एक मजदूर की व्यथा

    मेरा नाम श्याम सिंह है। मैं राजीव नगर फरीदाबाद में रहता हूं और परमालपुर कैमूर बिहार का स्थाई निवासी हूं। Talbrose आटोमोटिव components Ltd फरीदाबाद 14/1 में काम करने के दौरान प्रेस मशीन का सेंसर नहीं काम करने की वजह से मेरे राइट हैंड की चार उंगलिया कट गईं। यहां पर हेल्पर होने के बावजूद भी मेरे से आपरेटर और हेल्पर दोनों का काम कराया जा रहा था। न करने पर सुपरवाइजर बोलता था कि भगा दूंगा। ऐसी धमकी मेरे को रोज मिला करती थीं, उसके बावजूद भी मैं काम करता रहा। यहां पर 12 घंटे मशीन चलाने के बाद भी प्रोडक्शन नहीं पूरा होता है और सुपरवाइजर प्रोडक्शन बढ़ाता जाता है। इस कंपनी में लोगों का शोषण होता है लोगों से बदतमीजी से बात की जाती है। लोगों की कोई रिस्पेक्ट नहीं है। इस कंपनी में महिला मजदूरों को मात्र 9,000रु.सैलरी दी जाती है जबकि महिला-पुरुष दोनों बराबर काम करते हैं। इस कंपनी में मारुति सुजुकी, टाटा, हीरो होंडा जैसी कंपनियों के लिए गैस किट बनती है। 
    -श्याम सिंह, फरीदाबाद (मजदूर का नाम बदला हुआ है)

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।