‘‘मेरे साथ के लोग मुझे पहचानते हैं’’

    यह कविता मैंने लगभग चार वर्ष पूर्व लिखी थी। अक्सर हम जैसे लोग जो समाज में बुनियादी तब्दीली करना चाहते हैं, वे अपने नेताओं को, शिक्षकों को, सिद्धान्तकारों को या रणनीतिकारों, मार्गदर्शकों को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं की तरह एक नये समाज के निर्माण में योगदान करना चाहते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि जो लोग (संगठन के साथी) उपरोक्त सभी आदर्शों को हम तक पहुंचाते हैं उनकी मेहनत को हम कहीं न कहीं दरकिनार कर देते हैं। 
    

उन तमाम कामरेडों को समर्पित मेरे द्वारा रचित एक कविता जो जी जान से नये समाज निर्माण में अपनी भूमिका तय किये हुए हैं-

मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मुझे पहचानते हैं
मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मेरे अस्तित्व को पहचानते हैं
मेरे साथ के लोग मुझे टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं बल्कि पूरा का पूरा जानते हैं
मेरे साथ के लोग मेरी देखभाल करते हैं, मेरा ख्याल रखते हैं, मेरी परवरिश करते हैं 
एक छोटे पौधे की भांति
मेरे साथ के लोग मेरा ख्याल केवल इसलिए नहीं रखते हैं कि वो पौधा घर के आस-पास की क्यारियों में या घरों के ऊपर रखे हुए रंग-बिरंगे गमले की शोभा बढ़ाये
मेरे साथ के लोग मेरा ख्याल केवल और केवल इसलिए रखते हैं कि जब वो बड़ा हो 
एक विशाल वृक्ष की तरह, जो हर किसी को उसके हिस्से की छांव दे सके।
मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मेरे अस्तित्व को पहचानते हैं 
    -पंकज कुमार, किच्छा
 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।