एक बार फिर सभ्यता और बर्बरता

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करीब 100 साल पहले जब विश्व राजनीति के पटल पर हिटलर-मुसलोनी का उदय हुआ तो उसकी भांति-भांति के तरीके से व्याख्या हुई। बल्कि प्रथम विश्व युद्ध से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक पूंजीवादी दुनिया में जो कुछ हुआ उसने लोगों के पुराने विश्वासों को हिला कर रख दिया। एक ओर हिटलर और मुसोलिनी को नायक के तौर पर मानने वाले तथा पेश करने वाले लोग सामने आए तो दूसरे लोगों ने इसे सारी मानवता पर अंधेरे के युग के अवतरण के तौर पर देखा। ‘पश्चिमी सभ्यता का पतन’ जैसी बातें आम हो गईं। 
    
आज सदी भर बाद चीजें ज्यादा स्पष्ट हैं। आज पश्च दृष्टि की सुविधा से हम देख सकते हैं कि वास्तव में तब क्या हो रहा था। तब असल में उसके पहले के तीन-चार सौ सालों में जो पूंजीवादी व्यवस्था  क्रमशः अस्तित्व में आई थी उसका पुनर्गठन हो रहा था। पूंजीवादी देशों के भीतर वह व्यवस्था मुक्त प्रतियोगिता वाली व्यवस्था थी जिसमें सीमित स्तर का जनतंत्र था। पूंजीवादी देशों के बाहर वह व्यवस्था उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद की व्यवस्था थी जिसमें मुट्ठी भर पश्चिमी देशों ने बाकी दुनिया पर कब्जा कर रखा था और उसके पुनर्बंटवारे के लिए आपस में संघर्षरत थे। 
    
इस व्यवस्था को चुनौती मजदूर आंदोलन दे रहा था जो एक मजबूत ताकत के तौर पर 20वीं सदी की शुरुआत तक उभर चुका था। इसका सबसे मूर्त रूप रूसी क्रांति और सोवियत समाजवाद था। मजदूर आंदोलन के दबाव में पूंजीवादी दुनिया के अंतर्विरोध और तीखे हो रहे थे जो अंततः प्रथम विश्व युद्ध, महामंदी और द्वितीय विश्व युद्ध तक ले गए। बीच में फासीवाद-नाजीवाद का उत्थान और पतन इसके सबसे घिनौने और खतरनाक हिस्से के तौर पर सामने आए। 
    
अंत में 30 सालों की भयंकर उठा-पटक के बाद एक नई दुनिया अस्तित्व में आई जो 1914 से काफी भिन्न थी। दुनिया का करीब एक तिहाई हिस्सा समाजवादी रास्ते पर चल पड़ा था। पश्चिमी पूंजीवादी दुनिया ‘मुक्त प्रतियोगिता’ की माला जपना छोड़ सरकारी नियंत्रण और ‘कल्याणकारी राज्य’ के रास्ते पर चल पड़ी थी। इसी के साथ उपनिवेश भी अब आजादी के रास्ते पर चल पड़े थे। ‘अंधेरे के युग’ से दुनिया उजाले के युग में प्रवेश कर गयी थी। दुनिया भर में सब जगह- बाहर-भीतर दोनों- जनवाद का विस्तार हो रहा था तथा कुछ जगह तो दुनिया उससे भी आगे जा रही थी। हर कोई ज्यादा खुली-ताजी हवा में सांस लेने लगा था। लेकिन इससे पहले के तीस सालों में लोग यदि इस कदर घुटन महसूस कर रहे थे तो वह केवल भ्रम मात्र नहीं था। लोग यदि सारी मानवता पर ‘अंधेरे के युग’ के तारी हो जाने की बात कर रहे थे तो वह बस कल्पना मात्र नहीं था। लोग जब सभ्यता के संकट और पतन की बात कर रहे थे तो वह उनके अपने अवसादपूर्ण मन की भावना नहीं थी। महामंदी के ठीक चरम पर जब हिटलर जर्मनी में सत्तारूढ़ हुआ तथा एक नये विश्वयुद्ध का खतरा प्रत्यक्ष हो गया तो पूंजीवादी दुनिया में बहुत कम लोग थे जो कहीं कोई उम्मीद की किरण देख पा रहे थे। केवल क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन और उसके सबसे ज्वलंत रूप सोवियत समाजवाद के मुरीदों में उम्मीद की किरण बाकी थी। 
    
