों की स्थिति देखें तो सरकार आयकर व जीएसटी दोनों में ही लक्ष्य से काफी कम कर जुटा पाई। इस वर्ष सरकार करों से 44 लाख करोड़ रुपए जुटाएगी। इसमें 15.2 लाख करोड़ रुपए राज्यों को देने के पश्चात केंद्र सरकार पर 28.66 लाख करोड़ रुपए का राजस्व शेष बचेगा। कर के अलावा अन्य मदों से सरकार 6.66 लाख करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त करेगी। इस तरह उस पर कुल 35.3 लाख करोड़ रुपए राजस्व खर्च के लिए उपलब्ध होंगे। पूंजीगत प्राप्तियों में सरकार कर्ज से 16.63 लाख करोड़ व अन्य साधनों से 1.1 लाख करोड़ रुपए जुटाएगी। यानी कुल 17.8 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत प्राप्तियां होंगी। शेष नगदी .32 लाख करोड़ रुपए सरकार पर हैं। इस तरह कुल बजट (35.3$17.8$.32) 53.47 लाख करोड़ रुपए का होगा।
    
अब अगर सरकार के व्यय पर नजर डालें तो एक प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि सरकार ढेरों मदों में घोषित बजट से काफी कम खर्च कर रही है जबकि कुछ मदों में तय बजट से अधिक खर्च कर रही है। मसलन बीते वर्ष रक्षा क्षेत्र में सरकार ने तय 4.91 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा 5.67 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। वित्त विभाग में तय 62,924 करोड़ रुपए से लगभग दोगुना 1.12 लाख करोड़ रुपए खर्च किए गये। जबकि कृषि, पूर्वोत्तर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आई टी, ग्रामीण विकास, सामाजिक कल्याण, शहरी विकास की मदों में सरकार ने तय से कम राशि खर्च की। केवल सब्सिडी की मद में ही सरकार तय से कुछ अधिक खर्च करने को मजबूर हुई।
    
अब अगर इस वर्ष के खर्चों को देखें तो सरकार की प्राथमिकताएं दिखाती हैं कि उसे रक्षा खर्च, पुलिस पर खर्च (गृह विभाग) पर खर्च की तो चिंता है पर जनता के कल्याण की मदों पर खर्च की खास चिंता नहीं है। 
    
रक्षा पर खर्च यानी सेनाओं पर सरकार बजट का 11.1 प्रतिशत खर्च करेगी। यह राशि 5.94 लाख करोड़ रुपए होगी। इसी तरह पुलिस आदि (गृह विभाग) पर सरकार 2.55 लाख करोड़ (बजट का 11.76 प्रतिशत) रुपए खर्च करेगी। जबकि उर्वरक, खाद व पेट्रोलियम सब्सिडी पर सरकार महज 4.11 लाख करोड़ रुपए (बजट का 7.6 प्रतिशत) खर्च करेगी। प्रमुख जनकल्याण से जुड़ी मदों का आवंटन इस प्रकार है। (देखेंbudget तालिका)
    
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि सब्सिडी के मामले में सरकार गत वर्ष किए गए खर्च से भी कम खर्च करने को प्रेरित है। जबकि शिक्षा-स्वास्थ्य व शहरी-ग्रामीण विकास के मामले में सरकार ने बजट में नाम मात्र की वृद्धि की है। 
    
एक ऐसे समय में जब कृषि की बदहाली, लोगों की कंगाली, युवाओं की बेरोजगारी बढ़ रही हो तब इन मदों में खर्च न बढ़ाकर सरकार पुलिस-सेना पर खर्च बढ़ा रही है। सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है कि जब जनता अपनी बुनियादी मांगों के लिए सड़कों पर उतरे तो उसे लाठी-गोली से शांत किया जाए।        

सरकार मनरेगा को कमजोर करते हुए वी बी जी राम जी योजना पहले ही ला चुकी है इस हेतु बजट में महज 95,692 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। पीएम किसान निधि गत वर्ष की ही भांति 63,500 करोड़ रुपए रखी गई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का बजट नाम मात्र की वृद्धि के साथ 39,390 करोड़ रुपये है। इस वर्ष युवाओं को फैक्टरियों में बंधुआ मजदूरी करने की रोजगार योजना पीएम विकसित भारत रोजगार योजना के नाम से पेश की गई थी। इस हेतु 20,083 करोड़ रु. बजट रखा गया है। यानी महज बीस हजार करोड़ रूपया खर्च कर सरकार करोड़ों युवाओं को रोजगार देने का ख्वाब बेच रही है। 
    
