धराली आपदा : पूंजीवादी विकास का भयानक मंजर

/dharaali-apada-capitalism-vikas-ka-bhayanak-manjar

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली, हर्षिल और सूक्खी गांव भयानक आपदा के शिकार बने हैं। 4 अगस्त की दोपहर को पहाड़ से तेज बहाव के साथ मलवा-गाद ने गांव के एक हिस्से को पूरी तरह से तबाह-बरबाद कर दिया। कई रिहायशी घर, दुकान, होटल आदि पानी के बहाव में बह गये या मलबे के नीचे दब गये। हृदय विदारक कई वीडियो -फोटो धराली में विपदा की कहानी आप कह रहे हैं। हर्षिल स्थित सैनिक कैंप बह गया और कई जवान लापता हैं। अभी तक 4 लोगों के मारे जाने और 50 से अधिक लोगों के लापता होने की अधिकारिक घोषणा की गयी है। तबाही के मंजर को देखते हुए ऐसा लगता है कि जान-माल का नुकसान काफी अधिक है। इनमें पर्यटक, स्थानीय आबादी और प्रवासी मजदूर सभी शामिल हैं।
    
धराली के अलावा उत्तराखंड के पहाड़ी जगहों पर कई जगह लैंड स्लाइड, जल कटाव, आदि की छोटी-बड़ी घटनाएं घटीं जिसमें कई लोग मारे गये, घायल हुए। आपदा में मारे गये लोगों की मृत्यु पर हर कोई दुखी है और आपदा में फंसे लोगों के सुरक्षित बच जाने की आशा कर रहा है। 
    
दुख और तबाही के इस समय में एक बार फिर से उत्तराखड की ‘‘विकास परियोजनाओं’’ पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। उत्तराखंड में यह सवाल कोई नये नहीं हैं। केदारनाथ आपदा, जोशीमठ शहर के धंसने, किसी परियोजना में मजदूरों के फंसने-मरने आदि के समय यह सवाल तीक्ष्णता से उठते रहे हैं। लेकिन केन्द्र-राज्य की सरकारें, पूंजीपति अपने मुनाफे के कारण आंखे मूंदे रहते हैं।
    
धराली गांव गंगोत्री के रास्ते में हर्षिल घाटी में स्थित है। चार धाम यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली इस हर्षिल घाटी में पर्यटक भी रुकते हैं। सरकार द्वारा चलायी जा रही चार धाम राजमार्ग परियोजना के कारण यहां भी सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों को काटा गया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अपर्याप्त भौगोलिक अध्ययन या इसे सिरे से दरकिनार करते हुए राजमार्ग बनाया जा रहा है। इस कारण मिट्टी का कटाव और भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
    
चार धाम राजमार्ग के लिए, पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ भी काटे गये हैं। ‘‘विकास परियोजना’’ के नाम पर कई नदियों के बहाव को मोड़ा गया। बड़ी-बड़ी सुरंगें बनाई गयीं। इसके लिए विस्फोटकों तक का इस्तेमाल किया गया। पर्यटन के नाम पर क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण (होटल, रिजार्ट आदि) किया गया। यह सब करते हुए अपर्याप्त भौगोलिक अध्ययन किया गया। जिस कारण पहाड़ों को काफी नुकसान हुआ है। जंगलों के कटान से मिट्टी की पकड़ कमजोर हुई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जंगलों के कटान से स्थानीय जलचक्र प्रभावित हुआ है और बादल फटने की घटनाएं बढ़ी हैं।
    
धराली गांव में आपदा के बाद बचाव कार्य ने भी यहां के ‘‘विकास’’ की पोल खोल दी है। जिन चार धाम राजमार्ग के लिए केन्द्र, राज्य सरकार अपनी वाह-वाही कर रही है असल में धराली जाने वाला यह चार धाम राजमार्ग कई जगह से पूरी तरह से टूट चुका है। रास्ते में एक पुल भी पूरी तरह से बह गया है। यानी आपदा के कई दिन बाद तक भी धराली में बचाव दल, मदद पहुंचना तक मुश्किल हो गया है। अस्थाई सड़क बनाने का काम चल रहा है। ऐसे हालात में कुछ बचाव दल धराली पैदल ही पहुंच पा रहे हैं। सड़क न होना राहत, बचाव कार्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
    
धराली आपदा के लिए अंग्रेजों के जमाने में लकड़ी के ठेकेदार फ्रेडरिक विल्सन को दोषी ठहराया जा रहा है। यह बात सही है कि फ्रेडरिक विल्सन ने यहां 600 एकड़ भूमि पर लगे 2 लाख से अधिक देवदार के वृक्ष कटवाये। पर यह भी बात उतनी ही सच है कि आजादी के बाद सरकारों ने विकास के नाम पर इस तबाही को और जोर-शोर से जारी रखा। इसीलिए सरकारें अपने कुकर्मों का ठीकरा एक अंग्रेज पर फोड़ कर बच नहीं सकतीं। हर बार की तरह इस बार भी आपदा आने पर कुछ दिखावटी घोषणायें उत्तराखण्ड सरकार ने की हैं। मुख्यमंत्री धामी ने सभी संवेदनशील जगहों पर नये निर्माण पर रोक लगा दी है। पर ये घोषणायें चंद दिन ही टिकती रही हैं। वक्त बीतने के साथ ही सरकारों का ‘विकास’ नई आपदा लाने की तैयारी शुरू कर देता है। 
    
धराली आपदा पर सांसद अजय भट्ट का एक बयान आया है जो सरकार का इन आपदाओं पर रुख स्पष्ट करता है। उनका कहना है कि जहां विकास होगा वहां थोड़ा-बहुत तो नुकसान उठाना पड़ेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि बादल फटना तो आम बात है। प्रकृति की मार से बचने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं हैं। उनके इस बयान को अभी हाल में गुजरात में हुए हवाई दुर्घटना के समय गृह मंत्री अमित शाह के बयान की रोशनी में भी देखा जा सकता है। इसी तरह महाकुम्भ मेले के समय मारे गये लोगों पर उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री का बयान था कि इतने बड़े आयोजन में छोटी-मोटी दुर्घटनाएं तो होती रहती हैं। ये बयान दिखाते हैं कि सरकारों को वास्तव में इन मौतों और नुकसान का कोई अफसोस नहीं है और न ही वे आगे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कुछ करेंगे क्योंकि इनके अनुसार ये प्राकृतिक हैं और प्रकृति के सामने ये बेबस हैं!
    
आज हिमाचल हो या उत्तराखंड वहां पर्यटन के नाम पर सरकारों ने जो विकास किया है वह वास्तव में पूंजी के मुनाफे के लिए किया गया पूंजीवादी विकास है। और इस पूंजीवादी विकास की कीमत स्थानीय आबादी के साथ पर्यटकों को भी चुकानी पड़ रही है।
 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?