करीब सदी भर पहले की इन बातों को आज याद करने का खास मकसद है। आज एक बार फिर पूंजीवादी विश्व में ‘अंधेरे के युग’ की वापसी की बातें होने लगी हैं। एक बार फिर मानवता का भविष्य खतरे में दिख रहा है। एक बार फिर पूंजीवादी दुनिया में उम्मीद की किरण खोती नजर आ रही है। यह सब आधार हीन नहीं है। आखिर नरेन्द्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप, जेलेन्स्की, पुतिन और नेतन्याहू के इस जमाने में भला और क्या हो सकता है? और ये अपवाद नहीं हैं। ये दुनिया भर के प्रतीक पुरुष हैं। ये उस सबका भी प्रतीक हैं जो गाजा में हो रहा है।     
    
घोर निराशा की भावना यहां से जन्म लेती है कि ये सारे ‘जन भावना’ की अभिव्यक्तियां हैं। भारत में सारे भाजपा-संघ समर्थक गाजा नरसंहार पर जश्न मना रहे हैं। आबादी में इनकी संख्या कम नहीं है। कम से कम इतनी तो है ही कि इनके दम पर भाजपा सत्ता में है। सं.रा.अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के लंपट चरित्र से अच्छी तरह वाकिफ अमरीकी उसे दुबारा राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाने के लिए वोट दे रहे हैं। भले ही वे कुल आबादी का चौथाई ही हों पर उनके वोट के दम पर वह लंपट अमरीकियों ही नहीं बाकी दुनिया के लोगों की किस्मत का भी फैसला करेगा।
    
मोदी, ट्रंप या नेतन्याहू जैसे लोग संयोगवश या घटनाओं के खास प्रवाह की वजह से आज वहां नहीं हैं जहां वे हैं। एक तरह से वे जहां हैं वहां उन्हें होना ही चाहिए। उनके समर्थक उनके बारे में किसी मुगालते में नहीं हैं। उनके समर्थक जानते हैं कि वे कितने लंपट, दुश्चरित्र और अनैतिक लोग हैं। पर फिर भी वे उनके पीछे लामबंद हैं। वे उनके नायक हैं। समर्थकों में जो भी घटिया, घृणित और मानवता विरोधी है वे उसके मूर्तिमान रूप हैं। इसीलिए वे नायक हैं। ऐसे किसी व्यक्ति को लोग अपने निजी जीवन में अपने नजदीक नहीं देखना चाहेंगे - न तो पड़ोसी के तौर पर, न सहकर्मी के तौर पर और न दोस्त-मित्र या रिश्तेदार के तौर पर। पर राजनीतिक नायक के तौर पर वे ऐसे लोगों पर लहालोट हैं। एक तरह से मोदी-ट्रंप-नेतन्याहू जैसे लोग हमारे समय के नायक हैं। 
    
कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार मिलती है जिसके वे लायक होते हैं। इसी का दूसरा रूप यह है कि लोगों के वैसे ही नायक होते हैं जैसा कि लोग खुद होते हैं। लोग भीतर से जैसे होते हैं, उनका नायक बाहर से वैसा ही होता है। इंसान ने अपने ईश्वर की अपने ही रूप में कल्पना की। इसी तरह नायक भी लोगों के अंतर्मन के मूर्त रूप होते हैं। यदि मोदी, ट्रंप या नेतन्याहू नायक हैं तो इसलिए कि उनके समर्थक भी भीतर से वैसे ही हैं। मोदी, ट्रंप और नेतन्याहू का मानव द्वेष, खून-पिपासा और सत्ता के लिए कुछ भी कर गुजरने की प्रवृत्ति लोगों की इसी तरह की भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र है। 
    