आय कर में कोई रियायत न देकर सरकार ने मध्य वर्ग को इस बजट से नाराज ही किया है। वहीं डाटा सेंटरों में निवेश करने वाली विदेशी पूंजी के लिए सरकार ने 2047 तक पूर्ण कर छूट प्रदान कर विदेशी पूंजीपतियों को लुभाने का काम किया है। प्रवासी भारतीयों को अपनी विदेशी संपत्ति के खुलासे कर एक मुश्त कर देने की सरकार नई योजना लेकर आई है। इसी तरह निर्यात को बढ़ाने वाले, भारतीय पूंजीपतियों को भी कई तरह की कर राहत सरकार ने दी है। 
    
विदेशी पूंजीपतियों को भारत में निवेश पर तरह-तरह से पहले से ही दी गई रियायतों को इस बजट में सरकार ने और भी बढ़ा दिया है। टेक्सटाइल के छोटे उद्यमों के लिए सरकार ने प्रोत्साहन के उपाय घोषित किए है। आधारभूत क्षेत्रों में निवेश पर पूंजीपतियों के घाटे की भरपाई की स्कीम सरकार लेकर आई है। 
    
उक्त उपायों से स्पष्ट है कि सरकार का सारा ध्यान देश में पूंजी निवेश बढ़ाने, पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने पर है। सरकार की नजर मज़दूरों-किसानों-नौजवानों की दुर्दशा पर नहीं है। बल्कि इस दुर्दशा से वह पूंजीपतियों को सस्ते मजदूर मुहैया कराने में जुटी हुई है। नई श्रम संहिताएं लागू कर वह मजदूरों के ढेरों अधिकार पहले ही छीन चुकी है। 
    
मोदी सरकार इस कदर घमंड में चूर है कि वो समझती है कि मजदूरों-मेहनतकशों के सिर पर जितना भी बोझा लाद दे, उनकी थाली की हर रोटी चुरा कर अंबानी-अडाणी को दे दे, पर जनता हिंदू-मुसलमान की राजनीति के चलते उसे ही वोट देगी। जरूरत सरकार के इस घमंड को चूर करने की है।

बजट और रोजगार

बेरोजगारी की समस्या आज भारत में इस कदर विकराल हो चुकी है कि सरकार भी इससे इंकार नहीं कर पाती है। पर बजट में बेरोजगारी दूर करने पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। बल्कि उसके ढेरों प्रावधान तो बेरोजगारी को और बढ़ाने का ही काम करेंगे। 
    
2027 में 5 किलो मुफ्त राशन को जारी रखने की घोषणा नहीं हुई है। इसका बंद होना लोगों की क्रय शक्ति को कमजोर करेगा। परिणामस्वरूप खरीद घटने से कई उत्पादक कारखानों में रोजगार घटेंगे। सरकार रोजगार के नाम पर ढिंढोरा पीटने की नीति पर ही आगे बढ़ रही है। वह मान ले रही है कि पूंजीपतियों को दिये गये प्रोत्साहन, कर छूट से पूंजीपति उत्पादन बढ़ा नये रोजगार पैदा करने लगेंगे। वास्तविकता यह है कि भारतीय पूंजीपतियों के पास पूंजी की कमी नहीं है बल्कि समस्या माल न बिकने या जनता की कमजोर क्रय शक्ति की है। इसीलिए पूंजीपतियों को प्रोत्साहन से नये रोजगार नहीं पैदा होंगे। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का फर्जीबाड़ा सामने आने के बाद अब सरकार करोड़ों नये रोजगार पूंजीपतियों को प्रोत्साहन राशि देकर पैदा करने का दावा कर रही है। 
    
मनरेगा को ध्वस्त कर जी-राम-जी योजना से सरकार पहले ही ग्रामीण रोजगार को राम भरोसे कर चुकी है। नयी योजना में खर्च में केन्द्र-राज्य भागीदारी 60ः40 घोषित कर सरकार पहले ही इस बात का इंतजाम कर चुकी है कि यह योजना फण्ड के अभाव में ही दम तोड़ दे। अब इस पर किया गया आवंटन दिखाता है कि यह नयी योजना 125 दिन रोजगार दे ही नहीं सकती। कुल मिलाकर बजट बेरोजगारों की दुर्दशा और बढ़ाने का ही काम करेगा।   

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