हमारा देश घोर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। इस राजनीतिक संकट के दौर में कभी भी कोई घटना राष्ट्रीय उद्वेलन पैदा कर सकती है। जैसा कि वर्तमान काकरोच जनता पार्टी के उभार में सामने आया है। देश के शासक वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियों के पास जनता को देने के लिए कुछ नहीं है सिवाय परेशानियां, लाठी और गोली के।
मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी की प्रतिक्रिया में बनी काकरोच जनता पार्टी में युवा व प्रगतिशील तबके के गुस्से की अभिव्यक्ति देखने को मिली। हालांकि इस पार्टी की न कोई विचारधारा है और न कोई सिद्धांत। काकरोच जनता पार्टी के ज्यादातर चेहरे सुधारवादी हैं। जब गांधीवाद और अम्बेडकरवाद पूंजीवादी सोच साबित हो चुकी हो, तब ये लोग हिंदू फासीवादियों का सामना, आंबेडकर और गांधी के विचारों से करने चले। और इनकी बैसाखी बने संशोधनवादी छात्र संगठन। जो माक्र्सवाद को भूलकर काकरोच जनता पार्टी की विचारधारा में लगभग खो गए।
नीट एग्जाम जो पहले आल इंडिया और स्टेट लेवल पर पीएमटी (प्री मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट) एग्जाम लिया जाता था। इसमें पेपर लीक होना हर बार की कहानी थी और है। जब पेपर लीक छोटे दायरे में होता है तो कुछ नहीं होता। जब बड़े दायरे में पेपर चला जाता है और मुद्दा बन जाता है तो सरकार को मजबूरी में रद्द करना पड़ता है। पूंजीवादी व्यवस्था बिना भ्रष्टाचार के नहीं चल सकती है। प्रतियोगिता, भ्रष्टाचार और निजी हित का अपना अटूट बंधन है जो पूंजीवाद में हजारों मेहनती युवाओं की जिंदगी से खेलते हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था में पेपर लीक होना और छात्रों का आत्महत्या करना प्रतियोगिता की देन है। यह पूंजीवादी व्यवस्था पूरी दुनिया में हर रोज लाखों युवाओं की बलि ले रही है।
वर्तमान आंदोलन नीट पेपर लीक से शुरू हुआ और देखते ही देखते सरकार की नीतियों से तंग या सताये हुए लोगों का जमावड़ा बनता चला गया। शुरू में कुछ काकरोच जनता पार्टी के समर्थक, वामपंथी छात्र संगठनों की बैसाखी के साथ ये आंदोलन 20 जून 2026 से जंतर मंतर पर चालू हुआ और पूरे देश में फैला। 28 जून को सोनम वांगचुक और अन्य छात्रों की भूख हड़ताल ने आंदोलन को स्थापित करने का काम किया।
सोनम वांगचुक को जबरन धरना स्थल से गिरफ्तार करने और 20 जुलाई 2026 की संसद मार्च की काॅल और उस पर लाठीचार्ज ने मामले को गर्म कर दिया। सोनम वांगचुक को बर्बर तरीके से गिरफ्तार करने और 20 जुलाई के लाठीचार्ज इस आंदोलन के दो मुख्य टर्निंग प्वाइंट रहे। 20 जुलाई से यह आंदोलन जन आंदोलन का रूप ले चुका था। लोगों को उम्मीद थी कि अब धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग उठेगी। लेकिन काकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व ने जनभावना का निरादर किया। और आंदोलन को व्यवस्था के दायरे से बाहर नहीं जाने दिया और 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ आंदोलन समाप्त कर दिया गया। और आंदोलन से बड़ी उम्मीद पाले हुए लोग मुंह ताकते रह गए।
इस आंदोलन में वाम के ज्यादातर संगठन अपनी रीढ़ की हड्डी यानी विचारधारा को छोड़कर या समझौता करके आंदोलन में शामिल हो रहे थे। 21 तारीख को मैंने ‘लाल सलाम’ के साथ अपना भाषण शुरू किया तो लोग ऐसे देख रहे थे जैसे मैं दूसरी दुनिया से आया हूं। ज्यादातर वामपंथी छात्र संगठन जय भीम में डूबे हुए थे और पूंजीपति वर्ग के नारों और गानों पर नाच रहे थे। जब रात में सैद्धांतिक बहस कभी स्टार्ट होती थी तो ये लोग अंबेडकरवाद का ज्यादा पक्ष ले रहे थे। उत्तर आधुनिकतावादी विचारधारा में लोट-पोट दिखे। गैर माक्र्सवादी व्यवहार देखने को मिला। शासक वर्ग के लिए रीढ़विहीन माक्र्सवादी लोग बड़े काम के होते हैं; शासक वर्ग अपनी व्यवस्था की सेफ्टी वाल्व के तौर पर इनको प्रयोग करता है।
आज जरूरत बनती है कि हर जगह पूंजीवादी व्यवस्था की संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति और समाज व्यवस्था को उजागर किया जाए। क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था आज हर मोर्चे पर फेल साबित हो रही है। माक्र्सवाद के फेल होने का रोना रोने वाले लोग पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में बात नहीं करते हैं।
जबकि समाजवाद तो पूंजीवाद के बाद की व्यवस्था है। पूंजीवादी व्यवस्था की यात्रा 400 साल की है दुनिया के स्तर पर। और समाजवाद को एक तिहाई दुनिया में 30 से 40 साल का मौका मिला। जिसमें हमसे कुछ गलतियां हुईं और पूंजीपति वर्ग ने हमारी सत्ता छीन ली। हालांकि दूसरे विश्व युद्ध ने हमसे हमारे 2 करोड़ कामरेड छीन लिए थे।
आज ज्यादातर पूंजीवाद के पक्षधर वो लोग बने हुए हैं जिनके बाप-दादा कल्याणकारी राज्य के दौर में सक्षम बने। जो कल्याणकारी राज्य कम्युनिस्टों के डर के बगैर शायद ही आता।
हमारा देश क्रांति की दहलीज पर खड़ा है। आत्मगत शक्तियों यानी क्रांतिकारी पार्टी के अभाव में यह दौर बीता जा रहा है और संशोधनवादी कांग्रेस की बैसाखी ढोने को अभिशप्त हैं।
-योगेश, दिल्ली