इसीलिए कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि इंसान एक बार फिर बर्बर कबीलाई अवस्था में लौटने लगा है। उसकी आदिम प्रवृत्तियां जाग गयी हैं। यह उस जमाने की बात है जब कबीलाई मानव अपने कबीले के अलावा दूसरे इंसानों को इंसान मानता ही नहीं था। आमना-सामना होने पर वह उन्हें मार डालता था। कई बार तो मार कर खा भी जाता था। आज का धार्मिक वैमनस्य, राष्ट्रीय टकराव, अप्रवासियों के प्रति नफरत तथा आम तौर पर ही भिन्न दिखने वालों के प्रति परायेपन का भाव उन्हीं आदिम प्रवृत्तियों के फिर जाग जाने का परिणाम है। मानवता सभ्यता की सारी उपलब्धियों को त्याग कर अपने मूल वहशी रूप की ओर लौट रही है। सारी सभ्यता बस एक ऐसा आवरण साबित हो रही है जिसे आसानी से नोचा जा सकता है और उसके नोचे जाते ही भीतर छिपा बनैला पशु सामने आ जाता है। इंसान अपने मूल में एक बनैला पशु ही है और एक बार फिर वह पशु अपने नंगे रूप में सामने है। 
    
आज ये जो बातें कही जा रही हैं वे कोई नई नहीं हैं। सदी भर पहले भी ये बातें कही जा चुकी हैं। दर्शन से लेकर साहित्य-कला तक बीसवीं सदी का प्रथमार्द्ध इस तरह की बातों से भरा पड़ा है। बल्कि जितने विस्तार से तब इन सबका चित्रण हुआ आज तो उसकी छाया भर ही देखने को मिल रही है। 
    
यह सही है कि आज मानवता बहुत सारे मामलों में आदिम प्रवृत्तियों की और लौटती दीख रही है। बहुत सारे मामलों में मानव सभ्यता की सारी प्रगति को लात मारकर पीछे बनैले पशु के युग में लौटा जा रहा है। लेकिन यह सब किसी ऐसी निवैयक्तिक सामाजिक गति के कारण नहीं हो रहा है जिस पर किसी का बस न हो। यह किसी प्राकृतिक शक्ति के कारण नहीं हो रहा है और न ही दैवीय शक्ति के कारण। इस सबके विपरीत यह समाज में सक्रिय कुछ सामाजिक शक्तियों की सचेत कोशिशों का परिणाम है। समाज में कुछ खास शक्तियां हैं जो कुछ खास वजहों से मानवता को आदिम प्रवृत्तियों के युग में घसीट रही हैं या कम से कम उनके कुकर्मों की वजह से मानवता उधर खिसक रही है। 
    
इन सामाजिक शक्तियों में सर्वप्रमुख हैं एकाधिकारी पूंजी और उसके कर्ता-धर्ता यानी एकाधिकारी पूंजीपति और उनके राजनीतिक प्रतिनिधि। ये वे लोग हैं जो सचेत तौर पर मानवता को गर्त में धकेल रहे हैं। हो सकता है कि वे मानवता को बनैले पशुओं के युग में न ले जाना चाहते हों क्योंकि वह उनके व्यक्तिगत अस्तित्व के लिए भी खतरनाक है पर वे जो कुछ कर रहे हैं, उसका यही परिणाम निकल रहा है। 
    
एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जायेगी। आज पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों में अप्रवासियों के प्रति, खासकर मुसलमान अप्रवासियों के प्रति नफरत की भावना लगातार बढ़ती जा रही है। इन देशों में यह एक तरह से राजनीतिक गोलबंदी की धुरी बन रही है। बहुत सारी धुर दक्षिणपंथी पार्टियों और नेताओं की राजनीति इसी के इर्द-गिर्द घूम रही है। वे अपनी सत्ता के लिए इसे हर तरह से हवा दे रहे हैं। आदिम प्रवृत्तियों की ओर लौटने की बहुत सारी अभिव्यक्तियां दर-असल इसी राजनीति का परिणाम हैं।
    
