मजदूर संघर्ष यूं तो न दबेंगे

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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इस साल की शुरूवात से ही देश के अलग-अलग हिस्सों में वेतन वृद्धि, आठ घंटे काम, बोनस, दुगुने ओवरटाइम की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुए थे। गुजरात से लेकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तक ये आंदोलन फैलते गये। अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद बढ़ती गैस की कीमतों ने मजदूरों के सामने लड़ने के सिवा कोई विकल्प नहीं छोड़ा। अप्रैल और मई माह में इन आंदोलनों ने तेजी पकड़ी और राज्य सरकारों को मजबूर किया कि वे मजदूरों के वेतन में वृद्धि करें। इन आंदोलनों की धमक इतनी जबर्दस्त थी कि दक्षिण के कई राज्यों ने भी अपने न्यूनतम वेतन बढ़ा दिये।
    
राज्य सरकारों ने एक तरफ जहां मजबूरी में मजदूरों के वेतन में वृद्धि की वहीं दूसरी ओर उसने मजदूर आंदोलन में शामिल मजदूरों और मजदूर नेताओं का दमन किया, खासकर उत्तर प्रदेश व हरियाणा में। उन्हें झूठे मुकदमे लगाकर जेलों में बंद कर दिया। इसी कड़ी में हरिद्वार सिडकुल में मजदूर संघर्षों का नेतृत्व कर रहे इंकलाबी मजदूर केंद्र के दो नेताओं (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पंकज और केंद्रीय परिषद सदस्य जय प्रकाश) पर गुंडा एक्ट लगा दिया गया। इसके अलावा एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता ललित कुमार पर भी गुंडा एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया।
    
पंकज और जय प्रकाश कई सालों से हरिद्वार में मजदूर आंदोलनों में शामिल रहे हैं। दोनों ही मजदूर कार्यकर्ता न केवल मजदूर आंदोलनों बल्कि समाज के अन्य सामाजिक आंदोलनों के दौरान भी सक्रिय रहे हैं। 
    
अब ऐसे में ये दोनों ही मजदूर कार्यकर्ता लम्बे समय से हरिद्वार सिडकुल के पूंजीपतियों और शासन-प्रशासन की आंखों में चुभते रहे हैं। दोनों के खिलाफ पुलिस प्रशासन पहले भी कई मुकदमे दर्ज कर चुका है। इसको आधार बनाकर ही अंग्रेजों के काल का गुण्डा एक्ट लगाया गया है। 
    
गुंडा एक्ट के खिलाफ ‘इंकलाबी मजदूर केंद्र’ और हरिद्वार की विभिन्न ट्रेड यूनियनों ने प्रदर्शन किये। एडीएम हरिद्वार के पास इसकी तारीखें लग रही थीं। दिनांक 23 अक्टूबर को हरिद्वार पुलिस प्रशासन ने सादी वर्दी में पुलिस भेजकर अचानक जय प्रकाश के कमरे पर पहुंचकर उनको उठाया और बिना कोई स्पष्ट जानकारी दिये थाने ले गये। इस बीच उनका फोन भी पुलिस ने अपने पास रख लिया ताकि वे किसी को जानकारी न दे सकें। और फिर उनसे जिला बदर के आदेश पर हस्ताक्षर करवा कर जिले की सीमा के बाहर छोड़ दिया गया।         

‘इंकलाबी मजदूर केन्द्र’ के उपाध्यक्ष पंकज चूंकि अपनी मीटिंग के सिलसिले में बाहर थे इसलिए पुलिस महिला सिपाहियों के बगैर उनके घर जाकर उनकी पत्नी को धमकाती है व घर की कुर्की की धमकी देती है। यह दिखाता है कि कानूनों का हवाला देकर जो पुलिस सामान्य लोगों से कानूनों का पालन करने की बात करती है वह खुद अपने ही कानूनों का पालन नहीं करती है।
    
बाद में जब पंकज हरिद्वार पहुंचे तो हरिद्वार सिडकुल में बने ट्रेड यूनियन मोर्चा और इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने 26 अक्टूबर को प्रेस कांफ्रेंस कर हरिद्वार के पूंजीपतियों और पुलिस प्रशासन के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। लेकिन पूंजीपतियों के लिए काम कर रहे पुलिस प्रशासन ने पंकज को भी जिला बदर के आदेश पर हस्ताक्षर करवाकर उत्तर प्रदेश के बार्डर पर छोड़ दिया। 
    
यह वही धाकड़ धामी की धाकड़ पुलिस है जिसने अभी तक अंकिता भंडारी के मामले में वीआईपी का नाम आने वाले व्यक्ति को नहीं पकड़ा है। धार्मिक जुलूसों में खुलेआम हथियार लहराने वाले लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। और न जाने कितने ही अपराधी उत्तराखंड की वादियों में घूम रहे हैं। लेकिन मजदूरों व उनके नेताओं पर कार्यवाही करने में वे कानूनों को भी ताक पर रखने से बाज नहीं आते हैं। 
    
दरअसल पुलिस प्रशासन की यह कार्रवाई पूंजीपतियों के इशारे पर एक खास समय में की गयी है। अभी दिवाली का समय आने वाला है। इस बात की पूरी संभावना है कि बोनस को लेकर मजदूरों और पूंजीपतियों में एक बार फिर ठने। और इसी के मद्देनजर पूंजीपति वर्ग और शासन प्रशासन सतर्क हैं कि कहीं ऐसा न हो कि बोनस का मामला एक आंदोलन का रूप ले ले और ये मजदूर नेता उन आंदोलनों को नेतृत्व दें। पूंजीपति वर्ग और उनकी सरकारों को मजदूर वर्ग के सच्चे नेताओं से हमेशा डर रहता है। इसलिए उसने मजदूर नेताओं को जिला बदर करने की साजिश रची। और शासन प्रशासन ने मजदूर नेताओं को जिला बदर करने के लिए एकतरफा आदेश पारित कर दिए। 
    
पंकज और जय प्रकाश को जिला बदर किये जाने के खिलाफ तमाम जगहों पर तमाम संगठन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। धामी सरकार का पुतला फूंक रहे हैं, ज्ञापन दे रहे हैं और जिला बदर के आदेश को रद्द किये जाने की मांग कर रहे हैं। इतिहास भी इस बात का गवाह है कि मजदूरों के संघर्ष यूं तो नहीं दबे हैं।   -मजदूर आंदोलन का एक साथी

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