स्पीड पोस्ट

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भीमकाय मशीनों का शोरगुल, धूल और घुटन भरी हवा। सुरक्षा के नाम पर अस्पताल में प्रयोग होने वाला नोज मास्क। शाम तक नाक के भीतर काली लोहा मिश्रित गर्द जम चुकी है। खांसने पर काला बलगम देखते हुए एक बारगी मोहन के जहन में तीव्रता से प्रश्न कौंधा, कि ये कहां आ गया हूं मैं? एक तरफ पहाड़ों का प्राकृतिक सौंदर्य, स्वच्छ हवा-पानी और दूसरी तरफ फैक्टरी का नारकीय जीवन। मगर मोहन जानता है कि महज स्वच्छ हवा-पानी के दम पर भावी जीवन संभव नहीं है। पहाड़ों से नगरों की तरफ पलायन करने वाले लाखों नौजवानों में से एक मोहन भी है।
    
कल बाजार में एक शराबी मरा पड़ा था। रामू ने आते ही कहा ‘‘हर महीने कोई न कोई मरता है, रोज कच्ची शराब पियेंगे तो मरेंगे ही’’। सोनू की बातों में संवेदना है। कोई कह थोड़े ही रहा है पियो! कुछ हिकारत से रामू ने कहा। क्या कहीं काम करता था? प्रश्न। अनभिज्ञता में सोनू ने कंधे उचका दिए। बेटा तू शराब की संगत में मत पड़ना! समझाते हुए सोनू ने मोहन को संबोधित किया। मोहन जो अभी किसी भी तरह के नशे से दूर है, ने मुंह बिचकाया मानो कह रहा हो मैं इन सब में नहीं पड़ता।
    
दिन बीतते गए और पांच साल से मोहन इस वातावरण का हिस्सा बन गया। दिन भर की कड़ी मेहनत के साथ बीच-बीच में खाई जाने वाली तंबाकू दिमाग को थोड़ी राहत पहुंचाती। चार साल पहले वो पहला मौका था जब मोहन की तगड़ी डांट पड़ी थी और तीन दिन का गेट बंद हुआ था। कड़ी मेहनत और ईमानदारी का यहां कोई मूल्य नहीं है। अनजाने में हुई गलती के दंड स्वरूप मोहन को दंडित किया गया था। और वो पहला मौका था जब इस अपमान और तिरस्कार को कच्ची शराब के घूंट के साथ गले के नीचे उतारा गया था। और धीरे-धीरे कच्ची शराब की थैली रोज ही कमरे में जाने लगी।
    
कमरे की तन्हाई को अब शराब दूर करती। अकेलापन अब दोस्त बन चुका है। शराब की मदहोशी अकेलेपन पर हावी हो जाती है और कमरा महज सोने और मोबाइल चलाने की जगह भर रह गया है। जीवन अब महज खाना, सोना, शराब और फैक्टरी की मशक्कत बन कर रह गया है। इन पांच सालों में मोहन बिल्कुल बदल चुका है। नशे की लत अब किसी पहर का इंतजार नहीं करती।
    
अरे आज भी दीपक नहीं आया? रामू ने प्रश्न का उत्तर पाए बगैर अपनी बात को आगे बढ़ाया ‘‘फिर तो मोहन भी नहीं आया होगा! हां कल से दोनों साथ में ही हैं। दीपक रात में मोहन के कमरे पर ही था। आज सुबह दोनों बाजार में साथ ही दिखे थे। सोनू ने जवाब दिया। ‘‘दीपक के साथ रहेगा तो ऐसा ही होगा। संगत का असर तो पड़ता ही है’’। रामू ने बात जारी रखी। इसमें दीपक की क्या गलती है? सोनू ने प्रतिवाद किया। शराब पीने के अपने सामाजिक कारण होते हैं वरना दीपक भी ऐसा नहीं होता। सोनू ने बात जारी रखी। ‘‘जब से दीपक के साथ जाने लगा तब से ही...’’ टीम लीडर को आता हुआ देखकर बहस बीच ही में रुक गई। दोनों मजदूर काम पर लग गए।
    
