विविध

अमरीका और रूस के बीच यूक्रेन की बंदरबांट

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अमरीकी साम्राज्यवादियों के लिए यूक्रेन की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखण्डता कभी भी चिंता का विषय नहीं रही है। वे यूक्रेन का इस्तेमाल रूसी साम्राज्यवादियों को कमजोर करने और उसके टुकड़े करने के लिए कर रहे थे। ट्रम्प अपने पहले राष्ट्रपतित्व काल में इसी में लगे थे। लेकिन अपने दूसरे राष्ट्रपतित्व काल में उसे यह समझ में आ गया कि जमीनी स्तर पर रूस को पराजित नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने रूसी साम्राज्यवादियों के साथ सांठगांठ करने की अपनी वैश्विक योजना के हिस्से के रूप में यूक्रेन से अपने कदम पीछे करने शुरू कर दिये हैं। 
    

यह यहां नहीं हो सकता

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पिछले सालों में अमेरिकी साम्राज्यवादियों में यह अहसास गहराता गया है कि उनका पराभव हो रहा है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में सोवियत खेमे और स्वयं सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने जो तात्कालिक प्रभुत्व हासिल किया था वह एक-डेढ़ दशक भी कायम नहीं रह सका। इस प्रभुत्व के नशे में ही उन्होंने इक्कीसवीं सदी को अमेरिकी सदी बनाने की परियोजना हाथ में ली पर अफगानिस्तान और इराक पर उनके कब्जे के प्रयास की असफलता ने उनकी सीमा सारी दुनिया के सामने उजागर कर दी। एक बार फिर पराभव का अहसास उन पर हावी होने लगा।

हिंदू फासीवादियों की समान नागरिक संहिता और इसका विरोध

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उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने 27 जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता को लागू कर दिया है। इस संहिता को हिंदू फासीवादी सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। संहिता

पेरिस कम्यून दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

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पेरिस कम्यून मानव इतिहास की अविस्मरणीय घटना है जब पेरिस के मजदूरों ने पूंजीपतियों के ‘‘स्वर्ग पर धावा’’ बोलते हुये सत्ता को अपने हाथों में ले लिया था। 18 मार्च 1871 को फ्

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया

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गौर से देखा जाये तो मानव ज्ञान के तीन अहम स्रोत रहे हैं। जिन्हें- ‘‘उत्पादन, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग’’- जैसे तीन क्षेत्रों में बांटा जाता रहा है। वास्तविक दुनिया में उत्पादन (यानी कृषि, उद्योग से लेकर वैज्ञानिक उपकरण) का विशाल क्षेत्र और मानव जाति के भरण-पोषण, रहन-सहन आदि को किन्हीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस रोबोटिक उपकरणों से प्रतिस्थापित करना शेखचिल्लीपना है। और फिर कोई तो होगा जो इन मशीनों का निर्माण व उपयोग करेगा। और जहां तक वर्ग संघर्ष के क्षेत्र की बात है वहां असल झगड़ा मनुष्यों के बीच है। एक ओर पूंजीपति है तो दूसरी ओर मजदूर, किसान और अन्य मेहनतकश हैं। साम्राज्यवादी देशों के आपसी झगड़े हैं तो ये देश तीसरी दुनिया के देशों का शोषण-दोहन करते हैं। यानी मनुष्यों की अति विशाल बहुसंख्या शोषित-उत्पीड़ि़त है। और रही बात विज्ञान और वैज्ञानिक प्रयोगों की तो ये आज एकाधिकारी पूंजी के सेवक बने हुए हैं।

मारुति मजदूरों का प्रदर्शन

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नई दिल्ली/ 19 मार्च 2025 को मारुति सुजुकी के अस्थायी कर्मचारियों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री कार्यालय में

शहादत दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

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हमारे देश के महान क्रांतिकारियों भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने 23 मार्च, 1931 के दिन फांसी पर चढ़ा दिया था। और ये नौजवान क्रांतिकारी ‘‘इंकलाब ज़िं

सैमसंग मजदूरों की हड़ताल व सीटू का समझौतापरस्त नेतृत्व

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सैमसंग इंडिया के तमिलनाडु स्थित संयंत्र के संघर्षरत मजदूरों की एक महीने पुरानी हड़ताल बगैर किसी सम्मानजनक समझौते के समाप्त हो गयी है। दक्षिण कोरिया की इस बहुराष्ट्रीय कम्प

छंटनी के खिलाफ मजदूर संघर्षरत

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गुड़गांव/ बिलासपुर से तावड़ू रोड पर स्थित शंकाई प्रगति इण्डिया लिमिटेड के मजदूरों का धरना दिनांक 10 मार्च से चल रहा है। कम्पनी में लगभग 250 मजदूर काम कर रह

आलेख

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।