लेकिन अप्रवासियों की इस समस्या का मूल क्या है? इस समस्या का मूल है वह वैश्वीकरण जिस पर दुनिया के सारे पूंजीपतियों की सहमति और एकता है। इसी के साथ है तमाम मुसलमान बहुल देशों (अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, यमन, लीबिया, इत्यादि) में साम्राज्यवादियों द्वारा ढाई गयी तबाही। इन दोनों ही मामलों में साम्राज्यवादी देशों के एकाधिकारी पूंजीपति मुख्य कर्ता-धर्ता हैं। इनमें वे भी हैं जो मानवता के इस तरह पीछे जाने पर रो रहे हैं। 
    
पूंजी का विपरीत ध्रुव है श्रम। इसका सीधा सा मतलब है कि यदि पूंजी का वैश्वीकरण हो रहा है तो श्रम का भी वैश्वीकरण होना चाहिए। यानी यदि पूंजी मुक्त ढंग से इस देश से उस देश में जा रही है तो श्रमिकों को भी एक देश से दूसरे देश में जाने की छूट होनी चाहिए। पर एकाधिकारी पूंजीपति ऐसा नहीं चाहते। एक तो इसलिए कि ऐसा होने पर उनका वैश्वीकरण का एक प्रमुख मकसद गायब हो जायेगा। तब गरीब देशों में सस्ते श्रम का दोहन नहीं हो पायेगा क्योंकि वे श्रमिक वहां चले जायेंगे जहां मजदूरी ज्यादा हो जायेगी। दूसरे ये पूंजीपति अपने देशों में भारी पैमाने पर अप्रवासियों के आने के राजनीतिक परिणाम से भयभीत होते हैं। 
    
इसी तरह मुसलमान देशों को अपने साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत तबाह करने में साम्राज्यवादियों को जरा भी हिचक नहीं होती। इस पर ट्रंप और बाइडेन दोनों में एकता होती है। पर जब उस तबाही की शिकार जनता का एक छोटा सा हिस्सा शरण लेने के लिए साम्राज्यवादी देशों में पहुंचता है तो वह इन साम्राज्यवादियों के लिए बहुत नागवार गुजरता है। ‘मानव कल्याण’ और ‘जनतंत्र’ के नाम पर अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, इत्यादि को बमों से पाट देने वाले साम्राज्यवादी इन देशों की अत्यन्त छोटी आबादी को भी अपने यहां शरण देने को तैयार नहीं होता। 
    
साम्राज्यवादी देशों में अप्रवासियों की सारी समस्या वैश्वीकरण और साम्राज्यवादी लूट-पाट का सीधा परिणाम है। पर इसे स्वीकार करना साम्राज्यवादियों के लिए अत्यन्त घातक है। इसीलिए उनका एक हिस्सा इस पर झूठ-फरेब की चादर ओढ़ाता है तो दूसरा हिस्सा इसे लेकर हद दर्जे की घटिया राजनीति करता है और पहले वाले को मजबूर करता है कि वह उसके सामने क्रमशः समर्पण करता जाये। 
    
यह एक उदाहरण यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि आज मानवता पर ‘अंधेरे के युग’ का अवतरण कोई निर्वैयक्तिक या प्राकृतिक परिघटना नहीं है। यह आम तौर पर पतित पूंजीवाद और खास तौर पर एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के कुकर्मों का परिणाम है। इस सबमें अपनी भूमिका को छिपाने के लिए ही वे अपने बुद्धिजीवियों के माध्यम से भांति-भांति के स्पष्टीकरण पेश करवा रहे हैं। 
    
मसला दर-मसला सौ साल पहले जैसा ही सीधा-सादा है। मानवता को नये युग में ले जाने की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है। ऐसा न होने पर इसे आदिम युग में ले जाने के लिए प्रयासरत नरपशुओं की चांदी होती रहेगी। 
 

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