गांव से कब आया? सोनू ने प्रश्न किया। ‘‘कल आ गया था।’’ मोहन ने जवाब दिया। वहां इतने दिन दारू कहां से पी? प्रश्न। गांव में तो मैं सुरती भी नहीं खाता। वहां किसी को नहीं पता। कुछ बड़प्पन के साथ मोहन ने कहा। ‘‘क्यूं अपने परिवार को धोखा दे रहा है? मोहन निरुत्तर है।“ कल से तेरी नाइट शिफ्ट है, एक अद्धी पीकर आयेगा और एक लेकर आएगा तू? मोहन खिसियानी सी हंसी हंस दिया।
    
उबलते हुए दूध को सूखने से बचाने के लिए आंच को बंद करना लाज़मी शर्त है, या फिर बर्तन को आंच से हटा लिया जाय। फैक्टरी में काम के दौरान और निजी जीवन में ऐसा कोई शख्स इस शहर में मौजूद नहीं जो मोहन को किसी जवाबदेही या उत्तरदायित्व में बांध सके। मोहन को काम छोड़े हुए कई महीने बीत चुके हैं। 65 किलो का हृष्ट-पुष्ट नौजवान महज 50 किलो का रह गया है। जिसे अक्सर ही नशे में धुत्त पाया जाता या किसी सड़क किनारे पड़ा हुआ देखा जाता। इसी बीच दीपक शराब की वजह से दुनिया को विदा बोल चुका है।
    
मोहन बुरा लड़का नहीं है और सोनू जानता है कि यूं नियति को कोसने से बेहतर है कि कुछ सार्थक कदम उठाए जाएं। जीवन बचाने की थोड़ी सी उम्मीद अभी बाकी है। सोनू के मस्तिष्क में विचार तेजी से घूम रहे हैं। ‘‘मुझे मोहन के घर का एड्रेस निकाल कर दे दो’’। आफिस में काम करने वाले क्लर्क से सोनू ने कहा। ‘‘शाम तक मैसेज कर दूंगा’’ जवाब। कम शब्दों में जितनी गंभीरता के साथ मोहन के घर पर बात कही जा सकती थी उसे एक पत्र लिखकर स्पीड पोस्ट कर वह अपने गंतव्य की तरफ चल दिया।
    
आप कहां से हो? मैं मोहन का बड़ा भाई बोल रहा हूं। सोनू के फोन पर आवाज आई। सोनू फोन आने की वजह जानता है। मोहन कैसा है और अब कहां है? सोनू ने प्रश्न किया। गांव ले आए हैं अब कुछ महीने यहीं रहेगा। भाई ने जवाब दिया। चलो शुक्र है जीवन तो बच जाएगा। कुछ प्रसन्नता और निश्चितता के साथ सोनू ने बात जारी रखी। आपका शुक्रिया! वरना हमें तो पता ही नहीं चलता कि क्या हो रहा है। हम तो इसे सीधा ही समझते थे। भाई ने कहा। ‘‘वो सीधा ही है। बस समाज में पैदा होने वाली तकलीफों में अकेला पड़ गया। अकेलेपन से निजात ही उसका इलाज है। मोहन के भाई के मन के भीतर ये बात कितनी आत्मसात हुई ये केवल उसके मन को पता था लेकिन उसकी बातों में कृतज्ञता का भाव जरूर था जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
    
घटना को घटे हुए 6 महीने बीत चुके हैं और एक दिन सोनू के गूगल पे पर 50 रुपए प्राप्त होने का मैसेज आया और व्हाट्स ऐप पर धन्यवाद के साथ आई एक फोटो जिस पर लिखा था  ‘‘तुम्हारे स्पीड पोस्ट के पैसे। धन्यवाद!’’। -पथिक
 

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